धर्म के नाम पर नदियों को प्रदूषित करने का अधिकार नहीं: मद्रास हाईकोर्ट

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    मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि धार्मिक अनुष्ठानों के नाम पर किसी भी व्यक्ति को जल स्रोतों को प्रदूषित करने का अधिकार नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता जनस्वास्थ्य के अधीन है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर धार्मिक अधिकारों का प्रयोग नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस बी. पुगालेंधी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी तमिराबरानी नदी में श्राद्ध कर्म के दौरान बड़ी मात्रा में कपड़े और अन्य सामग्री फेंके जाने पर चिंता जताते हुए की। अदालत ने कहा कि तमिलनाडु पब्लिक हेल्थ एक्ट, 1939 और वाटर (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ पॉल्यूशन) एक्ट, 1974 जल स्रोतों को प्रदूषित करने पर रोक लगाते हैं।

    सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि नदी में प्रतिदिन एक टन से अधिक कपड़े फेंके जा रहे हैं, जिससे ई-कोलाई बैक्टीरिया पनपने का खतरा बढ़ रहा है। साथ ही इंडियन ब्लैक टर्टल और इंडियन फ्लैपशेल टर्टल जैसे कछुए कपड़ों में फंसकर मर रहे हैं और नदी में फेंके गए कांच के फोटो फ्रेम जलीय जीवों के लिए भी खतरा बन रहे हैं।

    हालांकि, कोर्ट ने इस धार्मिक प्रथा को अंधविश्वास नहीं बताया और कहा कि मामला धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है। इसलिए सभी हितधारकों को सुने बिना अंतिम आदेश नहीं दिया जाएगा। अदालत ने तिरुनेलवेली जिला प्रशासन को लोगों को जागरूक करने और नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए व्यावहारिक सुझाव पेश करने का निर्देश दिया।

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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