मृतक के रिश्तेदार का कोर्ट स्टाफ़ या वकील के तौर पर मौजूद होना, आपराधिक मुक़दमे को ट्रांसफ़र करने का आधार नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Shahadat
21 April 2026 8:29 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ऐसे आदेश को सही ठहराया, जिसमें मजिस्ट्रेट कोर्ट से आपराधिक मुक़दमे को ट्रांसफ़र करने से मना किया गया था। इसकी वजह सिर्फ़ यह थी कि मृतक का बेटा मजिस्ट्रेट के मिनिस्ट्रियल स्टाफ़ में है और दूसरा बेटा प्रैक्टिसिंग वकील थाहै
जस्टिस हिमांशु जोशी ने कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि मृतक का कोई रिश्तेदार मिनिस्ट्रियल पद पर काम कर रहा है, यह मान लेना सही नहीं है कि पीठासीन अधिकारी (जज) प्रभावित होंगे।
बेंच ने कहा:
"एक कोर्ट रीडर, जो कि मिनिस्ट्रियल स्टाफ़ का हिस्सा होता है, उसकी फ़ैसला लेने की प्रक्रिया में कोई न्यायिक भूमिका नहीं होती। सिर्फ़ इसलिए कि मृतक का कोई रिश्तेदार कोर्ट में मिनिस्ट्रियल पद पर काम कर रहा है, इससे किसी भी तरह से यह नहीं माना जा सकता कि पीठासीन अधिकारी अपने न्यायिक फ़र्ज़ निभाते समय प्रभावित होंगे।"
यह याचिका ज़िला कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई, जिसमें चीफ़ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के उस आदेश को सही ठहराया गया, जिसमें याचिकाकर्ता की मुक़दमा ट्रांसफ़र करने की अर्ज़ी खारिज की गई थी।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि लापरवाही और तेज़ी से गाड़ी चलाने के कारण हुई मौत (IPC की धारा 304A) के अपराध के लिए FIR दर्ज की गई। जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट दायर की गई और मुक़दमा शुरू हुआ।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने मुक़दमा ट्रांसफ़र करने के लिए अर्ज़ी दी, जिसमें उसने कहा कि मृतक का बेटा (प्रतिवादी नंबर 2) उसी अदालत में कोर्ट रीडर के तौर पर काम कर रहा है। मृतक का दूसरा बेटा प्रैक्टिसिंग वकील है।
इसलिए याचिकाकर्ता ने दलील दी कि मृतक के बेटों के प्रभाव के कारण कोई भी स्थानीय वकील इस मामले की पैरवी करने को तैयार नहीं है।
बेंच ने कहा कि याचिका में बताए गए आधार आपराधिक मुक़दमे को ट्रांसफ़र करने का आदेश देने के लिए सही नहीं हैं। यह तथ्य कि मृतक का बेटा कोर्ट रीडर है, जो कि मिनिस्ट्रियल स्टाफ़ का सदस्य है, उसका फ़ैसला लेने की प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ता। सिर्फ़ इसलिए कि मृतक का कोई रिश्तेदार मिनिस्ट्रियल पद पर काम कर रहा है, इससे पीठासीन अधिकारी के प्रभावित होने का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
अतः, बेंच ने याचिका खारिज की।
Case Title: Himanshu Katare v State of Madhya Pradesh [MCRC-54491-2025]

