'शब्द सही नहीं थे, लेकिन धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कोई इरादा नहीं': माता सीता पर टिप्पणी मामले में व्यक्ति को राहत
Shahadat
21 July 2026 6:32 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक प्रोग्राम होस्ट को अग्रिम ज़मानत (Anticipatory Bail) दी। उन पर माता सीता के अपहरण से जुड़ी एक कविता (दोहा) सुनाकर धार्मिक दुश्मनी को बढ़ावा देने का आरोप था। कोर्ट ने कहा कि भले ही शब्दों का चुनाव सही न रहा हो, लेकिन पहली नज़र में इससे यह नहीं लगता कि उनका इरादा लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने या सांप्रदायिक अशांति फैलाने का था। [2026 LiveLaw (MP) 289]
जस्टिस देवनारायण मिश्रा ने कहा:
"वीडियो से यह साफ़ है कि आवेदक/कवि ने स्पष्ट रूप से कहा कि लंका की महिलाएं इस तरह चर्चा कर रही थीं कि माता सीता पूरी लंका का विनाश कर देंगी। जिस संदर्भ में वह दोहा सुनाया गया, उसमें शब्दों का चुनाव शायद सही न हो, लेकिन इस स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता कि आवेदक का इरादा लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का था या वह धर्म के आधार पर लोगों के बीच कोई गड़बड़ी, दंगा, झगड़ा या अशांति फैलाना चाहता था।"
कोर्ट भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353 के तहत दर्ज FIR के सिलसिले में अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी पर सुनवाई कर रहा था। इस धारा के तहत ऐसे बयानों के लिए सज़ा का प्रावधान है जिनसे सार्वजनिक अशांति फैलती है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आवेदक यू.एस. एग्रो सीड्स कंपनी द्वारा आयोजित प्रोग्राम को होस्ट कर रहा था, जिसमें भक्ति गायिका शहनाज़ अख्तर परफॉर्म कर रही थीं। परफॉर्मेंस के दौरान एक ब्रेक में आवेदक ने कथित तौर पर माता सीता के अपहरण से जुड़ा एक दोहा सुनाया और कुछ ऐसी टिप्पणियां कीं, जिन्हें भगवान राम और माता सीता के प्रति अपमानजनक माना गया।
आवेदक के वकील ने तर्क दिया कि वह केवल सीता के अपहरण के बाद लंका के निवासियों के बीच हुई बातचीत का वर्णन कर रहा था और यह बताना चाहता था कि रावण की पत्नी मंदोदरी भी इस घटना से डरी हुई। यह तर्क दिया गया कि "सीता नाश कराएगी" शब्द उस वर्णन का हिस्सा थे और आवेदक के निजी विचार नहीं थे।
आवेदक ने आगे कहा कि दर्शकों में से कुछ लोगों द्वारा आपत्ति जताए जाने के बाद उसने तुरंत माफ़ी मांग ली थी। एक वीडियो रिकॉर्डिंग भी पेश की गई, जिसमें उसे सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त करते और माफ़ी माँगते हुए दिखाया गया।
याचिका का विरोध करते हुए राज्य ने तर्क दिया कि आरोप गंभीर प्रकृति के थे और अग्रिम ज़मानत देने से समाज में गलत संदेश जाएगा, जिससे ऐसे गैर-जिम्मेदाराना बयानों को बढ़ावा मिलेगा जो बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं को आहत कर सकते हैं।
मामले के तथ्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद अदालत ने माना कि इस चरण पर ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे यह संकेत मिले कि आवेदक की मंशा धार्मिक भावनाओं को आहत करने या धार्मिक आधार पर अशांति फैलाने की थी।
तदनुसार, अदालत ने अग्रिम ज़मानत याचिका को मंज़ूरी दी।
Case Title: Sandeep Kumar v State of Madhya Pradesh, MCRC No-29490-2026


