रजिस्ट्रार जनरल अपने ही जज की सेशंस जज के बारे में की गई टिप्पणियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करें: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने वापस लिया आदेश
Shahadat
24 April 2026 10:07 AM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपना वह निर्देश वापस ले लिया, जिसमें रजिस्ट्रार जनरल से कहा गया था कि वे एक सेशंस जज के खिलाफ एक सिंगल जज द्वारा की गई 'अपमानजनक' टिप्पणियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दायर करें। आखिरकार, कोर्ट ने इस मुद्दे को अपने आंतरिक प्रशासनिक तंत्र के माध्यम से सुलझाने का फैसला किया।
यह विवाद जस्टिस राजेश कुमार गुप्ता द्वारा जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान पारित आदेश से जुड़ा है। इस आदेश में, शिवपुरी जिले में सरकारी फंड के कथित बड़े पैमाने पर गबन के संबंध में, प्रथम अतिरिक्त सेशंस जज के एक आदेश की जांच का निर्देश दिया गया था।
इस मामले में आरोप थे कि रूपसिंह परिहार नाम के एक कंप्यूटर ऑपरेटर ने, जो भूमि अधिग्रहण मामलों में सहायता करता था, जाली दस्तावेजों का उपयोग करके लगभग ₹5.10 करोड़ अपने निजी खातों में ट्रांसफर कर लिए थे।
अपने आदेश में जस्टिस गुप्ता ने टिप्पणी की कि प्रथम अतिरिक्त सेशंस जज ने तथ्यों पर उचित विचार किए बिना आरोपी को रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और अन्य गंभीर अपराधों से बरी किया था और कथित तौर पर आरोपी को अनुचित लाभ पहुंचाया था।
यह मामला शिवपुरी जिले में भूमि अधिग्रहण भुगतान से संबंधित सरकारी फंड के बड़े पैमाने पर गबन से उत्पन्न हुआ था।
इस मामले में जमानत की मांग करने वाला आवेदक रूपसिंह परिहार, भूमि अधिग्रहण मामलों में सहायता के लिए सरकारी कार्यालय में कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में कार्यरत था। आरोप है कि उसने जाली और मनगढ़ंत दस्तावेजों के आधार पर ₹5.10 करोड़ अपने निजी खातों में ट्रांसफर कर लिए थे।
इसके बाद जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने, जिसने सिंगल जज के आदेश का संज्ञान लिया, यह पाया कि कुछ टिप्पणियां—विशेष रूप से आदेश के पैराग्राफ 12 में की गई टिप्पणियां—अनुमेय न्यायिक आलोचना की सीमा से बाहर थीं और 'बेहद कठोर और अपमानजनक' टिप्पणियों की श्रेणी में आती थीं।
इसलिए डिवीजन बेंच ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वे 10 दिनों के भीतर सुप्रीम कोर्ट में एक स्पेशल लीव पिटीशन दायर करें।
इसके बाद 22 अप्रैल को चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सर्राफ की डिवीजन बेंच ने इस मुद्दे पर फिर से विचार किया और पाया कि यह मामला पहले ही हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति के समक्ष रखा जा चुका है और इसे एक आंतरिक तंत्र के तहत ही निपटाया जाएगा।
डिवीजन बेंच ने आदेश दिया,
"इस बात को ध्यान में रखते हुए कि कार्यवाही पहले ही प्रशासनिक समिति के विचारार्थ प्रस्तुत की जा चुकी है और यह मामला प्रशासनिक समिति के सक्रिय विचारधीन है, हम दिनांक 22.9.2025 के उस आदेश को वापस लेते हैं, जिसके तहत इस न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को सुप्रीम कोर्ट में जाने का निर्देश दिया गया। हम यह निर्देश देते हैं कि आगे की कार्यवाही प्रशासनिक समिति की सिफारिशों के अनुसार और तत्पश्चात सक्षम प्राधिकारी द्वारा की जाए।"
इस प्रकार, याचिका समाप्त की गई।
Case Title: Court in its own motion v High Court of Madhya Pradesh, WP-38432-2025

