'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' को मद्रास हाईकोर्ट ने किया स्वीकार, कहा- जजों को 'पवित्र गाय' की तरह नहीं माना जाना चाहिए
Shahadat
27 May 2026 7:48 PM IST

तमिल फ़िल्म "करुप्पु" पर बैन लगाने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए, जिसमें आरोप लगाया गया कि फ़िल्म में न्यायपालिका को गलत रोशनी में दिखाया गया, मद्रास हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है और जजों को 'पवित्र गाय' की तरह नहीं माना जाना चाहिए।
अपने आदेश में जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस वी लक्ष्मीनारायणन की बेंच ने कहा कि उन्हें न्यायिक भ्रष्टाचार के मामले देखने को मिले हैं। ऐसे "काली भेड़ें" (भ्रष्ट लोग) मद्रास हाईकोर्ट की फुल कोर्ट द्वारा नियमित रूप से बाहर का रास्ता दिखा दिए जाते हैं।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है। पहले भी भ्रष्ट जज थे और आज भी हैं... हम जानते हैं और हमें न्यायिक भ्रष्टाचार के मामले देखने को मिले हैं। मद्रास हाईकोर्ट की फुल कोर्ट नियमित रूप से ऐसी काली भेड़ों को बाहर का रास्ता दिखा देती है।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार को अक्सर बार (वकीलों के समूह) के सदस्य बढ़ावा देते हैं और हाईकोर्ट हमेशा भ्रष्ट लोगों को पकड़ने और स्थिति से उचित तरीके से निपटने के लिए कड़ी नज़र रखता है।
कोर्ट ने कहा,
"न्यायपालिका में भ्रष्टाचार तब तक नहीं हो सकता जब तक बार के कुछ सदस्य भ्रष्ट लोगों के साथ न मिल जाएं। हाईकोर्ट की कड़ी नज़र ही वह मुख्य ज़रिया है जिससे भ्रष्ट लोगों को पकड़ा जाता है और स्थिति से उचित तरीके से निपटा जाता है।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"जजों को 'पवित्र गाय' की तरह नहीं माना जाना चाहिए। न्याय कोई छिपी हुई चीज़ नहीं है; उसे आम लोगों की जांच-परख और सम्मानजनक, भले ही बेबाक टिप्पणियों का सामना करने की अनुमति दी जानी चाहिए (लॉर्ड एटकिन)।"
याचिकाकर्ता ने फ़िल्म पर बैन लगाने या उसे नियंत्रित करने के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था। उसने दलील दी थी कि फ़िल्म के एक सीन में एक जज को रिश्वत लेते और नशीले पदार्थों का सेवन करते हुए दिखाया गया। उसने तर्क दिया कि ऐसे सीन संविधान के खिलाफ हैं और जजों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाते हैं। उसने यह भी तर्क दिया कि फ़िल्म के डायरेक्टर, बालाजी ने बिना सोचे-समझे भारतीय न्यायिक व्यवस्था की आलोचना की है।
हालांकि, कोर्ट ने इस बात से सहमति जताई कि व्यवस्था को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया, लेकिन उसने यह भी कहा कि तमिल सिनेमा में हर चीज़ को नाटकीय अंदाज़ में दिखाना आम बात है। इसे 'कलात्मक स्वतंत्रता' (Artistic License) बताते हुए कोर्ट ने कहा कि कलाकार को किसी भी स्थिति को अपने तरीके से पेश करने का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि किसी डॉक्यूमेंट्री या प्रेजेंटेशन को ज़्यादा सख़्त पैमाने पर परखा जा सकता है, लेकिन किसी कलात्मक रचना को अलग पैमाने पर तोला जाएगा। ऐसे मामलों में कलाकार के पास ज़्यादा गुंजाइश और आज़ादी होती है।
कोर्ट ने आगे कहा,
“फ़िल्म कला की एक रचना है। कलाकार के पास खुद को ऐसे तरीके से व्यक्त करने की अपनी आज़ादी होती है, जो कानून में मना न हो। ऐसी मनाही को इशारों में समझकर किसी रचनात्मक सोच वाले व्यक्ति के अधिकारों को कुचला नहीं जाना चाहिए। अगर कानून के दायरे से बाहर जाकर किसी की बौद्धिक क्षमता और रचना की स्वाभाविक या सीखी हुई शक्ति में दखल दिया जाता है तो रचनात्मकता खत्म होने की राह पर चली जाती है; और जब रचनात्मकता मर जाती है तो सभ्यता के मूल्य भी खत्म हो जाते हैं।”
कोर्ट ने आगे कहा कि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को आज़ादी और अभिव्यक्ति का अधिकार देता है। इस आज़ादी का मतलब है कि कोई भी व्यक्ति बोलकर, लिखकर, छापकर, तस्वीरों के ज़रिए या किसी भी अन्य तरीके से अपनी राय व्यक्त कर सकता है। कोर्ट ने आगे कहा कि इस अधिकार में संवाद करने की आज़ादी और अपनी राय का प्रचार या प्रकाशन करने का अधिकार भी शामिल है।
इसके अलावा, कोर्ट ने गौर किया कि मौजूदा मामले में फ़िल्म को सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ फ़िल्म सर्टिफ़िकेशन (CBFC) ने आम लोगों के देखने के लिए मंज़ूरी दी थी। कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि जब CBFC ने फ़िल्म को कोर्ट की अवमानना नहीं माना और उसे सर्टिफ़िकेट दे दिया, तो कोई रिट याचिका उसकी राय की जगह नहीं ले सकती।
हालांकि, याचिकाकर्ता ने ज़ोर दिया कि कोर्ट फ़िल्म बनाने वालों के ख़िलाफ़ अवमानना की कार्रवाई करे, लेकिन कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि फ़िल्म बनाने वालों ने किसी असली कोर्ट की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाई और न ही उसकी सत्ता को कमज़ोर किया। यह देखा गया कि फ़िल्म बनाने वालों ने एक काल्पनिक कोर्ट के जजों और वकीलों को भ्रष्ट दिखाया था, न कि पूरे न्यायिक सिस्टम को।
इस तरह फ़िल्म पर रोक लगाने या उसे नियंत्रित करने का कोई आधार न पाते हुए कोर्ट ने याचिका खारिज की।
Case Title: RS Tamilvendan v The Secretary and others

