नशे की हालत में साथी कॉन्स्टेबल पर कथित हमले के लिए नौकरी से निकालना "कड़ी सज़ा": पटना हाईकोर्ट
Shahadat
24 Aug 2026 9:53 PM IST

पटना हाईकोर्ट ने बिहार पुलिस के कॉन्स्टेबल की बर्खास्तगी (नौकरी से निकालने) का आदेश रद्द किया। उस पर नशे की हालत में चाकू से दूसरे कॉन्स्टेबल पर हमला करने का आरोप था। कोर्ट ने पाया कि विभागीय कार्यवाही में न तो कथित पीड़ित का बयान था, न ही कोई चोट की रिपोर्ट या मेडिकल सबूत था जिससे नशे की पुष्टि हो सके।
जस्टिस डॉ. अंशुमन की सिंगल बेंच ने कहा कि भले ही कॉन्स्टेबल की यह बात मान ली जाए कि हाथापाई हुई, फिर भी उसे नौकरी से निकालना "बहुत ज़्यादा सज़ा" थी।
याचिकाकर्ता 1984 में कॉन्स्टेबल के तौर पर बिहार पुलिस में शामिल हुआ और 38 साल से ज़्यादा समय तक सेवा की थी। उसके अनुसार, उसे अपनी सेवा के दौरान कई पुरस्कार मिले थे। यह मामला जुलाई 2018 की एक घटना से जुड़ा है, जब याचिकाकर्ता बांका जिले में श्रावणी मेला ड्यूटी पर तैनात था। एक FIR दर्ज की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि नशे की हालत में उसने दूसरे कॉन्स्टेबल, उपेंद्र कुमार सिंह के साथ गाली-गलौज की और मारपीट की।
इसके बाद उसके खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू की गई। अनुशासनात्मक प्राधिकरण ने आरोपों को सही पाया और जुलाई 2021 में उसे नौकरी से निकाल दिया। उसकी विभागीय अपील भी खारिज कर दी गई।
राज्य सरकार ने इस कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि विभागीय जांच कानून के अनुसार की गई और सुपरविज़न व मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप साबित हुए। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि विभागीय कार्यवाही आपराधिक मुकदमे से अलग होती है और यह 'संभावनाओं की अधिकता' (Preponderance of Probabilities) के मानक पर आधारित होती है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि विभागीय कार्यवाही में मौजूद सामग्री याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज निष्कर्षों का समर्थन नहीं करती है। कोर्ट ने गौर किया कि हालांकि आरोप यह था कि याचिकाकर्ता ने उपेंद्र कुमार सिंह पर चाकू से हमला किया और उन्हें चोट पहुंचाई, लेकिन सिंह ने विभागीय कार्यवाही के दौरान कोई गवाही नहीं दी और न ही कोई चोट की रिपोर्ट पेश की गई।
इसी तरह, हालांकि याचिकाकर्ता पर नशे में होने का आरोप था, लेकिन इस आरोप को साबित करने के लिए रिकॉर्ड में कोई मेडिकल रिपोर्ट, ब्रेथ एनालाइज़र रिपोर्ट, ब्लड टेस्ट या यूरिन टेस्ट मौजूद नहीं था।
कोर्ट ने कहा:
“इस कोर्ट को विवादित आदेश के आखिरी हिस्से को देखने के बाद बहुत हैरानी हुई कि बिना किसी सबूत के—न तो कथित घायल व्यक्ति सामने आया, न ही कोई चोट की रिपोर्ट उपलब्ध थी, और न ही यह साबित करने के लिए कोई सबूत था कि याचिकाकर्ता नशे में था—अनुशासनात्मक अधिकारी ने सज़ा सुना दी... अपील के मेमो को देखने पर कोर्ट को यह पता चला कि याचिकाकर्ता ने खुद सिर्फ़ यह बात मानी है कि उसके और उपेंद्र कुमार सिंह के बीच हाथापाई हुई। हालांकि, उपेंद्र कुमार सिंह किसी भी चरण में सामने नहीं आए। कोर्ट का मानना है कि ऐसे हालात में नौकरी से निकालने की सज़ा देना बहुत ज़्यादा और मंज़ूर न करने लायक है।”
कोर्ट ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता का कार्यकाल वैसे तो 31 जनवरी, 2023 को खत्म होने वाला था, लेकिन उसे 27 जुलाई, 2021 से ही नौकरी से निकाल दिया गया। कोर्ट अनुशासनात्मक या अपीलीय अधिकारी के नतीजों से संतुष्ट नहीं था, खासकर इसलिए क्योंकि कथित पीड़ित की गवाही, चोट की रिपोर्ट या नशे की पुष्टि करने वाला कोई टेस्ट मौजूद नहीं था। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर यह मान भी लिया जाए कि हाथापाई हुई तो भी दी गई सज़ा “बहुत ज़्यादा” थी।
इसलिए मामले को संबंधित पुलिस अधीक्षक (SP) के पास वापस भेज दिया गया ताकि वे ज़रूरी सबूतों की कमी पर विचार करने के बाद नया आदेश जारी कर सकें। अधिकारी को निर्देश दिया गया कि वे 90 दिनों के भीतर मामले पर फ़ैसला लें।
Case Title: Tilak Dhari Singh v. State of Bihar and Ors.


