बिना गवाहों, दस्तावेज़ों और क्रॉस-एग्जामिनेशन के विभागीय जांच के आधार पर बड़ी सज़ा नहीं दी जा सकती: पटना हाईकोर्ट
Shahadat
8 Oct 2026 7:17 PM IST

पटना हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी विभागीय जांच के आधार पर बड़ी सज़ा नहीं दी जा सकती, जिसमें न तो गवाहों से पूछताछ की गई, न ही दस्तावेज़ ठीक से पेश या दिखाए गए और आरोपी कर्मचारी को क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) का उचित मौका नहीं दिया गया।
जस्टिस कुमार मनीष की सिंगल जज बेंच पवन कुमार की एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत उन्हें एग्जीक्यूटिव इंजीनियर के पद से बिहार इंजीनियरिंग सर्विस के बेसिक ग्रेड, यानी असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर वापस भेज दिया गया।
याचिकाकर्ता अप्रैल 2013 से जुलाई 2014 तक सिवान में ट्यूबवेल डिवीज़न के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर के तौर पर तैनात थे। 13 ट्यूबवेल के संयुक्त निरीक्षण के बाद, एक रिपोर्ट में ज़्यादा भुगतान, ट्यूबवेल के चालू न होने के बावजूद लगभग 3.54 करोड़ रुपये का खर्च, और बिना फिजिकल वेरिफिकेशन (मौके पर जांच) के एस्टीमेट तैयार करने का आरोप लगाया गया।
याचिकाकर्ता को 10.11.2014 को सस्पेंड कर दिया गया। बाद में उन पर तीन आरोप लगाए गए: ज़्यादा भुगतान, 13 ट्यूबवेल पर खर्च, और बिना स्पॉट वेरिफिकेशन के एस्टीमेट तैयार करना।
याचिकाकर्ता ने विभागीय कार्यवाही को चुनौती देते हुए कहा कि चार्ज मेमो में दस्तावेज़ों और गवाहों की ज़रूरी लिस्ट नहीं थी, जांच के दौरान किसी भी गवाह से पूछताछ नहीं की गई और उन्हें किसी भी गवाह से क्रॉस-एग्जामिनेशन करने का मौका नहीं दिया गया।
कोर्ट ने पाया कि चार्ज मेमो में CCA रूल्स, 2005 के नियम 17(3)(ii)(a) और (b) के तहत ज़रूरी दस्तावेज़ों या गवाहों की कोई लिस्ट नहीं दी गई। कोर्ट ने यह भी पाया कि जांच अधिकारी ने दोनों विभागीय कार्यवाहियों में से किसी में भी एक भी गवाह से पूछताछ नहीं की। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि विजिलेंस डिपार्टमेंट के टेक्निकल एग्जामिनर सेल ने उन्हीं आरोपों पर कोई वित्तीय अनियमितता न होने की रिपोर्ट दी, लेकिन दोषी ठहराते समय उस रिपोर्ट पर विचार नहीं किया गया।
कोर्ट ने यह भी पाया कि डिमोशन (पद घटाने) की सज़ा दो अलग-अलग विभागीय कार्यवाही के नतीजों को मिलाकर दी गई, जबकि CCA नियम, 2005 के नियम 22 के तहत संयुक्त कार्यवाही का कोई आदेश पारित नहीं किया गया।
कोर्ट ने कहा:
“कानूनी और अर्ध-न्यायिक शक्तियों का इस्तेमाल करने वाले जांच अधिकारी से उम्मीद की जाती है कि वह स्वतंत्र रूप से, निष्पक्ष रूप से और लागू नियमों के तहत तय प्रक्रिया के अनुसार काम करे। जांच अधिकारी केवल आरोप या शुरुआती जांच रिपोर्ट में दर्ज निष्कर्षों के आधार पर आगे नहीं बढ़ सकता; उसे यह पक्का करना होगा कि विभाग तय प्रक्रिया के अनुसार आरोप साबित करे और आरोपी कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का उचित और प्रभावी मौका दे।”
कोर्ट ने माना कि दोनों जांच रिपोर्ट CCA नियम, 2005 के नियम 17 के तहत ज़रूरी प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन के कारण अमान्य थीं और उन्हें बड़ी सज़ा देने का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने मामले को नई जांच के लिए वापस भेजने से भी इनकार किया, क्योंकि कार्यवाही पहले ही लंबे समय तक चल चुकी थी और समय बीत जाने के कारण याचिकाकर्ता को फिर से जांच का सामना करने के लिए कहना अनुचित और अन्यायपूर्ण होगा।
इसके अनुसार, कोर्ट ने डिमोशन की सज़ा देने वाले 09.05.2018 के आदेश और समीक्षा में पारित 06.08.2018 का आदेश रद्द किया।
Case Title : Pawan Kumar v. State of Bihar and Ors

