'सिर्फ समझौते के आधार पर रेप केस रद्द नहीं किया जा सकता, सभी परिस्थितियों पर गौर करना जरूरी': पटना हाईकोर्ट

  • सिर्फ समझौते के आधार पर रेप केस रद्द नहीं किया जा सकता, सभी परिस्थितियों पर गौर करना जरूरी: पटना हाईकोर्ट

    पटना हाईकोर्ट ने कहा कि रेप जैसे गंभीर अपराधों से जुड़े आपराधिक मामलों को सिर्फ इसलिए रद्द नहीं किया जा सकता कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि यह तय करते समय कि क्या ऐसे मामलों को आगे चलाया जाना चाहिए। सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए। इसमें जांच के दौरान जुटाए गए सबूत और बाद में हुआ समझौता भी शामिल है।

    जस्टिस चंद्र शेखर झा की सिंगल बेंच ने उन लोगों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की, जिन्हें फैसले में 'होने वाले ससुराल वाले' (प्रस्तावित ससुराल पक्ष) बताया गया। कोर्ट ने पुलिस की उस रिपोर्ट को ध्यान में रखा, जिसमें याचिकाकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए आरोपों को गलत पाया गया। साथ ही दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते को भी संज्ञान में लिया।

    कोर्ट ऐसी याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें मधेपुरा के सब-डिविजनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट का 11 मार्च, 2019 का आदेश रद्द करने की मांग की गई। मजिस्ट्रेट ने इस आदेश के जरिए IPC की धारा 376 और 504 (धारा 34 के साथ) तथा दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत अपराधों का संज्ञान लिया था।

    अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि शिकायतकर्ता जहानारा खातून और मो. रिजवान की शादी दोनों परिवारों की सहमति से तय हुई। आरोप है कि रिजवान अक्सर शिकायतकर्ता के घर आता था और शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाता था। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि 2 मई, 2018 को रिजवान ने मेहरून खातून की मदद से उसके साथ रेप किया।

    इसके बाद, जब शिकायतकर्ता की मां शादी कराने के लिए आरोपी पक्ष के पास गई तो उन्होंने शादी करने से इनकार कर दिया, उसके साथ मारपीट की और दहेज के रूप में 2 लाख रुपये की मांग की। 5 मई, 2018 को एक पंचायत भी बुलाई गई, लेकिन विवाद सुलझ नहीं सका। इसके बाद FIR दर्ज की गई और पुलिस ने मामले की जांच शुरू की।

    याचिकाकर्ताओं ने बताया कि जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने 3 फरवरी, 2019 को 'फाइनल फॉर्म नंबर 5' (2019) दाखिल किया, जिसमें उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को गलत पाया गया। हालांकि, पुलिस रिपोर्ट के बावजूद, मजिस्ट्रेट ने कथित अपराधों का संज्ञान लिया।

    याचिकाकर्ताओं ने आगे बताया कि बाद में अदालत के बाहर आपसी सहमति से विवाद सुलझा लिया गया। शिकायतकर्ता ने मजिस्ट्रेट के समक्ष एक समझौता याचिका भी दायर की थी, जिसमें मामला वापस लेने की अनुमति मांगी गई। इसलिए उन्होंने तर्क दिया कि जांच के नतीजों और बाद में हुए समझौते को देखते हुए, आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने का कोई मतलब नहीं है।

    इन दलीलों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि बलात्कार जैसे अपराध गंभीर प्रकृति के होते हैं। इन्हें केवल इसलिए पूरी तरह से निजी विवाद नहीं माना जा सकता, क्योंकि पक्षों ने अपने मतभेद सुलझा लिए हैं।

    न्यायालय ने टिप्पणी की:

    “यह सच है कि इस मामले में लगाए गए आरोप, विशेष रूप से IPC की धारा 376 के तहत अपराध, गंभीर प्रकृति के हैं। इन्हें केवल इसलिए पूरी तरह से निजी विवाद नहीं माना जा सकता, क्योंकि पक्षों के बीच समझौता हो गया। इसलिए मामला रद्द (Quash) करने के सवाल पर केवल पक्षों के बीच हुए समझौते के आधार पर विचार नहीं किया जा सकता। इसके बजाय, मामले के सभी तथ्यों, परिस्थितियों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर विचार किया जाना चाहिए।”

    पीठ ने गौर किया कि आरोपों की जांच करने के बाद पुलिस ने एक अंतिम रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें इन आरोपों को असत्य पाया गया। न्यायालय ने शिकायतकर्ता और मो. रिज़वान के बीच हुए उस समझौते पर भी विचार किया, जिसका उल्लेख मजिस्ट्रेट के समक्ष दायर याचिका में किया गया।

    'नौशे अली बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' (Naushey Ali v. State of U.P.) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले (जो (2025) 4 SCC 78 में दर्ज है) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने जांच के नतीजों, बाद में हुए समझौते और रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य सामग्रियों के संयुक्त प्रभाव पर विचार किया। न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ताओं (जिन्हें न्यायालय ने 'प्रस्तावित ससुराल पक्ष' के रूप में वर्णित किया) के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्याय के उद्देश्यों को पूरा नहीं करेगा।

    इस प्रकार, न्यायालय ने समझौते को कार्यवाही रद्द करने के लिए कोई स्वतंत्र या पर्याप्त आधार नहीं माना, बल्कि पुलिस रिपोर्ट और मामले की समग्र परिस्थितियों के साथ-साथ इस समझौते को भी ध्यान में रखा। इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने 11 मार्च 2019 के मजिस्ट्रेट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें IPC की धाराओं 376 और 504/34 तथा दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं 3 और 4 के तहत अपराधों का संज्ञान लिया गया था; साथ ही, इससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाही को भी रद्द कर दिया गया।

    तदनुसार, याचिका स्वीकार की गई।

    Case Title : Md. Usman and Ors v. State of Bihar and Anr

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