उनमें 'SC/ST लोगों को परेशान करने की मानसिकता' है: पटना हाईकोर्ट ने स्कॉलर के खिलाफ हटाई डीएम की टिप्पणी

  • उनमें SC/ST लोगों को परेशान करने की मानसिकता है: पटना हाईकोर्ट ने स्कॉलर के खिलाफ हटाई डीएम की टिप्पणी

    पटना हाईकोर्ट ने अर्ध-न्यायिक अधिकारियों को मुकदमेबाजी करने वालों के खिलाफ व्यक्तिगत, अप्रासंगिक या पक्षपाती टिप्पणियां करने के खिलाफ चेतावनी दी। यह चेतावनी तब दी गई जब जिला मजिस्ट्रेट ने एक संस्कृत विद्वान के बारे में कहा कि उनमें SC/ST समुदाय के लोगों को "परेशान करने की मानसिकता" है।

    जस्टिस आलोक कुमार की सिंगल जज डॉ. देव नारायण झा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम, 2015 के तहत जिला मजिस्ट्रेट-सह-द्वितीय अपीलीय प्राधिकारी द्वारा उनके खिलाफ की गई टिप्पणियों को चुनौती दी गई।

    याचिकाकर्ता ने सरकारी नाली से अपनी कृषि भूमि में पानी के रिसाव की शिकायत की थी। अधिकारियों द्वारा शिकायत पर विचार करने के बाद याचिकाकर्ता ने अतिरिक्त कलेक्टर के समक्ष अपील की और उसके बाद जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष दूसरी अपील की।

    दूसरी अपील खारिज करते हुए जिला मजिस्ट्रेट ने दर्ज किया कि शिकायतकर्ता के रूप में ऐसा लगता है कि उनमें "पड़ोस में रहने वाले SC/ST समुदायों के लोगों को परेशान करने की मानसिकता" है और उन्होंने उप-विभागीय अधिकारी को मामले की जांच करने का निर्देश दिया।

    याचिकाकर्ता ने इन टिप्पणियों को अनुचित और अपमानजनक बताते हुए चुनौती दी। उनका तर्क था कि ये टिप्पणियां बिना किसी तथ्यात्मक या कानूनी आधार के की गईं और इनसे उनकी प्रतिष्ठा और सामाजिक स्थिति पर असर पड़ा। उन्होंने यह भी बताया कि वह संस्कृत विद्वान हैं और एक राज्य विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में काम कर चुके हैं।

    भौतिक सत्यापन के दौरान याचिकाकर्ता की भूमि पर जल-जमाव नहीं पाए जाने की रिपोर्ट पर ध्यान देने के बाद हाईकोर्ट ने मूल शिकायत से संबंधित आदेशों में हस्तक्षेप करने से इनकार किया। हालांकि, कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट द्वारा की गई व्यक्तिगत टिप्पणियों पर कड़ी आपत्ति जताई।

    कोर्ट ने जोर देकर कहा:

    "इस बात पर जोर देना आवश्यक है कि अर्ध-न्यायिक अधिकारियों को मामलों का निर्णय सख्ती से तथ्यों और कानून के आधार पर करना चाहिए; व्यक्तिगत टिप्पणियां, अपमान या पक्षपाती टिप्पणियां निष्पक्ष और निष्पक्ष सुनवाई के मूल सिद्धांत का उल्लंघन करती हैं। अर्ध-न्यायिक निकाय का दायरा उसके समक्ष विशिष्ट विवाद को हल करने तक सीमित है; कानूनी योग्यता से असंबंधित मुकदमेबाज के व्यक्तिगत चरित्र, नैतिकता या पृष्ठभूमि पर टिप्पणी करना सत्ता का दुरुपयोग है। हाईकोर्ट ने बार-बार कहा है कि निचली अदालतों, न्यायाधिकरणों और अर्ध-न्यायिक अधिकारियों को संयमित, संतुलित और सम्मानजनक भाषा का उपयोग करना चाहिए।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि अर्ध-न्यायिक अथॉरिटी से यह उम्मीद नहीं की जाती है कि वह रिकॉर्ड से बाहर की या फ़ैसले से असंबद्ध बातों का ज़िक्र करे।

    याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ की गई टिप्पणियों को "अनुचित और बेबुनियाद" मानते हुए कोर्ट ने ज़िला मजिस्ट्रेट के आदेश के उस हिस्से को हटा दिया जिसमें उनके ख़िलाफ़ व्यक्तिगत आरोप लगाए गए।

    इसके साथ ही रिट याचिका का निपटारा कर दिया गया।

    Case: Dr. Dev Narayan Jha v. State of Bihar.

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