भोजशाला स्थल पर मंदिर होने का कोई 'ठोस सबूत' नहीं, नमाज़ की अनुमति देने वाला 1935 का नोटिफिकेशन वैध: मुस्लिम पक्ष की दलील

Shahadat

11 May 2026 7:34 PM IST

  • भोजशाला स्थल पर मंदिर होने का कोई ठोस सबूत नहीं, नमाज़ की अनुमति देने वाला 1935 का नोटिफिकेशन वैध: मुस्लिम पक्ष की दलील

    भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद विवाद पर चल रही सुनवाई में मुस्लिम समुदाय के याचिकाकर्ताओं में से एक, काज़ी ज़कुल्लाह ने दलील दी कि विवादित स्थल पर मंदिर होने का कोई ठोस सबूत नहीं है।

    याचिकाकर्ता ने आगे दलील दी कि धार के शासक द्वारा अगस्त 1935 में जारी किया गया वह 'ऐलान' (घोषणा), जिसमें इस स्थल पर नमाज़ पढ़ने का अधिकार दिया गया था, एक वैध दस्तावेज़ है; क्योंकि 1904 से 1951 के बीच की अवधि में इस स्मारक को सरकार या भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा 'संरक्षित स्थल' घोषित नहीं किया गया।

    यह विवाद भोजशाला से जुड़ा है, जो 11वीं सदी का एक स्मारक है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है। हिंदू इस स्थल को वाग्देवी, यानी देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर मानते हैं, जबकि मुस्लिम इसे 'कमल मौला मस्जिद' मानते हैं। ASI द्वारा 2003 में की गई एक व्यवस्था के तहत हिंदू इस परिसर में मंगलवार को पूजा करते हैं, जबकि मुस्लिम शुक्रवार को वहाँ नमाज़ पढ़ते हैं।

    दायर की गई जनहित याचिकाओं (PILs) में से एक में इस स्थल के वैज्ञानिक सर्वेक्षण की मांग की गई, जिसका उद्देश्य हिंदू समुदाय की ओर से इस स्थल पर अपना अधिकार पुनः प्राप्त करना है। इसके अतिरिक्त, इस याचिका में मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को इस परिसर में नमाज़ पढ़ने से रोकने की भी मांग की गई।

    इसी संदर्भ में, हाईकोर्ट ने इस स्थल के सर्वेक्षण का आदेश दिया था। हालांकि, इस आदेश को धार स्थित 'मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी' ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने सर्वेक्षण की अनुमति देते हुए हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि वह सर्वेक्षण रिपोर्ट को सीलबंद लिफाफे से बाहर निकाले (Unseal करे), उसकी प्रतियां संबंधित पक्षों को उपलब्ध कराए और अंतिम सुनवाई के दौरान उन पक्षों की आपत्तियों पर विचार करे।

    सुनवाई के दौरान, सीनियर एडवोकेट शोभा मेनन ने अपनी जवाबी दलीलें पेश करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं ने स्वयं इस बात को स्वीकार किया कि विवादित स्थल के मूल स्वरूप को लेकर तथ्यों से जुड़े कुछ विवादित प्रश्न मौजूद हैं।

    वर्ष 2022 की रिट याचिका (WP) संख्या 10497 में प्रस्तुत दलीलों का हवाला देते हुए मेनन ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से यह निर्धारित करने के लिए 'कार्बन डेटिंग' की मांग की थी कि क्या यह संरचना वास्तव में राजा भोज के शासनकाल की है, और क्या यह परिसर मूल रूप से एक मंदिर था, एक शिक्षण केंद्र था, या फिर दोनों ही था। मेनन के अनुसार, याचिकाकर्ताओं के अपने दावों में स्पष्टता की कमी, संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत उस स्थल पर पूजा करने के उनके निर्विवाद अधिकार के दावे को कमज़ोर करती है।

    उन्होंने जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ के समक्ष दलील दी,

    "रिकॉर्ड पर मंदिर के अस्तित्व को दर्शाने वाला कोई ठोस सबूत नहीं है। देवी वाग्देवी की प्राण प्रतिष्ठा के संबंध में भी कोई विवरण उपलब्ध नहीं है।"

    मेनन ने आगे तर्क दिया कि विवादित तथ्यों के बावजूद रिट याचिकाओं में राहत देना, भविष्य में कई और मामले दायर होने का कारण बनेगा।

