पत्नी अपने पति की सहमति या किसी कानूनी/मेडिकल आदेश के बिना उसे नशा मुक्ति केंद्र में कैद करने की अनुमति नहीं दे सकती: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Shahadat
22 Oct 2026 8:08 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि निजी पुनर्वास केंद्रों (रिहैबिलिटेशन सेंटर्स) के पास केवल जीवनसाथी (पति या पत्नी) की सहमति के आधार पर किसी व्यक्ति को कैद रखने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। [2026 लाइव लॉ (MP) 423]
इस बात पर जोर देते हुए कि किसी व्यक्ति को नशा मुक्ति केंद्र में केवल उसकी अपनी मर्जी से या किसी सक्षम कानूनी या मेडिकल आदेश के तहत ही भर्ती किया जा सकता है, जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ ने टिप्पणी की:
"किसी निजी पुनर्वास केंद्र के पास केवल जीवनसाथी की सहमति के आधार पर किसी व्यक्ति को कैद रखने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। किसी वयस्क को नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती करने के लिए या तो उसकी अपनी स्वेच्छा होनी चाहिए, या फिर कोई सक्षम कानूनी या मेडिकल आदेश होना चाहिए; लेकिन इस मामले में ये दोनों ही चीजें पूरी तरह से नदारद हैं।"
याचिकाकर्ता ने अपने छोटे भाई को निजी पुनर्वास केंद्र (प्रतिवादी संख्या 4) की कथित कैद से मुक्त कराने के लिए हाईकोर्ट में 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर की। आरोप है कि केंद्र ने उस व्यक्ति को उसकी पत्नी (प्रतिवादी संख्या 5) के कहने पर कैद कर रखा था।
तथ्यों के अनुसार, उस व्यक्ति और उसकी पत्नी के बीच रिश्ते बहुत खराब थे और वे अलग-अलग रह रहे थे। उस व्यक्ति ने पहले भी अपनी पत्नी और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ शारीरिक हमले और उत्पीड़न को लेकर कई पुलिस शिकायतें दर्ज कराई थीं। 7 सितंबर 2026 को पत्नी ने कथित तौर पर उस व्यक्ति को अपने घर बुलाया और उसे निजी पुनर्वास केंद्र में अवैध रूप से कैद किया।
याचिकाकर्ता ने बताया कि अगले दिन वह अपने भाई को छुड़ाने के लिए उस केंद्र में गया, लेकिन वहां के लोगों ने साफ तौर पर मना कर दिया। इसके बाद उसने स्थानीय पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। यह भी बताया गया कि उस व्यक्ति के शरीर के बाईं ओर लकवा (पैरालिसिस) है और उसे विशेष न्यूरोलॉजिकल देखभाल की जरूरत है।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि वह व्यक्ति न तो नशे का आदी है और न ही उसे जबरन इलाज की कोई आवश्यकता है। यह दलील दी गई कि पत्नी ने गलत इरादे से व्यक्ति को कैद कर रखा है ताकि उसकी संपत्ति हड़प सके। यह कैद संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि वह व्यक्ति नशे का आदी है, जिसकी वजह से उसे कई सालों से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं। यह भी कहा गया कि नशे की हालत में वह अक्सर पत्नी को शारीरिक चोट पहुंचाता था, इसलिए अपनी जान बचाने के लिए पत्नी ने उसे उस केंद्र (फैसिलिटी) में भर्ती कराया।
खंडपीठ ने अदालत के आदेश पर तैयार की गई मेडिकल रिपोर्ट की जांच की। इसमें पाया गया कि 'मेंटल स्टेट एग्जामिनेशन' (मानसिक स्थिति की जांच) में कोई गंभीर मानसिक विकार नहीं दिखा, लेकिन शारीरिक जांच में शरीर के बाईं ओर कुछ कमजोरी (हेमिपेरेसिस) पाई गई। खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि वह व्यक्ति किसी ऐसी मानसिक बीमारी या नशे की लत से पीड़ित है, जिसके लिए उसे जबरन किसी केंद्र में रखा जाना जरूरी हो।
खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की इस दलील को सही माना कि व्यक्ति की 'सहमति' (Informed Consent) नहीं ली गई।
इस दावे को खारिज करते हुए कि वह केंद्र 'स्वेच्छा से' (Free Will) रहने की जगह थी, खंडपीठ ने कहा,
"अगर वह व्यक्ति सच में अपनी मर्जी से वहां रह रहा होता तो केंद्र के पास उसे बाहर जाने से रोकने का कोई अधिकार नहीं होता।"
इस प्रकार, मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट से यह स्पष्ट होने पर कि कोई गंभीर मानसिक विकार नहीं है, खंडपीठ ने माना कि उस व्यक्ति को अवैध रूप से कैद करके रखा गया। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
इसके अनुसार, अदालत ने रिट याचिका स्वीकार की और केंद्र को निर्देश दिया कि वे उस व्यक्ति को रिहा कर दें।
Case Title : RP v State of MP

