S.164 Electricity Act | पावर ट्रांसमिशन लाइन बिछाने के लिए ज़मीन मालिक की मंज़ूरी ज़रूरी नहीं, मुआवज़े का अधिकार बना रहेगा: एमपी हाईकोर्ट

Shahadat

12 Sept 2026 6:57 PM IST

  • S.164 Electricity Act | पावर ट्रांसमिशन लाइन बिछाने के लिए ज़मीन मालिक की मंज़ूरी ज़रूरी नहीं, मुआवज़े का अधिकार बना रहेगा: एमपी हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि बिजली ट्रांसमिशन लाइन बिछाने के लिए ज़मीन मालिक की पहले से मंज़ूरी लेने की ज़रूरत नहीं है, अगर बिजली कंपनी को इलेक्ट्रिसिटी एक्ट, 2003 की धारा 164 के तहत टेलीग्राफ अथॉरिटी की शक्तियां दी गई हैं। [2026 LiveLaw (MP) 366]

    एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीज़न बेंच ने साफ़ किया कि एक बार ऐसी शक्तियां मिल जाने के बाद कंपनी इंडियन टेलीग्राफ एक्ट, 1885 (ITA) की धारा 10 और 16 के तहत टेलीग्राफ अथॉरिटी को मिली शक्तियों का इस्तेमाल कर सकती है।

    कोर्ट ने आगे साफ़ किया कि 'वर्क्स ऑफ़ लाइसेंसीज़ रूल्स, 2006' के नियम 3(a) के तहत ज़मीन मालिक की मंज़ूरी लेने की ज़रूरत तब लागू नहीं होती, जब इलेक्ट्रिसिटी एक्ट की धारा 164 के तहत शक्तियां सही तरीके से दी गई हों।

    कोर्ट ने कहा,

    "इलेक्ट्रिसिटी एक्ट, 2003 की धारा 164 और इंडियन टेलीग्राफ एक्ट, 1885 की धारा 10 और 16 के तहत मंज़ूरी को ऊपर सही ठहराया गया, और यह उसी कानूनी व्यवस्था के अधीन है। एक बार जब ये शक्तियां सही तरीके से दे दी जाती हैं और लागू हो जाती हैं तो लाइन का सर्वे करने और उसका अलाइनमेंट तय करने की शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए न तो पहले से मंज़ूरी की ज़रूरत होती है और न ही फ़ैसले से पहले सुनवाई की।"

    कोर्ट ने ये बातें मंडीदीप इलाके में 132 kV ट्रांसमिशन लाइन बिछाने को चुनौती देने वाली दो रिट याचिकाओं को खारिज करते हुए कहीं।

    ये याचिकाएं 132kV DCSS मंडीदीप नहर ट्रांसमिशन लाइन की दूसरी-सर्किट स्ट्रिंगिंग (तार बिछाने) की परियोजना से जुड़ी थीं। एमपी पावर ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड (MPPTC) ने 10 जून, 2024 को इस परियोजना को मंज़ूरी देते हुए नोटिफिकेशन जारी किया। इसके बाद रायसेन कलेक्टर ने 30 जुलाई, 2025 को नाहर पॉली फिल्म्स लिमिटेड की नई यूनिट को बिजली सप्लाई करने के लिए ट्रांसमिशन लाइन बिछाने की मंज़ूरी देने का आदेश जारी किया।

    याचिकाएं दौलत राम इंजीनियरिंग सर्विसेज़ कंपनी (याचिकाकर्ता नंबर 1) ने दायर की थीं, जो 2003 से रेलवे-कंपोनेंट बनाने वाली यूनिट चला रही है, और नासा कॉर्पोरेशन (याचिकाकर्ता नंबर 2) ने, जो 2013 से हीट-एक्सचेंज उपकरण बना रही है। 13 टावरों में से याचिकाकर्ताओं को टावर 7 और 8 की जगह पर आपत्ति थी। टावर 8 को नासा कॉर्पोरेशन की ज़मीन पर लगाने का प्रस्ताव था, जबकि याचिकाकर्ता नंबर 1 की प्रॉपर्टी के सामने वाले हिस्से पर कोई टावर लगाने का प्रस्ताव नहीं था।

    याचिकाकर्ताओं ने एक वैकल्पिक रूट का सुझाव दिया, जिसे टेक्निकल एक्सपर्ट टीम ने स्पॉट इंस्पेक्शन के बाद खारिज किया। जांच में पाया गया कि वैकल्पिक रूट से टावर 8 मौजूदा गैस पाइपलाइन से सिर्फ़ 3.5 मीटर दूर होता, जो सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (सुरक्षा और बिजली सप्लाई से जुड़े उपाय) रेगुलेशन, 2023 के रेगुलेशन 63(1) के तहत सुरक्षा मंज़ूरी की ज़रूरतों के खिलाफ़ है।

    जब ट्रांसमिशन लाइन का काम रोका गया तो रेस्पोंडेंट नंबर 4 (नाहर स्पिनिंग मिल्स) ने पहले सिविल केस दायर किया, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद दिसंबर 2025 में वे हाईकोर्ट गए, जिसने निर्माण कार्य में दखल के खिलाफ़ अंतरिम सुरक्षा आदेश जारी किया।

    याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि उनकी मंज़ूरी या पहले से नोटिस दिए बिना उनकी प्रॉपर्टी पर ट्रांसमिशन लाइन का निर्माण 'वर्क्स ऑफ़ लाइसेंसीज़ रूल्स, 2006' के नियम 3(a) और CEA रेगुलेशन, 2023 के रेगुलेशन 63(1) का उल्लंघन था।

