नाबालिग की आत्महत्या से अभियोजन पक्ष को 'आत्महत्या के लिए उकसाने' के तत्वों को साबित करने की जिम्मेदारी से छूट नहीं मिलती: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Shahadat
27 Oct 2026 4:54 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही BNS की धारा 107 किसी बच्चे की आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित है, फिर भी अभियोजन पक्ष (Prosecution) को इस अपराध के जरूरी तत्वों को स्पष्ट करना होगा। [2026 LiveLaw (MP) 433]
जस्टिस हिमांशु जोशी की बेंच ने टिप्पणी की,
"BNS की धारा 107 किसी बच्चे या मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति की आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित है। भले ही यह प्रावधान किसी बच्चे की आत्महत्या के मामले में लागू होता है, फिर भी अभियोजन पक्ष को 'उकसाने' (Abetment) के तत्वों को स्पष्ट करना होगा—जैसे कि उकसाने का आवश्यक कार्य, जानबूझकर दी गई मदद, या कानून द्वारा तय किए गए अन्य तत्व। केवल इस तथ्य से कि मृतक एक नाबालिग था, यह शर्त खत्म नहीं हो जाती कि आरोपी के खिलाफ कोई ऐसा कानूनी रूप से संज्ञेय (Cognizable) कार्य साबित किया जाए, जो उससे जुड़ा हो।"
मृतक के दादा और मामा ने पन्ना जिले में दर्ज FIR रद्द करने के लिए आवेदन दायर किया। यह FIR 'आत्महत्या के लिए उकसाने' (BNS की धारा 107) के अपराध के तहत दर्ज की गई।
यह FIR तब दर्ज की गई जब डॉक्टर ने पुलिस को बताया कि 14 साल के लड़के को मृत अवस्था में अस्पताल लाया गया। इसके बाद 'मर्ग' (अस्वाभाविक मौत) जांच शुरू की गई। सुसाइड नोट और मृतक के माता-पिता के बयानों के आधार पर पुलिस ने यह निष्कर्ष निकाला कि मृतक ने कथित तौर पर आवेदकों (याचिकाकर्ताओं) द्वारा दी गई प्रताड़ना के कारण आत्महत्या की थी।
आवेदकों के वकील ने तर्क दिया कि 'आत्महत्या के लिए उकसाने' (Abetment) के लिए जरूरी तत्व मौजूद नहीं थे। इसके अलावा, सुसाइड नोट में ऐसे कोई ठोस आरोप नहीं थे जिनसे यह पता चले कि आवेदकों ने मृतक को आत्महत्या करने के लिए उकसाया या भड़काया था।
वकील ने आगे तर्क दिया कि केवल आवेदकों का नाम आ जाने भर से यह 'आत्महत्या के लिए उकसाना' (Abetment) नहीं बन जाता। उन्होंने कहा कि परिवार के सदस्यों के बयानों में प्रताड़ना के जो आरोप लगाए गए, वे बहुत सामान्य और अस्पष्ट हैं; और ये 'उकसाने' या 'जानबूझकर मदद करने' जैसी बुनियादी कानूनी शर्तों की जगह नहीं ले सकते। राज्य के वकील ने तर्क दिया कि मृतक नाबालिग था, और सुसाइड नोट तथा गवाहों के बयान, आवेदकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार हैं।
अदालत ने कहा कि अगर अभियोजन पक्ष के मामले को पूरी तरह से सच मान भी लिया जाए, तब भी आवेदकों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखने के लिए 'आत्महत्या के लिए उकसाने' (Abetment) के जरूरी तत्वों का सामने आना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट के 'किरण देशमुख बनाम मध्य प्रदेश राज्य' [SLP (Crl.) Nos. 18722-18773 of 2025] मामले का हवाला देते हुए पीठ ने दोहराया कि सुसाइड नोट में केवल आरोपियों का नाम होना, बिना किसी ठोस आरोप के, 'आत्महत्या के लिए उकसाने' के अपराध को मानने का आधार नहीं बन सकता।
इस मामले में इसी सिद्धांत को लागू करते हुए अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने केवल सुसाइड नोट और परिवार के सदस्यों के बयानों पर भरोसा किया है। उन्होंने ऐसा कोई ठोस कृत्य नहीं दिखाया जिससे यह साबित हो सके कि आरोपियों ने मृतक को आत्महत्या करने के लिए उकसाया, भड़काया, प्रेरित किया या जानबूझकर मदद की।
इस प्रकार, पीठ ने स्पष्ट किया:
"केवल यह तथ्य कि सुसाइड नोट में आवेदकों के नाम हैं, अपने आप में अपराध नहीं बनता। दस्तावेज में 'उकसाने' (Abetment) के जरूरी तत्व होने चाहिए। किसी व्यक्ति का नाम लेना, बिना यह बताए कि उसने कैसे उकसाया, जानबूझकर मदद की, या आत्महत्या से जुड़ा कोई सीधा काम किया, अपने आप में आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं करता। यह बात तब और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जब अभियोजन पक्ष खुद आत्महत्या से ठीक पहले की ऐसी कोई घटना नहीं बता पाता, जो आवेदकों से जुड़ी हो।"
इसके अनुसार, अदालत ने याचिका स्वीकार की और दर्ज की गई FIR तथा उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को रद्द किया।
Case Title : RPT v State of MP

