'ट्रायल कोर्ट की लापरवाही': किसी दूसरे केस से जुड़ी थी FSL रिपोर्ट, एमपी हाईकोर्ट ने रद्द की 2009 की हत्या की सज़ा

Shahadat

11 Aug 2026 10:18 AM IST

  • ट्रायल कोर्ट की लापरवाही: किसी दूसरे केस से जुड़ी थी FSL रिपोर्ट, एमपी हाईकोर्ट ने रद्द की 2009 की हत्या की सज़ा

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 2009 में हत्या के दोषी ठहराए गए दो लोगों को बरी किया। कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने जिस FSL रिपोर्ट पर भरोसा किया था, वह किसी दूसरे केस से जुड़ी थी। कोर्ट ने इस दस्तावेज़ पर भरोसा करने में ट्रायल कोर्ट की लापरवाही पर हैरानी जताई। [2026 LiveLaw (MP) 320]

    सबूतों की मेरिट के आधार पर जांच करते हुए जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की डिवीज़न बेंच ने आगे कहा कि इस बात पर एक अहम विवाद था कि क्या FIR दर्ज होने के समय मृतक जीवित था या क्या कुछ पुलिस अधिकारियों ने FIR पर उसके अंगूठे के निशान लिए थे, जबकि FIR परिवार के किसी सदस्य ने दर्ज कराई थी।

    "यह भी देखा गया कि ट्रायल कोर्ट ने CrPC की धारा 313 के तहत पूछताछ के दौरान अपीलकर्ताओं से FSL रिपोर्ट (Ex.P/25) के बारे में सवाल नंबर 88 में स्पष्टीकरण मांगा, लेकिन FSL रिपोर्ट (Ex.P/25) इस केस से संबंधित नहीं है। ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले के पैरा-4 और 24 में भी इस सबूत का इस्तेमाल किया। हमें सचमुच हैरानी है कि ट्रायल कोर्ट से यह लापरवाही कैसे हुई। यह आश्चर्यजनक है कि अंतिम बहस या ट्रायल के किसी भी चरण में किसी भी पक्ष ने इस बिंदु पर बहस नहीं की, इसलिए हम पाते हैं कि ट्रायल कोर्ट का फैसला सावधानी से नहीं लिखा गया और केवल इसी आधार पर फैसला रद्द किया जा सकता है, लेकिन हम अन्य सबूतों का भी मेरिट के आधार पर मूल्यांकन करने का प्रस्ताव करते हैं"।

    सबूतों की मेरिट के आधार पर जांच करने के बाद बेंच ने कहा:

    "ट्रायल कोर्ट ने लापरवाही से किसी असंबंधित दस्तावेज़ (Ex.P/25) पर गलत तरीके से भरोसा किया और यह उन सबूतों में से एक है, जिसके आधार पर आरोपियों को दोषी ठहराया गया।"

    तथ्यों के अनुसार, मृतक ने 25 अगस्त, 2009 को रिपोर्ट दर्ज कराई कि जब वह अपने परिवार के साथ घर पर गणेश पूजा कर रहा था, तो अपीलकर्ता उसके घर में घुस आए और उसे भद्दी भाषा में गाली-गलौज की। इसके बाद दो अपीलकर्ताओं ने मृतक को पकड़ लिया और एक ने उसके पेट के बाईं ओर चाकू घोंप दिया, जिससे FIR दर्ज होने के बाद उसकी मौत हो गई।

    ट्रायल कोर्ट ने तीन लोगों - आरोपी तुलसीराम, हरप्रसाद और मोहन (मृतक) - को दोषी ठहराया। अपील करने वालों के वकील का दावा था कि उन्हें गलत तरीके से दोषी ठहराया गया। उनका कहना था कि घटना के समय बिजली नहीं थी और रोशनी का कोई दूसरा ज़रिया भी नहीं था। यह भी दावा किया गया कि अभियोजन पक्ष के दो गवाह घटना वाली जगह पर मौजूद नहीं थे और पूजा में व्यस्त थे, इसलिए उन्हें चश्मदीद गवाह के तौर पर पेश किया गया। साथ ही, हत्या में इस्तेमाल किए गए बताए जा रहे चाकू पर खून का कोई निशान नहीं था।

    कोर्ट ने देखा कि अभियोजन पक्ष ने 15 गवाहों से पूछताछ की थी। डॉक्टर की राय थी कि मृतक को चोट किसी कठोर और धारदार चीज़ से लगी थी और उसकी तिल्ली (spleen) दो हिस्सों में कट गई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि तिल्ली में चोट और खून बहने के कारण मौत हुई।

    बेंच ने यह भी देखा कि ट्रायल कोर्ट ने FSL रिपोर्ट Ex p25 पेश की थी, लेकिन यह रिपोर्ट मोतीलाल से ज़ब्त दरांती और राजेंद्र से ज़ब्त लाठियों से संबंधित थी। इसमें घायल व्यक्ति जहर और सीतारामी थे। बेंच ने पाया कि FSL रिपोर्ट का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं था।

    इसलिए कोर्ट ने मामले के तथ्यों और सबूतों पर विचार करना ज़रूरी समझा। बेंच ने देखा कि मामले में गंभीर विसंगतियां थीं, जैसे कि FIR जांच अधिकारी की लिखावट में दर्ज नहीं की गई और रिपोर्ट लिखने वाले व्यक्ति का नाम भी उसमें नहीं था। कोर्ट ने इसे महत्वपूर्ण माना, क्योंकि इस बात पर विवाद था कि FIR दर्ज करते समय मृतक जीवित था या नहीं, क्योंकि FIR में उसके हस्ताक्षर के साथ-साथ उसके अंगूठे के निशान भी थे।

    कोर्ट ने देखा कि अगर FIR दर्ज होने के बाद अस्पताल पहुंचने तक मृतक जीवित था तो पुलिस ने ज़रूरी मेडिकल जांच रिपोर्ट दाखिल नहीं की, जो कि एक अनिवार्य दस्तावेज़ है। कोर्ट ने पाया कि चार्जशीट के साथ उक्त दस्तावेज़ का दाखिल न होना बचाव पक्ष के इस तर्क को और मज़बूत करता है कि मृतक ने FIR दर्ज नहीं कराई और तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। साथ ही किसी अज्ञात पुलिस अधिकारी ने उसके अंगूठे के निशान लिए थे।

    इस प्रकार बेंच ने कहा,

    "ऊपर बताई गई वजहों से यह कोर्ट मानता है कि जांच और प्रॉसिक्यूशन के सबूतों में गंभीर कमियों के कारण अपील करने वालों की दोषसिद्धि और सज़ा को बरकरार नहीं रखा जा सकता। इसलिए अपील मंज़ूर की जाती है। अपील करने वालों - तुलसीराम और हरप्रसाद - को IPC की धारा 450, 302 और 302/34 के तहत लगे आरोपों से बरी किया जाता है।"

    इस तरह अपील मंज़ूर कर ली गई, अपील करने वालों को बरी कर दिया गया और विवादित फ़ैसला रद्द कर दिया गया।

    Case Title: Tulsiram Rajpal v State of Madhya Pradesh, CRA-1457-2012

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