    यह तर्क दिया गया कि इलेक्ट्रिसिटी एक्ट की धारा 164 का इस्तेमाल ऐसी ट्रांसमिशन लाइन के लिए नहीं किया जा सकता, जिसका मकसद किसी एक प्राइवेट कंज्यूमर को बिजली सप्लाई करना हो। उनके अनुसार, प्रस्तावित रूट मनमाना था और वैकल्पिक रूट को खारिज करने के पीछे कोई सही वजह नहीं बताई गई।

    कोर्ट ने बिजली लाइसेंसियों के काम से जुड़े प्रावधानों की जांच की और पाया कि 'वर्क्स ऑफ़ लाइसेंसीज़ रूल्स, 2006' का नियम 3(a) आम तौर पर लाइसेंसियों से यह अपेक्षा करता है कि वे प्राइवेट प्रॉपर्टी पर काम करने से पहले मालिक या कब्ज़ेदार की पहले से मंज़ूरी लें।

    हालांकि, कोर्ट ने बताया कि नियम 3(4) साफ़ तौर पर एक अपवाद बनाता है, जिसमें कहा गया कि नियम 3 की कोई भी बात इलेक्ट्रिसिटी एक्ट की धारा 164 के तहत लाइसेंसधारी को मिले अधिकारों पर असर नहीं डालती है।

    कोर्ट के अनुसार, इसका मतलब है कि एक बार इलेक्ट्रिसिटी एक्ट की धारा 164 के तहत अधिकार सही तरीके से मिल जाने और उनका इस्तेमाल होने के बाद नियम 3(a) के तहत सहमति की ज़रूरत खत्म हो जाती है। कोर्ट ने समझाया कि धारा 164 उचित सरकार को यह अधिकार देती है कि वह इलेक्ट्रिसिटी लाइसेंसधारी को वे अधिकार दे सके जो ITA के तहत टेलीग्राफ अथॉरिटी को मिलते हैं।

    बेंच ने कहा कि ज़मीन का मालिक इस बात पर ज़ोर नहीं दे सकता कि ट्रांसमिशन लाइन उसकी प्रॉपर्टी के चारों ओर से गुज़रे, सिर्फ़ इसलिए कि वह अपनी ज़मीन के इस्तेमाल के लिए सहमति नहीं देता है। प्रभावित ज़मीन मालिक के पास कानूनी उपाय टेलीग्राफ एक्ट की धारा 10(d) और धारा 16(3) के तहत मुआवज़ा पाने का है।

    कोर्ट ने यह भी देखा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा सुझाए गए वैकल्पिक रास्ते को मुकदमे के दौरान बाद में सोचा गया विचार मानकर खारिज नहीं किया गया। टेक्निकल टीम ने इसे 22 नवंबर, 2024 को ही खारिज कर दिया, जो याचिकाकर्ताओं द्वारा उसी रास्ते का प्रस्ताव देने से लगभग एक साल पहले की बात है। अहम बात यह है कि कोर्ट ने पाया कि वैकल्पिक रास्ता ही हाई-टेंशन ट्रांसमिशन लाइन और मौजूदा गैस पाइपलाइन के बीच ज़रूरी सुरक्षा मंज़ूरी का उल्लंघन करेगा।

    बेंच ने ज़ोर दिया कि हाई-वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनों और गैस पाइपलाइनों से जुड़े सुरक्षा नियमों को सिर्फ़ टेक्निकल औपचारिकता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं का सुझाया गया विकल्प दूसरे ज़मीन मालिकों पर असर डालेगा।

    कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि इलेक्ट्रिसिटी एक्ट की धारा 164 का इस्तेमाल प्राइवेट कंज्यूमर के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने दोहराया कि जो ट्रांसमिशन लाइन शुरू में एक इंडस्ट्रियल कंज्यूमर को बिजली देती है, वह सिर्फ़ इस वजह से अपनी कानूनी पहचान नहीं खो देती।

    इसके अलावा, कोर्ट ने विवादित तथ्यों से जुड़े मुद्दों पर फ़ैसला करने से इनकार किया, जिनमें स्टाफ़ बिल्डिंग, मेस, राष्ट्रीय ध्वज का खंभा, फ़्लडलाइट्स और कार्गो डिस्पैच एरिया शामिल हैं। कोर्ट ने उसी ट्रांसमिशन कॉरिडोर से जुड़ी पिछली कार्यवाही का खुलासा न करने के लिए याचिकाकर्ताओं की आलोचना भी की।

    कोर्ट ने यह भी देखा कि याचिकाकर्ताओं ने काफ़ी देरी के बाद हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। कोर्ट ने पाया कि ये याचिकाएं शुरुआती नोटिफ़िकेशन के 17 महीने से ज़्यादा समय बाद और 13 टावर खड़े किए जाने के 9 महीने बाद दायर की गई थीं। इस प्रकार, कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता की सहमति न होने से इलेक्ट्रिसिटी एक्ट की धारा 164 और ITA की धाराओं 10 और 16 के तहत शक्तियों के इस्तेमाल का उल्लंघन नहीं हुआ। याचिकाओं को खारिज करते हुए कोर्ट ने हर याचिकाकर्ता पर ₹1 लाख का जुर्माना लगाया, जो नाहर पॉली फिल्म्स लिमिटेड को देना होगा।

    Case Title : Daulat Ram Engineering Services Ltd v State of Madhya Pradesh

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