जजों को ऑनलाइन किया जा रहा टार्गेट: मद्रास हाईकोर्ट ने पुलिस को ऑनलाइन कंटेंट पर नज़र रखने का दिया निर्देश

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    मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया कि वह ऐसी किसी भी सार्वजनिक सभा या मार्च की अनुमति न दे, जिसका उद्देश्य किसी मौजूदा जज को निशाना बनाना, उनकी बदनामी करना या उन्हें डराना-धमकाना हो। [2026 LiveLaw (Mad) 521]

    चीप जस्टिस एस.ए. धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने कहा कि हालांकि नागरिकों को किसी फैसले की आलोचना करने का अधिकार है, लेकिन आलोचना करने और फैसला लिखने वाले जज पर हमला करने के बीच एक स्पष्ट रेखा होनी चाहिए।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी जज के खिलाफ अपमानजनक, मानहानिकारक या जाति-आधारित हमले, संविधान के तहत मिलने वाली 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के दायरे में नहीं आते हैं।

    कोर्ट ने कहा,

    "नागरिकों को किसी फैसले से असहमत होने का पूरा अधिकार है। हालांकि, किसी कानूनी निष्कर्ष की आलोचना करने और उसे लिखने वाले जज पर व्यक्तिगत रूप से हमला करने के बीच एक स्पष्ट कानूनी रेखा है। अगर किसी मौजूदा जज को निशाना बनाने के लिए अपमानजनक, मानहानिकारक या जाति-आधारित भाषा का इस्तेमाल किया जाता है, तो ऐसी सुनियोजित कार्रवाई 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के संरक्षण में नहीं आती। ये भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत लगाई गई उचित पाबंदियों का उल्लंघन हैं।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि अदालती आदेशों पर सार्वजनिक चर्चाओं पर पूरी तरह से प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि ऐसा करना लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का उल्लंघन होगा। हालांकि, राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि ऐसी सार्वजनिक सभाओं का इस्तेमाल न्यायिक संस्था की गरिमा और अखंडता को खतरे में डालने के लिए न किया जाए।

    कोर्ट ने कहा,

    "अदालती फैसलों से जुड़ी सभी सार्वजनिक चर्चाओं या शांतिपूर्ण सभाओं पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना बहुत कठोर कदम होगा। यह वैध लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का उल्लंघन करेगा। हालांकि, राज्य सरकार की यह सख्त जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि सार्वजनिक स्थानों और डिजिटल नेटवर्क का इस्तेमाल हमारी न्यायिक संस्थाओं की सुरक्षा और अखंडता को खतरे में डालने के लिए न किया जाए।"

    इस प्रकार, कोर्ट ने राज्य पुलिस और जिला प्रशासन को निर्देश दिया कि वे न्यायिक मामलों से जुड़ी सार्वजनिक सभाओं, मार्च और विरोध प्रदर्शनों के लिए मिलने वाले सभी आवेदनों की, BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) और स्थानीय पुलिस कानूनों के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, हर मामले के आधार पर (case-by-case) सख्ती से जांच करें।

    कोर्ट ने राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वह ऐसी किसी भी सार्वजनिक सभा को अनुमति न दे, जिसका उद्देश्य किसी जज को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाना हो। अदालत ने कहा कि अगर कोई सार्वजनिक सभा व्यक्तिगत हमले का रूप ले लेती है तो संबंधित अधिकारियों को तुरंत उस कार्यक्रम को समाप्त कर देना चाहिए और उचित कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए।

    बता दें, अदालत ने यह निर्देश आर. कार्तिकेयन द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर दिए । याचिकाकर्ता ने राज्य और कानून लागू करने वाली एजेंसियों से मांग की थी कि वे मौजूदा जजों को निशाना बनाने वाले संगठित सार्वजनिक अभियानों के खिलाफ रोकथाम और दंडात्मक कार्रवाई करें।

    याचिकाकर्ता ने न्यायिक कार्यवाही या संवैधानिक अदालतों और मौजूदा जजों को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने वाली सार्वजनिक सभाओं, जुलूसों और प्रदर्शनों की अनुमति देने के संबंध में उचित दिशानिर्देश बनाने की भी मांग की थी।

    याचिकाकर्ता ने ऐसे संगठित अभियानों, सार्वजनिक सभाओं, जुलूसों, प्रदर्शनों, भाषणों, सोशल मीडिया पोस्ट या अन्य गतिविधियों के खिलाफ प्रभावी रोकथाम और दंडात्मक कदम उठाने की मांग की थी, जो न्यायपालिका को बदनाम करते हों, डराते-धमकाते हों या उसकी गरिमा को कम करते हों, अथवा जो हाई कोर्ट या किसी संवैधानिक अदालत के किसी मौजूदा जज को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाते हों।

    याचिकाकर्ता ने ऐसे सभी मामलों में उचित आपराधिक केस दर्ज करने और निष्पक्ष व त्वरित जांच कराने की भी मांग की। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने 'तमिलनाडु तौहीद जमात' (TNTJ) और 'तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कझगम' (TMMK) के पदाधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की, क्योंकि उन्होंने हाईकोर्ट के एक मौजूदा जज के खिलाफ सार्वजनिक सभाएं आयोजित की थीं।

    याचिकाकर्ता ने बताया कि मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच द्वारा धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण के लाभों के संबंध में एक आदेश पारित किए जाने के बाद उस बेंच के एक जज के खिलाफ बड़े पैमाने पर सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शन हुए।

    याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ये विरोध-प्रदर्शन व्यक्तिगत, शत्रुतापूर्ण और मानहानि करने वाले अभियानों में बदल गए। याचिकाकर्ता ने बताया कि इन सभाओं में अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया और जाति-आधारित टिप्पणियां की गईं, जिनका मकसद न्याय प्रशासन में जनता के भरोसे को कम करना था।

    Case Title : R Karthikeyan v The Union of India and Others

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