ChatGPT शिक्षक का विकल्प नहीं, कक्षा में पढ़ाई का कोई विकल्प नहीं: मद्रास हाईकोर्ट
Praveen Mishra
18 Jun 2026 1:33 PM IST

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु डॉ. अंबेडकर लॉ यूनिवर्सिटी के उन छात्रों को राहत देने वाले एकल न्यायाधीश के आदेश को रद्द कर दिया, जिन्हें अनिवार्य उपस्थिति पूरी न होने के बावजूद कक्षाओं और परीक्षाओं में शामिल होने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने कहा कि ऑनलाइन शिक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित उपकरण, जैसे ChatGPT, कभी भी योग्य शिक्षकों और जीवंत कक्षा वातावरण का विकल्प नहीं बन सकते।
जस्टिस एस.एम. सुब्रमण्यम और जस्टिस एन. सेंथिलकुमार की खंडपीठ ने कहा कि नियमित रूप से कक्षाओं में उपस्थित रहने से छात्रों में अनुशासन, समयपालन, सामाजिक व्यवहार और सक्रिय सहभागिता जैसे गुण विकसित होते हैं, जिन्हें ऑनलाइन माध्यम से नहीं सिखाया जा सकता।
अदालत ने कहा, “ऑनलाइन कक्षाएं आवश्यकता पड़ने पर सीखने का माध्यम हो सकती हैं, लेकिन वे भौतिक कक्षाओं का विकल्प नहीं हैं। ChatGPT या कोई अन्य AI उपकरण किसी योग्य शिक्षक के बराबर नहीं हो सकता। कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव बुद्धि के करीब पहुंच सकती है, लेकिन वह ईमानदारी, नैतिकता और पेशेगत मूल्यों जैसे गुण नहीं सिखा सकती, जो विधि व्यवसाय की आधारशिला हैं।”
पीठ ने कहा कि विधि शिक्षा केवल रोजगार या धन अर्जित करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह छात्रों को समाज और संविधान के प्रति जिम्मेदारी का बोध कराती है। अदालत के अनुसार, कक्षा में होने वाली बहसें, विचार-विमर्श और सामाजिक संवाद ही नए कानूनी विचारों और दृष्टिकोणों को जन्म देते हैं।
मामला उन छात्रों से जुड़ा था जिन्होंने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) नियमों के तहत निर्धारित न्यूनतम उपस्थिति पूरी नहीं की थी। छात्रों ने याचिका दायर कर विश्वविद्यालय के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें शैक्षणिक वर्ष दोबारा करने के लिए कहा गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि BCI नियमों के अनुसार कानून के छात्रों के लिए 70 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य है और पर्याप्त कारण होने पर अधिकतम 5 प्रतिशत की छूट दी जा सकती है। इसके बाद भी न्यूनतम 65 प्रतिशत उपस्थिति आवश्यक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इससे अधिक छूट देना नियमों के उद्देश्य को ही विफल कर देगा।
पीठ ने यह भी कहा कि जो छात्र नियमित रूप से कक्षाओं में उपस्थित रहते हैं और निर्धारित उपस्थिति पूरी करते हैं, उनके साथ समानता के सिद्धांत के तहत अन्य छात्रों को विशेष राहत नहीं दी जा सकती।
इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने विश्वविद्यालय अधिकारियों की अपील स्वीकार करते हुए एकल न्यायाधीश के आदेश को रद्द कर दिया और अनिवार्य उपस्थिति नियमों को बरकरार रखा।

