'बेटे' में सौतेला बेटा भी शामिल, मकान मालिक सौतेले बेटे की असली ज़रूरत के आधार पर किरायेदार को बेदखल कर सकता है: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Shahadat
14 Aug 2026 9:22 AM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि एक्ट की धारा 2 के तहत परिवार के सदस्य की परिभाषा में सौतेला बेटा भी शामिल है। इसलिए एमपी अकोमोडेशन कंट्रोल एक्ट, 1961 की धारा 12(1) के तहत बेदखली के मकसद से उसे 'बेटा' ही माना जाएगा। [2026 LiveLaw (MP) 323]
किरायेदार के खिलाफ बेदखली के मामले में ट्रायल कोर्ट के आदेश को बहाल करते हुए जस्टिस आशीष श्रोती की बेंच ने कहा कि मकान मालिक खुद के लिए या परिवार के किसी अन्य सदस्य (जिसमें सौतेला बेटा भी शामिल है) की असली ज़रूरत के आधार पर किरायेदार को बेदखल करने की मांग कर सकता है।
कोर्ट ने कहा,
"जब बेदखली के मामले में 'पालक बेटे' को 'बेटे' के अर्थ में शामिल किया जाता है, तो एक्ट की धारा 12(1)(e) और (f) के तहत ज़रूरत के मकसद से 'सौतेले बेटे' को शामिल न करने का कोई कारण नहीं है। इसलिए यह माना जाता है कि एक्ट की धारा 12(1)(e) और (f) के अर्थ में सौतेला बेटा भी 'बेटा' ही होगा।"
मामले के तथ्यों के अनुसार, वादी आनंद राव मटकाकरी की बेटी है, जो उस दुकान के असली मालिक थे। उनकी शादी आनंद कुमार से हुई और उन्होंने आशुतोष को गोद लिया, जो आनंद कुमार की पहली पत्नी आरती (जिनका निधन हो चुका है) से पैदा हुआ।
प्रतिवादी को 1972 में आनंद राव मटकाकरी ने गैर-आवासीय मकसद के लिए उस दुकान में किरायेदार के तौर पर रखा था। मटकाकरी की मौत के बाद प्रतिवादी वादी को किराया देने लगा, जिससे उनके बीच किरायेदार-मकान मालिक का रिश्ता बन गया।
वादी ने दुकान से प्रतिवादी को बेदखल करने के लिए मुकदमा दायर किया। उनका तर्क था कि एमपी अकोमोडेशन कंट्रोल एक्ट, 1961 की धारा 12(1)(f) के तहत आशुतोष को उस दुकान की ज़रूरत है।
ट्रायल कोर्ट ने मुकदमे में वादी के पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन अपीलीय अदालत ने उस फैसले को पलट दिया। अपीलीय अदालत ने माना कि वादी प्रतिवादी को घर खाली करने के लिए नहीं कह सकती, क्योंकि आशुतोष सौतेला बेटा होने के कारण धारा 2 के तहत परिवार के सदस्य की परिभाषा में नहीं आता है।
वादी के वकील ने तर्क दिया कि धारा 12 बेटे और सौतेले बेटे के बीच कोई भेदभाव नहीं करती।
वादी का विरोध करते हुए प्रतिवादियों के वकील ने गोपीनाथ नैनसुख बनाम गिरधरदास विशेष्वरदास [1977 MPLJ 358] मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि 'बेटा' शब्द में सौतेला बेटा शामिल नहीं है। वकील ने तर्क दिया कि संपत्ति पूरी तरह से वादी की थी, क्योंकि उसे यह संपत्ति बंटवारे में पिता से मिली थी, इसलिए उसके पति की पहली शादी से हुआ बेटा उन फायदों का हकदार नहीं होगा जो वादी के अपने बेटे को मिलते।
अदालत ने गौर किया कि मुख्य मुद्दा यह था कि "क्या एमपी एकोमोडेशन कंट्रोल एक्ट, 1961 की धारा 12(1)(f) के अर्थ में 'बेटा' शब्द में सौतेला बेटा भी शामिल होगा?"
अदालत ने देखा कि घर खाली कराने का मुकदमा 1961 के अधिनियम के तहत आता है और धारा 2(e) परिवार के सदस्य को परिभाषित करती है। इसमें जीवनसाथी, बेटा, अविवाहित बेटी, पिता, दादा, माँ, दादी, भाई, अविवाहित बहन, चाचा, चाचा की पत्नी या विधवा, या भाई का बेटा या अविवाहित बेटी जो साथ रह रहे हों, या उन पर निर्भर कोई अन्य रिश्तेदार शामिल हैं।
अदालत ने आगे देखा कि धारा 12(1) मकान मालिक की आवासीय और गैर-आवासीय उद्देश्यों के लिए वास्तविक ज़रूरत के आधार पर किरायेदार को घर खाली कराने का प्रावधान करती है। अदालत ने देखा कि इस धारा के तहत मकान मालिक खुद के लिए या अपने किसी बालिग बेटे या अविवाहित बेटी की वास्तविक ज़रूरत के आधार पर घर खाली कराने की मांग कर सकता है।
कोर्ट ने आगे कहा कि 'लक्ष्मण सिंह' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15 के तहत बिना वसीयत के मरने वाली हिंदू महिला की संपत्ति के बंटवारे पर विचार करते समय सौतेले बेटे को सगे बच्चे से नीचे का दर्जा दिया गया। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि विचार करने वाला मुद्दा यह था कि क्या उस मामले को 1961 के अधिनियम की धारा 12 पर लागू किया जा सकता है, जिसमें कोई महिला अपने जीवनकाल में अपने सौतेले बेटे के लिए विवादित जगह की मांग करती है।
इस प्रकार, बेंच ने कहा,
"आशुतोष, आनंद कुमार की पहली पत्नी से हुआ बेटा है। आनंद कुमार के साथ वादी की शादी को लेकर कोई विवाद नहीं है। वादी और आशुतोष के बीच कोई झगड़ा नहीं है। इसलिए सिर्फ़ इसलिए कि आशुतोष वादी की कोख से पैदा नहीं हुआ, यह नहीं कहा जा सकता कि वादी आशुतोष की ज़रूरत के लिए प्रतिवादियों को बेदखल करने की मांग नहीं कर सकती।"
इसलिए कोर्ट ने माना कि अपीलीय कोर्ट ने यह कहने में गलती की कि चूंकि विवादित दुकान की पहली मंज़िल खाली है, इसलिए ज़मीनी मंज़िल की जगह की मांग नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने कहा,
"अपीलीय कोर्ट का उक्त निष्कर्ष भी स्वीकार्य नहीं है क्योंकि केवल जगह की उपलब्धता ही काफ़ी नहीं है, ऐसी वैकल्पिक जगह वादी की ज़रूरत के हिसाब से उपयुक्त भी होनी चाहिए।"
इसलिए कोर्ट ने माना कि अपीलीय कोर्ट ने वादी के बेदखली के आदेश को अस्वीकार करने में भारी गलती की। तदनुसार, बेंच ने ट्रायल कोर्ट का फ़ैसला बहाल कर दिया।
Case Title: Vijaya Rizbud v Deepak Kumar Mishra, SECOND APPEAL No.1544 of 2005


