क्लोजर रिपोर्ट खारिज करने से पहले भी पीड़ित की बात सुनी जानी चाहिए: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Shahadat
18 Jun 2026 7:53 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि क्लोजर रिपोर्ट पर फैसला लेने से पहले पीड़ित या शिकायतकर्ता को अपनी बात रखने का प्रभावी मौका दिया जाना चाहिए, भले ही कोर्ट आखिर में रिपोर्ट को खारिज ही क्यों न कर दे। [2026 LiveLaw (MP) 216]
यह मानते हुए कि सिर्फ़ इसलिए प्रक्रियात्मक निष्पक्षता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि नतीजा पीड़ित के पक्ष में है, कोर्ट ने स्पेशल जज के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें SIT की क्लोजर रिपोर्ट खारिज कर दी गई। कोर्ट ने मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए वापस भेज दिया, जिसमें पीड़ित की बात सुनना और उसे क्लोजर रिपोर्ट व उससे जुड़ी सामग्री उपलब्ध कराना शामिल है।
यह घटनाक्रम एक आदिवासी युवक की अप्राकृतिक मौत के मामले में हुआ, जिसमें स्पेशल (SC/ST Act) कोर्ट ने पीड़ित को सुनवाई का मौका दिए बिना सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित SIT की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया था।
जस्टिस हिमांशु जोशी की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के 'भगवंत सिंह बनाम पुलिस कमिश्नर' (1985 2 SCC 537) मामले का हवाला देते हुए दोहराया कि जब कोर्ट केस बंद करने की मांग वाली पुलिस रिपोर्ट पर विचार कर रही हो तो कोई भी अंतिम फैसला लेने से पहले शिकायतकर्ता को नोटिस और सुनवाई का मौका दिया जाना चाहिए।
बेंच ने आगे ज़ोर देते हुए कहा,
"भगवंत सिंह (ऊपर उल्लिखित) मामले में बताया गया सिद्धांत कोई मामूली प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह 'ऑडी अल्टरम पार्टम' (audi alteram partem - दूसरे पक्ष को भी सुनें) के सिद्धांत का विस्तार है, जो प्राकृतिक न्याय के बुनियादी स्तंभों में से एक है। सुनवाई का अधिकार फैसला लेने की प्रक्रिया से पहले होना चाहिए और फैसले के बाद दी गई सफाई से इसकी जगह नहीं ली जा सकती। प्रक्रिया में निष्पक्षता के लिए ज़रूरी है कि प्रभावित पक्ष को अपनी आपत्तियां रखने का मौका दिया जाए, इससे पहले कि अथॉरिटी किसी नतीजे पर पहुंचे"।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब मृतक नीलेश आदिवासी ने 1 जुलाई, 2025 को सागर ज़िले में एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई, लेकिन बाद में 14 जुलाई को अपने बयानों के साथ शिकायत वापस ले ली। इसके बाद 25 जुलाई, 2025 को उसने आत्महत्या कर ली। उसकी पत्नी का दावा था कि उसने पूर्व गृह मंत्री और उनके सहयोगियों के दबाव, धमकी और उत्पीड़न के कारण शिकायत वापस ली थी।
हालांकि, मृतक के भाई का दावा था कि गोविंद सिंह राजपूत और उनके तीन अन्य सहयोगी इसके लिए ज़िम्मेदार थे। यह भी आरोप था कि राजपूत ने आदिवासी व्यक्ति के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया, जिसके बाद राजपूत के खिलाफ FIR दर्ज की गई। इसके बाद पीड़ित का अपहरण कर लिया गया और कुछ वीडियो सामने आए, जिनमें वह एक होटल के कमरे में ज़मीन पर बैठा और खून से लथपथ दिखाई दे रहा था।
इसके बाद पत्नी ने शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन पुलिस अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की। इसलिए उसने FIR दर्ज करने और जांच के लिए एक स्पेशल टीम बनाने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया। आखिरकार, 4 सितंबर 2025 को गोविंद सिंह राजपूत समेत 4 लोगों के खिलाफ उसकी शिकायत को FIR के तौर पर दर्ज किया गया।
इस बीच राजपूत ने हाई कोर्ट से अग्रिम ज़मानत (anticipatory bail) मांगी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट गए, जिसने मामले में विसंगतियों को देखते हुए जांच करने और स्पेशल जज (SC/ST Act) को रिपोर्ट सौंपने के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) का गठन किया।
SIT ने मामले की जांच की और स्पेशल जज के सामने क्लोज़र रिपोर्ट (मामला बंद करने की रिपोर्ट) पेश की, जिसमें कहा गया कि राजपूत और सह-आरोपियों के खिलाफ आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। लेकिन स्पेशल जज ने रिपोर्ट स्वीकार करने से इनकार कर दिया और ज़रूरी निर्देश जारी किए।
