बिना सुनवाई के डेपुटेशन पर गए कर्मचारी की वापसी वैध, अगर कोई बदनामी या बुरा असर न हो: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Shahadat
29 Sept 2026 7:31 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि डेपुटेशन पर गए कर्मचारी को उसके मूल विभाग में बिना किसी पूर्व सूचना या सुनवाई के अवसर के वापस भेजा जा सकता है, बशर्ते आदेश से उस पर कोई कलंक न लगे या कोई प्रतिकूल नागरिक परिणाम (Adverse Civil Consequence) न हो। [2026 LiveLaw (MP) 393]
जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की बेंच ने कहा,
"डेपुटेशन पर गए कर्मचारी को उसके मूल विभाग में वापस भेजा जा सकता है, खासकर तब जब किसी कानूनी नियम का उल्लंघन न हुआ हो और वापसी का आदेश न तो मनमाना हो और न ही दुर्भावनापूर्ण (mala fide)। वापसी का आदेश न तो याचिकाकर्ता का पद घटाता है और न ही उस पर कोई कलंक या प्रतिकूल नागरिक परिणाम डालता है। इसलिए ऐसे आदेश को पारित करने से पहले किसी पूर्व सूचना या सुनवाई के अवसर की आवश्यकता नहीं है।"
याचिकाकर्ता ग्रामीण इंजीनियरिंग सेवा विभाग में असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर कार्यरत है। निर्धारित चयन प्रक्रिया और साक्षात्कार के बाद उसे 29 सितंबर, 2020 के आदेश के माध्यम से एमपी ग्रामीण सड़क विकास निगम में जनरल मैनेजर के पद पर डेपुटेशन पर नियुक्त किया गया।
यह नियुक्ति शुरू में दो साल के लिए थी। आदेश में संतोषजनक प्रदर्शन, निर्धारित प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के अधीन अनुबंधात्मक नियुक्ति को संभावित रूप से 65 वर्ष की आयु तक बढ़ाने का प्रावधान है।
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसने अपने कर्तव्यों का संतोषजनक ढंग से पालन किया और उसे प्रारंभिक अवधि के बाद भी काम जारी रखने की अनुमति दी गई। हालांकि, 22 दिसंबर, 2025 को अधिकारियों ने बिना कोई कारण बताए उसे उसके मूल विभाग में वापस भेजने का आदेश जारी कर दिया।
याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में आदेश को चुनौती दी और तर्क दिया कि अनुमत कार्यकाल पूरा होने से पहले उसकी वापसी मनमानी थी और उसकी नियुक्ति की शर्तों के विपरीत है।
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि उसकी नियुक्ति उचित चयन प्रक्रिया के बाद हुई और उसके खिलाफ असंतोषजनक प्रदर्शन का कोई आरोप नहीं था। यह तर्क दिया गया कि वापसी का आदेश बिना कारण बताया गया आदेश (non-speaking order) था और प्रशासनिक अधिकारियों को कारण बताने की आवश्यकता थी, खासकर तब जब उनके निर्णय से कर्मचारी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा हो।
राज्य के वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता डेपुटेशन पर था। उसका उस विभाग में बने रहने का कोई पक्का अधिकार नहीं है, जहां उसे डेपुटेशन पर भेजा गया। यह कहा गया कि डेपुटेशन अस्थायी व्यवस्था है, जिसे प्रशासनिक ज़रूरतों के अनुसार या मूल विभाग के कहने पर खत्म किया जा सकता है।
राज्य के वकील ने आगे तर्क दिया कि जिस आदेश को चुनौती दी गई, वह केवल मूल विभाग में वापस भेजने (Repatriation) का आदेश है और इससे न तो याचिकाकर्ता का पद घटाया गया, न ही उस पर कोई दाग लगा और न ही उस पर कोई बुरा असर पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट के कुणाल नंदा बनाम भारत संघ (2000) मामले का ज़िक्र करते हुए बेंच ने दोहराया कि डेपुटेशन पर गए कर्मचारी को कभी भी उसके मूल विभाग में वापस भेजा जा सकता है। इसके अलावा, बेंच ने भारत संघ बनाम वी. रामकृष्णन (2005) मामले का ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि डेपुटेशन पर गए कर्मचारी का उस पद पर बने रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
बेंच ने चीफ जनरल मैनेजर (प्रशासन) द्वारा जारी 29 सितंबर, 2020 के आदेश और चीफ इंजीनियर द्वारा लिखे गए पत्र की भी जांच की।
बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि डेपुटेशन पर गए कर्मचारी का डेपुटेशन पर बने रहने का कोई पक्का या मौलिक अधिकार नहीं है।
बेंच ने आगे कहा,
"डेपुटेशन पूरी तरह से एक अस्थायी व्यवस्था है। यह प्रशासनिक ज़रूरतों पर निर्भर करती है। इसलिए याचिकाकर्ता अधिकार के तौर पर डेपुटेशन पर बने रहने का दावा नहीं कर सकता। जिस विभाग में कर्मचारी डेपुटेशन पर है, वह प्रशासनिक ज़रूरतों के हिसाब से उसे कभी भी वापस भेज सकता है, खासकर तब जब मूल विभाग खुद उसकी वापसी चाहता हो।"
बेंच ने पाया कि याचिकाकर्ता ने अपनी नियुक्ति की शर्तों का 'गलत मतलब' निकाला था।
बेंच ने आगे ज़ोर दिया,
"डेपुटेशन की अवधि बढ़ाने से याचिकाकर्ता को अनिश्चित काल तक या नियुक्ति आदेश में बताई गई उम्र तक डेपुटेशन पर बने रहने का कोई स्थायी या पक्का अधिकार नहीं मिल जाता। जब मूल विभाग अपने कर्मचारी को वापस बुलाना चाहता है तो डेपुटेशन पर गए कर्मचारी को मूल विभाग में वापस भेजा जा सकता है।"
इस प्रकार, बेंच ने माना कि जिस आदेश को चुनौती दी गई, वह केवल मूल विभाग में वापस भेजने का आदेश था और इससे न तो कोई दाग लगा और न ही कोई बुरा असर पड़ा। बेंच ने आगे कहा कि मूल विभाग ने अथॉरिटी से याचिकाकर्ता को वापस भेजने का अनुरोध किया, क्योंकि उनके पास अनुभवी और सीनियर इंजीनियरों की कमी है। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता की वापसी प्रशासनिक ज़रूरतों के कारण थी और इसे मनमाना नहीं कहा जा सकता।
इसके अनुसार, बेंच ने याचिका खारिज की।
Case Title : Vijayendra Pal Singh v State of Madhya Pradesh

