मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मेडिकल यूनिवर्सिटी द्वारा आंसर शीट के डिजिटल मूल्यांकन को सही ठहराया
Shahadat
18 Jun 2026 8:04 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जबलपुर की एमपी मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी द्वारा आंसर शीट के डिजिटल मूल्यांकन को चुनौती देने वाली दो रिट याचिकाओं को खारिज किया। कोर्ट ने पाया कि फिजिकल (हाथ से) स्वतंत्र मूल्यांकन से मिले अंकों में कोई खास अंतर नहीं था। [2026 LiveLaw (MP) 217]
एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार और टेक्नोलॉजी पार्टनर 'माइंड लॉजिक्स इन्फ्रा' (Mindlogicx Infra) को सिस्टम की पारदर्शिता और प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए कुछ उपाय सुझाए:
"सिंबल (चिह्न), कमेंट फॉर्मेट और रूब्रिक स्ट्रक्चर का स्वरूप और दायरा स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए। मूल्यांकन करने वाले को सही जवाब के लिए [ ✅] या गलत जवाब के लिए [❌] जैसे सिंबल का इस्तेमाल करना चाहिए; अगर वह टच स्क्रीन टैब/कंप्यूटर पर पेन का इस्तेमाल नहीं कर रहा है। हम पुरजोर सिफारिश करते हैं कि डिजिटल रूप से स्कैन की गई आंसर शीट/बुक की जांच और मूल्यांकन टच स्क्रीन डिवाइस पर पेन का इस्तेमाल करके किया जाए, जैसा कि पारंपरिक तरीके से जांच होती है, ताकि छात्रों के मन में कोई भ्रम पैदा न हो।"
पहली रिट याचिका (3091/2026) में याचिकाकर्ता (MSc नर्सिंग की दूसरे साल की छात्रा) ने साइकियाट्रिक (मेंटल हेल्थ) विषय में अपनी आंसर शीट के दोबारा मूल्यांकन की मांग की। उसका तर्क था कि उसे उम्मीद के विपरीत इस विषय में फेल घोषित कर दिया गया था और 75 में से 20 अंक दिए गए।
नतीजे से असंतुष्ट होकर उसने दोबारा मूल्यांकन के लिए आवेदन किया और नवंबर 2025 में यूनिवर्सिटी अधिकारियों को एक आवेदन भी दिया। साथ ही उसने सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत अपनी आंसर शीट की कॉपी मांगी। उसने निष्पक्ष मूल्यांकन की मांग करते हुए वाइस चांसलर और परीक्षा नियंत्रक से भी संपर्क किया। यह रिट याचिका दायर करने से पहले उसने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पोर्टल के माध्यम से शिकायत भी दर्ज कराई।
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि उसने सभी सवालों के सही जवाब दिए। आगे यह भी तर्क दिया गया कि उसने 5 सवालों के सही जवाब दिए, लेकिन उसे कोई अंक नहीं दिया गया।
यूनिवर्सिटी ने बताया कि उन्होंने ऑर्डिनेंस 6/2024 के क्लॉज 60 में संशोधन करके सभी फैकल्टी में थ्योरी परीक्षाओं के लिए एक उपयुक्त मूल्यांकन प्रणाली अपनाई। इस प्रक्रिया को लागू करने के लिए यूनिवर्सिटी ने औपचारिक समझौते के ज़रिए बेंगलुरु की टेक्नोलॉजी कंपनी 'माइंड लॉजिकएक्स इन्फ्राटेक' (Mindlogicx Infratech) को काम पर रखा था।
इस सिस्टम के तहत आंसर शीट को स्कैन किया जाता था और कैंडिडेट की पहचान छिपाने के लिए उनके विवरण वाले पहले पेज को डिजिटल रूप से छिपा (मास्क) दिया जाता था। इसके बाद स्कैन की गई आंसर शीट का मूल्यांकन दो अलग-अलग परीक्षक एक डिजिटल प्लेटफॉर्म के ज़रिए स्वतंत्र रूप से करते थे। दोनों परीक्षकों द्वारा दिए गए अंकों में से जो अंक ज़्यादा होते थे, उन्हें ही उस विषय में कैंडिडेट का अंतिम स्कोर माना जाता था।
बेंच ने देखा कि याचिकाकर्ता ने बाकी सभी विषयों में यूनिवर्सिटी के मूल्यांकन के तरीके को स्वीकार किया था, और उनकी चुनौती सिर्फ़ एक विषय में मिले अंकों तक ही सीमित थी। मूल्यांकन प्रक्रिया की निष्पक्षता की जांच करने के लिए कोर्ट ने माइंड लॉजिकएक्स से एक विस्तृत हलफनामा मांगा। कंपनी ने स्पष्ट किया कि वह केवल टेक्नोलॉजी उपलब्ध कराने का काम करती है और शैक्षणिक फैसलों में उसकी कोई भूमिका नहीं होती; ये फैसले यूनिवर्सिटी के नियंत्रण में ही रहते हैं।
कोर्ट ने यूनिवर्सिटी को यह भी निर्देश दिया कि उनकी आंसर शीट का भौतिक रूप से (फिजिकली) दोबारा मूल्यांकन किया जाए, जिसमें उन्हें 75 में से 23 अंक मिले।
इस प्रकार, कोर्ट ने कहा,
"इसलिए कोर्ट के आदेश के पालन में यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए पुनर्मूल्यांकन के बाद भी कोई खास बदलाव नहीं हुआ। अतः याचिकाकर्ता को कोई राहत नहीं दी जा सकती और रिट याचिका को मेरिट के आधार पर खारिज किया जाता है।"
दूसरी याचिका (897/2026) में याचिकाकर्ता संबंधित यूनिवर्सिटी से जुड़े कॉलेज का BHMS कोर्स का छात्र है। उसने दावा किया कि उसने 'ऑर्गनॉन ऑफ़ मेडिसिन विद होम्योपैथिक फिलॉसफी' विषय की सप्लीमेंट्री परीक्षा दी थी, जिसमें उसे थ्योरी I और II में 94 अंक मिले और उस विषय में कुल 162 अंक प्राप्त हुए। उसके कुल अंक 1500 में से 873 थे। उसने RTI एक्ट के तहत कुछ आंसर शीट के लिए भी आवेदन किया और दावा किया कि कुछ उत्तरों को सही तो माना गया, लेकिन उनके लिए अंक नहीं दिए गए।
कोर्ट ने फिर से स्वतंत्र पुनर्मूल्यांकन का आदेश दिया और पाया कि याचिकाकर्ता को केवल 42 अंक मिले, जो मूल रूप से दिए गए अंकों से कम थे। इसलिए कोर्ट को इस याचिका में भी कोई दम नहीं लगा। इस प्रकार, अदालत ने माना कि यूनिवर्सिटी के डिजिटल मूल्यांकन सिस्टम में कोई कमी नहीं थी और दोनों याचिकाओं को खारिज कर दिया। साथ ही स्वतंत्र पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया में हुए खर्च की भरपाई के लिए प्रत्येक याचिकाकर्ता पर ₹5,000 का जुर्माना लगाया, जो यूनिवर्सिटी को चुकाना होगा।
Case Title: Premlata Tiwari v State of Madhya Pradesh, Amarjeet Bhardwaj v State WP 3091 of 2026