इसके बाद मृतक की पत्नी ने इस याचिका के ज़रिए हाईकोर्ट का रुख किया, इस आधार पर कि क्लोज़र रिपोर्ट पर विचार करते समय उसे अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया। इसी दौरान, गोविंद सिंह राजपूत ने FIR दर्ज करने और क्लोज़र रिपोर्ट खारिज किए जाने को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया।
आरोपी राजपूत के वकील ने तर्क दिया कि विवादित आदेश 'नॉन-स्पीकिंग' (बिना कारण बताए दिया गया) था, जिसमें यह विस्तार से नहीं बताया गया कि क्लोज़र रिपोर्ट क्यों खारिज की गई। वकील ने आगे तर्क दिया कि जब कोई अदालत क्लोज़र रिपोर्ट से असहमत होती है तो उसे सबूतों की जांच करनी चाहिए, जांच का मूल्यांकन करना चाहिए और विस्तृत कारण बताने चाहिए।
वकील ने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई SIT में सीनियर IPS अधिकारी शामिल थे और इसे निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया, इसलिए जज को इसके नतीजों को खारिज करने से पहले ठोस कारण बताने चाहिए।
वकील ने क्लोजर रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें मृतक की आत्महत्या से जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं मिला, इसलिए उनके खिलाफ कोई मामला नहीं चलना चाहिए।
वहीं, मृतक की पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि मुख्य शिकायतकर्ता होने के नाते, उन्हें क्लोजर रिपोर्ट की कॉपी, जांच से जुड़ी सामग्री और आपत्तियां दर्ज करने के लिए सुनवाई का मौका मिलना चाहिए।
वकील ने आगे तर्क दिया कि SIT ने मामले की जांच करते समय सभी घटनाओं पर विचार नहीं किया। पत्नी के अनुसार, मूल FIR, मृतक द्वारा अपने आरोपों को वापस लेना, प्रभावशाली लोगों द्वारा जबरदस्ती, दबाव और डराना-धमकाना और आत्महत्या - इन सभी को आपस में जुड़ी हुई घटनाओं के रूप में देखा जाना चाहिए और इनकी जांच भी उसी तरह की जानी चाहिए।
वकील ने आगे तर्क दिया कि SIT अहम मुद्दों पर विचार करने में विफल रही, जैसे कि उनके पति ने शुरू में अपने आरोप क्यों वापस लिए या क्या ऐसा करना जबरदस्ती था या अपनी मर्जी से।
राज्य के वकील ने तर्क दिया कि SIT ने अपनी जांच पूरी की और रिपोर्ट दाखिल की। उन्होंने तर्क दिया कि एक बार क्लोजर रिपोर्ट दाखिल हो जाने के बाद यह तय करना कोर्ट का काम है, न कि पुलिस का, कि इसे स्वीकार किया जाए या खारिज।
बेंच ने इस बात पर ध्यान दिया कि क्या क्लोजर रिपोर्ट पर विचार करने से पहले शिकायतकर्ता-पीड़ित को शामिल होने का मौका दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता केवल औपचारिक सूचना देने वाली व्यक्ति नहीं थी, बल्कि मृतक की विधवा थी। भगवंत सिंह (सुप्रा) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि पीड़ित की बात सुनने की ज़रूरत कोई मामूली प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह 'ऑडी अल्टरम पार्टम' (दूसरे पक्ष की बात भी सुनना) के सिद्धांत से आती है, जो प्राकृतिक न्याय का एक बुनियादी हिस्सा है।
कोर्ट ने कहा,
"न्यायिक राय बनाने से पहले सुनवाई का मौका दिया जाना चाहिए। अगर कोर्ट पहले किसी नतीजे पर पहुंचता है और फिर सुनवाई की ज़रूरत को गैर-ज़रूरी मानता है क्योंकि नतीजा एक पक्ष के पक्ष में है तो प्राकृतिक न्याय के नियम का मकसद ही खत्म हो जाता है। कार्यवाही का नतीजा हमेशा सुनवाई का मौका मिलने के बाद ही आना चाहिए, उससे पहले नहीं।"
यह देखते हुए कि स्पेशल जज ने आखिरकार क्लोजर रिपोर्ट खारिज की - जो पीड़ित के पक्ष में नतीजा था - हाईकोर्ट ने कहा कि प्रक्रियात्मक निष्पक्षता को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि नतीजे से किसी एक पक्ष को फायदा हुआ। इस तरह मामले के गुण-दोष पर कोई राय ज़ाहिर किए बिना बेंच ने स्पेशल जज के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें क्लोज़र रिपोर्ट खारिज कर दी गई; ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि मुख्य शिकायतकर्ता, रेवा आदिवासी को सुनवाई का असरदार मौका नहीं दिया गया।
Case Title: Govind Singh Rajpoot v State, Rewa Adivasi v State WP-10310-2026

