वसीयत में मामूली बदलाव अपने आप संदेह का आधार नहीं: मद्रास हाईकोर्ट

  • वसीयत में मामूली बदलाव अपने आप संदेह का आधार नहीं: मद्रास हाईकोर्ट

    मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि वसीयत में मामूली सुधार, अलग-अलग स्याही का इस्तेमाल या उसका पंजीकृत न होना, अपने आप में वसीयत की प्रामाणिकता पर संदेह करने का आधार नहीं है, खासकर जब वसीयतकर्ता की हस्तलिपि और हस्ताक्षर विवादित न हों।

    जस्टिस एन. सतीश कुमार और जस्टिस एम. जोथिरामन की पीठ ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली अपील पर यह टिप्पणी की।

    मामला डॉ. एस.जी. राजारथिनम की 12 पन्नों की हस्तलिखित वसीयत से जुड़ा था। उनकी बेटी ने वसीयत की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते हुए संपत्तियों में 1/5 हिस्से का दावा किया था।

    ट्रायल कोर्ट ने वसीयत साबित होने के बावजूद उसमें किए गए सुधार, अलग स्याही, पेज नंबर और वसीयत के पंजीकृत न होने जैसी परिस्थितियों को संदिग्ध मान लिया था।

    हाईकोर्ट ने कहा कि वसीयतकर्ता ने अपनी हस्तलिपि में संपत्तियों के बंटवारे पर विस्तार से विचार किया था, जिससे पता चलता है कि उसने सोच-समझकर वसीयत तैयार की।

    वसीयत का पंजीकरण जरूरी नहीं

    कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि वसीयतकर्ता ने पहले कुछ दस्तावेज पंजीकृत कराए थे, यह नहीं माना जा सकता कि इस वसीयत का भी पंजीकरण जरूरी था। वसीयत को पंजीकृत करना है या नहीं, यह वसीयतकर्ता की इच्छा पर निर्भर करता है।

    कोर्ट ने Evidence Act की Section 69 के तहत वसीयत के प्रमाण को भी पर्याप्त माना।

    हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा वसीयत को लेकर जताए गए संदेहों को खारिज करते हुए संबंधित 1/5 हिस्से की preliminary decree रद्द कर दी, हालांकि कुछ अन्य हिस्सों से जुड़े आदेश को बरकरार रखा।

    अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया गया।

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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