रुटीन FIR में शामिल होना ही हथियार का लाइसेंस न देने का आधार नहीं हो सकता, जब तक कि सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा साबित न हो: पटना हाईकोर्ट
Shahadat
26 Sept 2026 6:31 PM IST

पटना हाईकोर्ट ने कहा कि किसी आवेदक के खिलाफ़ सिर्फ़ आम FIR दर्ज होने या उसमें शामिल होने के आधार पर ही हथियार का लाइसेंस देने से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता। इसके लिए हथियार के गलत इस्तेमाल, हिंसा या सार्वजनिक सुरक्षा को सीधे खतरे का ठोस सबूत होना ज़रूरी है।
जस्टिस आलोक कुमार की सिंगल जज बेंच बिल्डर और 'बिग्रहपुरम डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड' के डायरेक्टर की रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उन्होंने नॉन-प्रोहिबिटेड बोर रिवॉल्वर/पिस्टल के लिए हथियार का लाइसेंस न दिए जाने के फैसले को चुनौती दी।
याचिकाकर्ता ने 17.01.2023 को हथियार के लाइसेंस के लिए आवेदन किया। उन्होंने कहा कि अपने काम की प्रकृति और दिन-रात अक्सर यात्रा करने के कारण उन्हें अपनी जान और संपत्ति को खतरा महसूस होता है। याचिकाकर्ता का दावा था कि पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट उनके पक्ष में थी; जक्कनपुर के SHO ने लाइसेंस देने की सिफारिश की थी, जिसे बाद में पटना के SSP ने आगे बढ़ा दिया।
हालांकि, पटना के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने आवेदन खारिज किया। उन्होंने मुख्य रूप से रामकृष्णा नगर पुलिस स्टेशन केस नंबर 502/2021 (IPC की धाराओं 447, 427, 379, 354, 504, 506 और 34 के तहत दर्ज) के लंबित होने का हवाला दिया। इस फैसले को पटना के डिविजनल कमिश्नर ने भी सही ठहराया।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि आपराधिक मामले के आधार पर लाइसेंस आवेदन को खारिज करना सही नहीं है, खासकर इसलिए, क्योंकि उन्हें 23.02.2024 को पटना के एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट-XIII ने आरोपों से बरी कर दिया।
राज्य सरकार ने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि आर्म्स एक्ट, 1959 की धारा 14(1)(b)(ii) के तहत लाइसेंसिंग अथॉरिटी लाइसेंस देने से इनकार कर सकती है अगर सार्वजनिक शांति या सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखने के लिए ऐसा करना ज़रूरी हो।
हाईकोर्ट ने फिर से कहा कि भारत में हथियार रखना कोई मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि आर्म्स एक्ट, 1959 के तहत एक रेगुलेटेड सुविधा है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह के कानूनी अधिकार का इस्तेमाल सही जानकारी के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि सिर्फ़ अंदाज़ों के आधार पर।
कोर्ट ने कहा:
“आवेदक या लाइसेंस धारक के खिलाफ़ सिर्फ़ किसी मामले में शामिल होने या आम FIR दर्ज होने के आधार पर लाइसेंस रद्द करना या देने से मना करना आमतौर पर काफ़ी नहीं है, जब तक कि हथियार का गलत इस्तेमाल, हिंसा या सार्वजनिक सुरक्षा के लिए सीधा खतरा साबित न हो जाए।”
कोर्ट ने आगे कहा कि पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट और खतरे के आकलन पर पक्के तौर पर विचार किया जाना चाहिए, न कि आम अंदाज़ों के आधार पर उन्हें स्वीकार या अस्वीकार कर दिया जाए।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की अर्ज़ी को मुख्य रूप से लंबित आपराधिक मामले के आधार पर खारिज किया गया। हालांकि, डिविज़नल कमिश्नर द्वारा खारिज करने के आदेश की पुष्टि करने से पहले ही याचिकाकर्ता उस मामले में बरी हो चुका था।
इसलिए हाईकोर्ट ने माना कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और डिविज़नल कमिश्नर के आदेश सही नहीं थे और दोनों आदेशों को रद्द किया।
कोर्ट ने पटना के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वह नई पुलिस रिपोर्ट मंगाकर और इस बात को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता की अर्ज़ी पर फिर से विचार करें कि याचिकाकर्ता एक बिल्डर और व्यवसायी है, जिसे अपने काम की प्रकृति के कारण अपनी सुरक्षा की ज़रूरत है।
निर्देश दिया गया कि अर्ज़ी पर तीन महीने के भीतर फैसला किया जाए।
Case: Sanjay Kumar Yadav v. State of Bihar and Ors.