    उन्होंने कहा,

    "यदि इन विवादित तथ्यों के आधार पर कोई फैसला (डिक्री) सुनाया जाता है तो मुकदमों का सैलाब आ जाएगा और सिविल कोर्ट्स का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा... इसलिए पूजा का यह अधिकार, यदि यह मौजूद भी है, तो यह एक सिविल अधिकार है।"

    मेनन ने उस ऐतिहासिक कानूनी ढांचे पर भी बात की, जो इस स्मारक को नियंत्रित करता है। साथ ही बताया कि 1904 से 1951 के बीच यह संपत्ति धार के शासक के अधिकार क्षेत्र में थी। उन्होंने कहा कि उस अवधि के दौरान 'प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम, 1904' के तहत जारी किसी भी अधिसूचना में इस स्मारक को संरक्षित घोषित नहीं किया गया। उन्होंने धार के शासक द्वारा 1935 में जारी किए गए 'लान' (आदेश) की वैधता का बचाव करते हुए कहा कि उस समय संपत्ति पर शासक के पास विधायी और प्रशासनिक अधिकार हैं।

    'प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958' का हवाला देते हुए मेनन ने तर्क दिया कि इस स्थल को एक संरक्षित स्मारक के रूप में मानने की अवधारणा औपचारिक रूप से 1951 और 1958 के कानूनी ढांचे के लागू होने के बाद ही सामने आई।

    उन्होंने कहा,

    "यह पहली बार 1951 के अधिनियम के माध्यम से हुआ कि इसकी प्रकृति (Character) के संबंध में धारा 3 के तहत एक 'मानक कल्पना' (Deeming fiction) का निर्माण किया गया; इसका अर्थ यह नहीं है कि यह कानून पिछली तारीख से लागू होगा, बल्कि इसका अर्थ केवल यह है कि इसके प्रावधान लागू होंगे।"

    इसके अलावा, 1958 के अधिनियम की धारा 16 के उल्लंघन के संबंध में याचिकाकर्ताओं के दावे का ज़िक्र करते हुए मेनन ने तर्क दिया कि चूंकि स्मारक की प्रकृति अभी तक निर्णायक रूप से निर्धारित नहीं की गई, इसलिए कथित उल्लंघन का मुद्दा उठाया ही नहीं जा सकता।

    उन्होंने कहा,

    "स्मारक की प्रकृति अभी तक निर्धारित नहीं हुई तो फिर धारा 16 का उल्लंघन कैसे हो सकता है? वर्तमान मामले में, बुनियादी तथ्य ही विवादित हैं।"

    मेनन की दलीलों के बाद मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी की ओर से पेश हुए सीनियर वकील सलमान खुर्शीद ने भी अपना जवाब दाखिल किया। खुर्शीद ने तर्क दिया कि विभिन्न याचिकाओं में मांगी गई मुख्य राहत ASI द्वारा 2003 के आदेश के ज़रिए लगाए गए उन प्रतिबंधों से संबंधित है, जो अलग-अलग समुदायों के लिए विवादित स्थल तक पहुँच को नियंत्रित करते हैं। उन्होंने दलील दी कि किसी भी याचिका में संपत्ति पर मालिकाना हक की स्पष्ट घोषणा नहीं मांगी गई।

    खुर्शीद ने आगे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश पर ASI द्वारा 2024 में किए गए हालिया सर्वेक्षण पर भी आपत्तियाँ उठाईं, और दस्तावेज़ीकरण प्रक्रिया में प्रक्रियात्मक अनियमितताओं का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ASI द्वारा अपनाई गई सर्वेक्षण पद्धति संदिग्ध थी, क्योंकि उन्होंने स्थल की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए कार्बन डेटिंग नहीं की। इसके अलावा, उन्होंने विवादित स्थल के एक हिस्से में सीढ़ियों को भी नुकसान पहुंचाया।

    पिछली सुनवाई में हिंदू समुदाय की ओर से पेश हुए याचिकाकर्ताओं में से एक कुलदीप तिवारी ने तर्क दिया कि स्थल पर मिले शिलालेख स्पष्ट रूप से एक मंदिर के अवशेषों की पुष्टि करते हैं।

    खंडपीठ ने सभी वकीलों को अपने जवाब दाखिल करने और कल, 12 मई, 2026 तक सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया है।

    Case Title: Hindu Front For Justice v Union of India WP 10497/2022, Antar Singh WP/6514/2013, Maulana Kamaluddin Welfare Society WP/28334/2019, Kuldeep Tiwari WP/10484/2022 and Qazi Zakullah WA/559/2026

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