'टेंडर का हिस्सा न होने वाली शर्त के आधार पर बोली लगाने वाले को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता': पटना हाईकोर्ट

Shahadat

17 Jun 2026 11:34 AM IST

  • टेंडर का हिस्सा न होने वाली शर्त के आधार पर बोली लगाने वाले को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता: पटना हाईकोर्ट

    पटना हाईकोर्ट ने कहा कि किसी बोली लगाने वाले को ऐसी शर्त के आधार पर दंडित, अयोग्य या ब्लैकलिस्ट नहीं किया जा सकता जो मूल टेंडर नोटिस (NIT) का हिस्सा नहीं थी। कोर्ट ने दोहराया कि राज्य के अधिकारियों को टेंडर की शर्तों के अनुसार ही सख्ती से काम करना होता है और वे मनमाने ढंग से उनसे हट नहीं सकते।

    जस्टिस सुधीर सिंह और जस्टिस शैलेंद्र सिंह की डिवीजन बेंच एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में बिहार राज्य खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम (BSFC), कैमूर के जिला प्रबंधक द्वारा 29.12.2017 को जारी मेमो नंबर 2259 को रद्द करने की मांग की गई। इस मेमो के तहत अनाज की डोरस्टेप डिलीवरी के लिए याचिकाकर्ता का एग्रीमेंट रद्द कर दिया गया, उसे तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया गया और उसकी सिक्योरिटी डिपॉजिट व बैंक गारंटी जब्त कर ली गई।

    यह विवाद 05.02.2016 को जारी टेंडर नोटिस से शुरू हुआ। इस नोटिस में कैमूर सहित बिहार के विभिन्न जिलों में अनाज की डोरस्टेप डिलीवरी के लिए ट्रांसपोर्टिंग और हैंडलिंग एजेंटों की नियुक्ति के लिए आवेदन मांगे गए।

    याचिकाकर्ता ने टेंडर प्रक्रिया में भाग लिया और डिस्ट्रिक्ट ट्रांसपोर्ट कमेटी तथा हेड ऑफिस ट्रांसपोर्टिंग कमेटी द्वारा जांच के बाद उसे योग्य घोषित किया गया। इसके बाद 16.07.2016 के पत्र के माध्यम से कैमूर के जिला प्रबंधक को निर्देश दिया गया कि वे याचिकाकर्ता को 31.03.2019 तक ट्रांसपोर्टिंग एजेंट के रूप में नियुक्त करें। इसके बाद एग्रीमेंट किया गया और याचिकाकर्ता ने काम शुरू किया।

    हालांकि, लगभग एक साल बाद 10.10.2017 को एक कारण बताओ नोटिस (show cause notice) जारी किया गया। इसमें आरोप लगाया गया कि गलत हलफनामा जमा किया गया और टेंडर की शर्तों के क्लॉज 9(iii)(d) का उल्लंघन किया गया। याचिकाकर्ता ने इन आरोपों से इनकार किया और तर्क दिया कि 05.02.2016 के मूल NIT में ऐसा कोई क्लॉज शामिल नहीं था। इसके बाद मैनेजिंग डायरेक्टर के 23.12.2017 के मेमो नंबर 13056 के तहत जारी 29.12.2017 के मेमो के ज़रिए एग्रीमेंट रद्द कर दिया गया, सिक्योरिटी अमाउंट और बैंक गारंटी ज़ब्त कर ली गई और याचिकाकर्ता को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया गया।

    हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को सक्षम अधिकारियों द्वारा पूरी जांच-पड़ताल के बाद चुना गया और वह बिना किसी गड़बड़ी या हेराफेरी के आरोप के अपने कॉन्ट्रैक्ट के तहत काम कर रहा था। यह भी कहा गया कि क्लॉज़ 9(iii)(d) के उल्लंघन का आरोप पूरी तरह से गलतफहमी पर आधारित है, क्योंकि ओरिजिनल NIT में ऐसा कोई क्लॉज़ है ही नहीं।

    याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि जहाँ 'शो कॉज़ नोटिस' में क्लॉज़ 9(iii)(d) का ज़िक्र है, वहीं अंतिम आदेश में क्लॉज़ 9.6 के उल्लंघन का ज़िक्र किया गया, जिससे प्रतिवादियों के रुख में विरोधाभास और असंगति दिखाई दी। याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि न तो वह फेयर प्राइस शॉप का लाइसेंस होल्डर था और न ही किसी राइस मिल का मालिक, इसलिए तथ्यों को छिपाने का कोई मामला नहीं बनता।

    याचिका का विरोध करते हुए प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने झूठा हलफनामा जमा किया और टेंडर की शर्तों का उल्लंघन किया, जिसके बाद BSFC के मैनेजिंग डायरेक्टर ने एग्रीमेंट खत्म किया, सिक्योरिटी अमाउंट और बैंक गारंटी ज़ब्त की और याचिकाकर्ता को ब्लैकलिस्ट कर दिया।

    कोर्ट ने मुख्य मुद्दा इस प्रकार तय किया:

    “क्या नियोक्ता टेंडर नोटिस की शर्तों और नियमों से हटकर रद्दीकरण, ज़ब्ती और ब्लैकलिस्टिंग का आदेश दे सकता है।”

    रिकॉर्ड की जांच करने के बाद कोर्ट ने पाया कि हालांकि प्रतिवादियों ने क्लॉज़ 9(iii)(d) के कथित उल्लंघन का आधार लिया था, लेकिन वे ऐसा कोई सबूत पेश करने में नाकाम रहे, जिससे यह साबित हो सके कि ऐसा क्लॉज़ असल में ओरिजिनल टेंडर शर्तों का हिस्सा था। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि अंतिम आदेश जारी करते समय प्रतिवादियों ने खुद ही आरोप का आधार क्लॉज़ 9(iii)(d) से बदलकर क्लॉज़ 9.6 कर दिया।

    बेंच ने कहा:

    “इस तरह की विसंगति याचिकाकर्ता के इस तर्क को और मज़बूत करती है कि विवादित कार्रवाई टेंडर नोटिस की मूल शर्तों और नियमों पर आधारित नहीं थी।”

    पब्लिक टेंडर से जुड़े स्थापित सिद्धांतों को दोहराते हुए कोर्ट ने कहा:

    “पब्लिक टेंडर के मामलों में राज्य और उसकी संस्थाएं टेंडर बुलाने वाले नोटिस में बताई गई शर्तों और नियमों का सख्ती से पालन करने के लिए बाध्य हैं और वे मनमाने या चुनिंदा तरीके से उनसे हट नहीं सकते।”

    कोर्ट ने रमना दयाराम शेट्टी बनाम इंटरनेशनल एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (1979) 3 SCC 489 मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला देते हुए कहा कि राज्य अपने तय किए गए मानकों का सख्ती से पालन करने के लिए बाध्य है और पात्रता शर्तों में मनमाने ढंग से ढील नहीं दे सकता या उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।

    बेंच ने आगे कहा:

    “सुप्रीम कोर्ट ने लगातार यह माना है कि किसी बोली लगाने वाले को ऐसी शर्त के आधार पर अयोग्य या दंडित नहीं किया जा सकता, जो टेंडर दस्तावेज़ का हिस्सा नहीं थी।”

    कोर्ट ने बताया कि टेंडर प्रक्रिया में शामिल हर व्यक्ति को टेंडर से जुड़ी सटीक शर्तों को जानने का अधिकार है, और किसी भी तरह का बदलाव प्रक्रिया को मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करने वाला बना देगा। विवादित कार्रवाई को मनमाना मानते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फ़ैसला सुनाया और 29.12.2017 के मेमो नंबर 2259 और 23.12.2017 के मेमो नंबर 13056 को रद्द किया।

    Case Title: Sanjay Kumar Jaiswal v. The Bihar State Food and Civil Supply Corporation Ltd. and Ors.

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