हालात में बदलाव के बिना सिर्फ़ 6 महीने बाद अर्ज़ी दोबारा लगाने की छूट देकर नाबालिग की ज़मानत अर्ज़ी खारिज नहीं की जा सकती: पटना हाईकोर्ट
Shahadat
14 Oct 2026 9:09 AM IST

पटना हाईकोर्ट ने कहा कि अगर ट्रायल पूरा नहीं हुआ तो चिल्ड्रन कोर्ट किसी नाबालिग की ज़मानत अर्ज़ी को सिर्फ़ इस आधार पर खारिज नहीं कर सकता कि उसे छह महीने बाद अर्ज़ी दोबारा लगाने की छूट दी जा रही है। कोर्ट ने माना कि जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और सुरक्षा) एक्ट, 2015 के तहत ऐसा तरीका अपनाना सही नहीं है।
जस्टिस जितेंद्र कुमार की सिंगल जज बेंच नाबालिग की अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह अपील चिल्ड्रन कोर्ट के 02.01.2026 के उस आदेश के खिलाफ है, जो J.E. ट्रायल नंबर 18/2025 (सिवान मुफस्सिल P.S. केस नंबर 539/2025 से जुड़ा) में दिया गया। इस आदेश में JJ Act की धारा 12 के तहत उसकी रेगुलर ज़मानत अर्ज़ी खारिज की गई।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक दोपहर करीब 1:30 बजे अपने दोस्तों के साथ बाज़ार गया। दोपहर करीब 2:40 बजे उसके पिता को सूचना मिली कि अपीलकर्ता और अन्य सह-आरोपियों ने V2 मॉल के बाहर उसके बेटे को पकड़ लिया है और आरोपियों में से एक ने उसे चाकू मार दिया, जिससे उसकी मौत हो गई।
कथित घटना के समय अपीलकर्ता की उम्र 16 साल, 8 महीने और 1 दिन आंकी गई। शुरुआती जांच के बाद उसे कथित अपराध के नतीजों को समझने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व पाया गया और चिल्ड्रन कोर्ट द्वारा उस पर एक वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जा रहा था।
चिल्ड्रन कोर्ट ने सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट के आधार पर उसकी ज़मानत अर्ज़ी खारिज की थी। इस रिपोर्ट में अपीलकर्ता के नकारात्मक, आक्रामक और बदले की भावना वाले रवैये, माता-पिता की उपेक्षा, देखरेख की कमी और बुरी संगत का ज़िक्र था। इसमें ज़मानत पर रिहा होने पर अपीलकर्ता को शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक खतरा होने की संभावना का भी ज़िक्र था और कहा गया कि उसकी रिहाई से न्याय के मकसद को नुकसान पहुंचेगा।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट इन नतीजों का समर्थन नहीं करती। कोर्ट ने देखा कि अपील करने वाले का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और रिपोर्ट में यह भी नहीं बताया गया कि किसी आपराधिक गैंग ने उसका इस्तेमाल किया। कोर्ट ने आगे कहा कि JJ Act की धारा 12 के तहत ज़मानत देने से इनकार करने के लिए कथित अपराध की गंभीरता या नाबालिग की उम्र कोई ज़रूरी बात नहीं है। कोर्ट ने कहा कि 16 साल या उससे ज़्यादा उम्र का बच्चा, जिस पर कोई गंभीर अपराध करने का आरोप हो, वह भी इस प्रावधान के तहत ज़मानत पाने का हकदार है।
इसके बाद कोर्ट ने चिल्ड्रेन कोर्ट की उस बात पर विचार किया कि अगर छह महीने के अंदर ट्रायल पूरा नहीं होता है तो अपील करने वाला ज़मानत के लिए फिर से अर्ज़ी दे सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा:
“चिल्ड्रेन कोर्ट ने यह भी कहा है कि अगर छह महीने के अंदर ट्रायल पूरा नहीं होता है तो अपील करने वाला ज़मानत के लिए फिर से अर्ज़ी दे सकता है। लेकिन, मुझे लगता है कि JJ Act के तहत ऐसी बात कहना सही नहीं है, क्योंकि कानून के साथ टकराव वाले नाबालिग को ऑब्ज़र्वेशन होम में रखना सज़ा नहीं है, बल्कि यह सुरक्षा के लिए है। इसका मकसद कानून के साथ टकराव वाले नाबालिग में सही सुधार और विकास सुनिश्चित करना है। नाबालिग को ज़मानत पर तभी छोड़ा जाता है, जब उसके घर पर सुधार और विकास की प्रक्रिया बेहतर ढंग से हो सके। चिल्ड्रेन कोर्ट ने यह नहीं बताया कि छह महीने बाद अगर ट्रायल पूरा नहीं होता है तो घर या ऑब्ज़र्वेशन होम में स्थिति कैसे बदल जाएगी, जिससे JJ Act की धारा 12 के तहत रेगुलर ज़मानत की अर्ज़ी को फिर से देने की ज़रूरत पड़े।”
इसके बाद हाईकोर्ट ने अपील मंज़ूर की और चिल्ड्रेन कोर्ट का आदेश रद्द किया। अपील करने वाले को, जो 12.01.2026 से हिरासत में था, 10,000 रुपये का ज़मानत बॉन्ड और अपने पिता का अंडरटेकिंग (लिखित वादा) देने पर ज़मानत पर रिहा करने का आदेश दिया गया। पिता को निर्देश दिया गया कि वे अपील करने वाले की आदतों पर नज़र रखें, उसे आपराधिक लोगों के संपर्क में आने से रोकें, उसकी विकास संबंधी ज़रूरतों का ध्यान रखें और ज़रूरत पड़ने पर उसे कोर्ट में पेश करें।
पिता को यह भी अंडरटेकिंग देने का निर्देश दिया गया कि अपील करने वाला वोकेशनल ट्रेनिंग करेगा और अपने पुनर्वास में मदद के लिए कोई हुनर सीखेगा।
Case Title : CICL (Real name withheld) v. State of Bihar

