RSS रूट मार्च को मद्रास हाईकोर्ट की मंजूरी का रास्ता साफ, पुलिस 19 अक्टूबर तक देगी अनुमति

  • RSS रूट मार्च को मद्रास हाईकोर्ट की मंजूरी का रास्ता साफ, पुलिस 19 अक्टूबर तक देगी अनुमति

    मद्रास हाईकोर्ट ने शुक्रवार (16 अक्टूबर) को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के रूट मार्च का रास्ता साफ कर दिया। कोर्ट को तमिलनाडु के एडवोकेट जनरल ने बताया कि पुलिस आयोजकों की ओर से दिए गए आवेदन और अन्य विवरणों पर विचार करने के बाद सोमवार (19 अक्टूबर) तक मार्च की अनुमति दे देगी।

    जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन ने इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए याचिका का निपटारा कर दिया। कोर्ट ने कहा कि रूट मार्च 25 अक्टूबर और 1 नवंबर को आयोजित किए जाएंगे। हालांकि, स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर पुलिस आवश्यक बदलाव कर सकती है। कोर्ट ने आयोजकों को मार्च से जुड़ी सभी जरूरी जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया।

    भविष्य में अनुमति के लिए अदालत आने की जरूरत न पड़े: हाईकोर्ट

    हाईकोर्ट ने तमिलनाडु पुलिस को निर्देश दिया कि पहले से तय दिशानिर्देशों को ध्यान में रखते हुए भविष्य में RSS के रूट मार्च की अनुमति को बिना उचित कारण खारिज न किया जाए। कोर्ट ने संगठन को भी निर्देश दिया कि वह कार्यक्रमों के लिए पहले से आवेदन करे और पुलिस उन आवेदनों पर समय रहते निर्णय ले।

    कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में जो उम्मीद जताई थी और जिसे मद्रास हाईकोर्ट ने भी दोहराया था, वह अब फिर से जगी है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि पुलिस को भविष्य में RSS के मार्च की अनुमति खारिज नहीं करनी चाहिए, जिससे संगठन को बार-बार अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े। साथ ही, RSS को भी विजयादशमी की तारीख पहले से पता होती है, इसलिए उसे समय रहते आवेदन करना चाहिए।

    पुलिस के इनकार के कारणों पर कोर्ट की टिप्पणी

    यह याचिका RSS के उत्तर तमिलनाडु राज्य सचिव वी.जी. जगदीशन ने दायर की थी। याचिका में कहा गया कि तमिलनाडु पुलिस ने संगठन को 18 अक्टूबर, 25 अक्टूबर, 1 नवंबर या किसी अन्य तारीख पर वर्दी पहनकर और बैंड के साथ रूट मार्च निकालने तथा उसके बाद सार्वजनिक सभा आयोजित करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था।

    याचिकाकर्ता के अनुसार, RSS देशभर में ऐसे मार्च आयोजित करता रहा है, लेकिन तमिलनाडु में 2022 से उसे अनुमति नहीं दी जा रही थी, जिसके कारण संगठन को बार-बार अदालत का रुख करना पड़ा।

    सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस के अनुमति खारिज करने के आदेश का भी परीक्षण किया। इसमें अन्य समुदायों के धार्मिक स्थलों की मौजूदगी, ट्रैफिक जाम और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जैसे कारण दिए गए थे। कोर्ट ने कहा कि पहले के मामलों में इन कारणों पर विचार किया जा चुका है और इन्हें अनुमति से इनकार करने के लिए अपर्याप्त बताया गया था।

    कोर्ट ने टिप्पणी की कि तमिलनाडु पुलिस ने अनुमति खारिज करने के लिए कोई नया कारण नहीं दिया, बल्कि उन्हीं कारणों को दोहराया जिन्हें पहले ही कमजोर आधार माना जा चुका है।

    मौलिक अधिकारों को खत्म करने के लिए राज्य कानून का इस्तेमाल नहीं हो सकता

    कोर्ट ने तमिलनाडु पुलिस (सुधार) अधिनियम, 2013 के आधार पर अनुमति खारिज किए जाने पर भी सवाल उठाए। जस्टिस लक्ष्मीनारायणन ने कहा कि इस कानून पर पहले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट विचार कर चुके हैं। कोर्ट के अनुसार, राज्य का कानून RSS के रूट मार्च निकालने के अधिकार को समाप्त करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत शांतिपूर्वक और बिना हथियार के एकत्र होने के अधिकार पर प्रतिबंध केवल कानून के माध्यम से लगाया जा सकता है, और ऐसा कानून अनुच्छेद 19(3) की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि पहले निर्धारित दिशानिर्देशों का उद्देश्य अनावश्यक मुकदमेबाजी रोकना था, लेकिन राज्य ने उन्हीं दिशानिर्देशों का हवाला देकर अनुमति देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने इस रवैये की तुलना ऐसी स्थिति से की, जिसमें ऑपरेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले औजार का इस्तेमाल मरीज को ठीक करने के बजाय उसे नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाए।

    अंततः, एडवोकेट जनरल के आश्वासन और पुलिस द्वारा स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक बदलाव किए जाने की संभावना को रिकॉर्ड पर लेते हुए हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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