तमिलनाडु राष्ट्र की मांग राजद्रोह नहीं, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या: मद्रास हाईकोर्ट
Shahadat
4 July 2026 3:27 PM IST

मद्रास हाईकोर्ट ने एक पब्लिशिंग हाउस के ख़िलाफ़ दर्ज देशद्रोह का मामला रद्द किया। इस पब्लिशिंग हाउस ने ऐसी किताब छापी थी, जिसमें कहा गया था कि तमिलनाडु को एक अलग देश होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि आज के समय में ऐसे बयान को देश या सरकार के प्रति नफ़रत के तौर पर नहीं देखा जा सकता। [2026 LiveLaw (Mad) 297]
जस्टिस भरत चक्रवर्ती ने कहा कि भारत दिल और आत्मा से एकजुट है। ऐसे बयानों से मौजूदा सामाजिक माहौल में ज़्यादा से ज़्यादा झुंझलाहट हो सकती है। ऐसा बयान देने वाले व्यक्ति को मानसिक स्वास्थ्य की समस्या वाला व्यक्ति ही माना जाएगा। कोर्ट ने आगे कहा कि आज के समय में ऐसे वाक्य से जनता के बीच कोई नफ़रत नहीं फैलेगी।
कोर्ट ने कहा,
"लेकिन आज के हालात में भारत एक देश के तौर पर दिल और आत्मा से एकजुट है। अगर कोई व्यक्ति तमिलनाडु को अलग देश बनाने की बात करता है तो निश्चित रूप से उसे मानसिक स्वास्थ्य की समस्या वाला व्यक्ति माना जाएगा और इससे आम जनता के बीच कोई नफ़रत नहीं फैलेगी। ज़्यादा से ज़्यादा इससे झुंझलाहट हो सकती है, इसलिए मौजूदा सामाजिक माहौल में उस वाक्य को छापने मात्र को देश या भारत सरकार के ख़िलाफ़ नफ़रत भड़काने वाला नहीं माना जा सकता।"
कोर्ट दो व्यक्तियों - कीरा उर्फ़ मूर्ति और तमिल बाला - द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था। वे चेन्नई में मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट में अपने ख़िलाफ़ लंबित मामले को रद्द करवाना चाहते थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, याचिकाकर्ता एक पब्लिशिंग हाउस चला रहे थे जिसने तमिलरसन के जीवन पर आधारित एक किताब जारी की थी।
आरोप है कि किताब में कहा गया था कि 1967 में तमिलरसन ने घोषणा की थी कि तमिलनाडु राज्य को एक अलग देश होना चाहिए, और अलग होने के लिए गुरिल्ला युद्ध का तरीका अपनाना चाहिए। यह मानते हुए कि यह बयान देशद्रोह के दायरे में आता है, मामला दर्ज किया गया।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इसी तरह के एक मामले में हाईकोर्ट की एक डिवीज़न बेंच ने माना था कि IPC की धारा 124 (A) के कड़े प्रावधान मौजूदा सामाजिक माहौल के अनुकूल नहीं हैं और चार्जशीट रद्द कर दी थी। याचिकाकर्ताओं ने अनुरोध किया कि मौजूदा मामले में भी वही पैमाना अपनाया जाना चाहिए। हालांकि, राज्य ने याचिका का विरोध किया और तर्क दिया कि यह बयान देशद्रोह के दायरे में आएगा और मामले में चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी है।
अदालत ने गौर किया कि सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि देशद्रोह के मामलों में संबंधित कार्यों को मौजूदा सामाजिक माहौल और उस दौर के संदर्भ में देखा जाना चाहिए जिसमें हम जी रहे हैं। अदालत ने आगे कहा कि भले ही इस मामले जैसा बयान 1967 में दिए जाने पर सरकार के प्रति नफरत या अवमानना भड़काने वाला माना जाता, लेकिन मौजूदा हालात में इसे देशद्रोह नहीं माना जाएगा।
इस प्रकार, अदालत की राय थी कि याचिकाकर्ता राहत पाने के हकदार हैं, इसलिए याचिका स्वीकार कर ली गई।
Case Title: Keera @ Moorthi and Another v The State and Another


