22 साल से अधिक सेवा के बाद बर्खास्तगी रद्द: एमपी हाइकोर्ट ने कहा, अनियमित नियुक्तियां अवैध नहीं

Amir Ahmad

3 Feb 2026 4:06 PM IST

  • 22 साल से अधिक सेवा के बाद बर्खास्तगी रद्द: एमपी हाइकोर्ट ने कहा, अनियमित नियुक्तियां अवैध नहीं

    मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने जिला कोर्ट में कार्यरत कई क्लास-3 कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त करने के आदेशों को रद्द कर दिया है।

    हाइकोर्ट ने कहा कि दो दशक से अधिक समय तक सेवा देने के बाद केवल नियुक्ति में कथित अवैधता के आधार पर कर्मचारियों को हटाना कानूनन टिकाऊ नहीं है।

    जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने निर्णय में कहा कि वर्ष 1994–1995 में की गई नियुक्तियां प्रारंभ से ही अवैध या शून्य नहीं थीं। अधिकतम यह कहा जा सकता है कि उनमें कुछ प्रक्रिया संबंधी अनियमितताएं थीं, जो लंबे समय तक निरंतर सेवा और समय बीतने के साथ समाप्त मानी जाएंगी।

    मामले में याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति जिला कोर्ट में विभिन्न क्लास-3 पदों पर उस समय की गई थी, जब उनके माता-पिता, जो सरकारी कर्मचारी थे, मध्य प्रदेश सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के नियम 42 के तहत स्वैच्छिक रिटायरमेंट पर गए। नियुक्तियां लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के बाद की गई थीं। याचिकाकर्ताओं ने लगभग 22 से 25 वर्षों तक सेवा दी, इस दौरान उन्हें पदोन्नतियां भी मिलीं और उनके सेवा अभिलेखों को समय-समय पर हाइकोर्ट रजिस्ट्री द्वारा स्वीकृति दी गई।

    हालांकि, वर्ष 2017 में मानसुख लाल सराफ बनाम अरुण कुमार तिवारी मामले में दिए गए निर्देशों के बाद शुरू की गई जांच के आधार पर उनकी सेवाएं यह कहते हुए समाप्त कर दी गईं कि उनकी नियुक्तियां अनुकंपा नियुक्ति नीति और मध्य प्रदेश सिविल सेवा (मेडिकल परीक्षण) नियम, 1972 के विपरीत थीं।

    हाइकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति के समय जिला कोर्ट के क्लास-3 पदों के लिए कोई वैधानिक भर्ती नियम मौजूद नहीं थे।

    कोर्ट ने 1984 के उस सर्कुलर का उल्लेख किया, जिसके तहत जिला जजों को रिक्तियों के अनुसार सामान्य प्रक्रिया से क्लास-3 कर्मचारियों की भर्ती का अधिकार था।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भर्ती से जुड़े वैधानिक नियम पहली बार 2016 में बनाए गए और 2019 में संशोधित हुए, जिन्हें 1994–1995 की नियुक्तियों पर पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता।

    राज्य सरकार द्वारा मेडिकल जांच नियम, 1972 पर किए गए भरोसे को भी हाइकोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ये नियम अगस्त, 1996 से पहले हाइकोर्ट द्वारा अपनाए ही नहीं गए थे, इसलिए नियुक्ति के समय ये लागू नहीं होते थे। साथ ही उस समय अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े सरकारी परिपत्रों को अपनाना या न अपनाना जिला जज के विवेकाधिकार में था, क्योंकि कोई बाध्यकारी नियम अस्तित्व में नहीं था।

    कोर्ट ने 10 जून, 1994 की अनुकंपा नियुक्ति योजना को 3 जनवरी 1995 को वापस लिए जाने के प्रभाव पर भी विचार किया और कहा कि जब आवेदन उस समय दिए गए, जब योजना लागू थी, तो बाद में योजना वापस लेने से उन नियुक्तियों को स्वतः अवैध नहीं ठहराया जा सकता, खासकर जब उसे पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया गया हो।

    मानसुख लाल सराफ मामले को अलग बताते हुए हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उस फैसले के निर्देश केवल उन नियुक्तियों पर लागू होते हैं, जो वैधानिक भर्ती नियमों के उल्लंघन में की गई हों, न कि उन पर जो केवल प्रक्रिया संबंधी अनियमितताओं से ग्रस्त हों।

    कोर्ट ने राकेश दुबे बनाम जिला एवं सेशन जज, जबलपुर के फैसले को भी इस मामले में लागू न मानते हुए कहा कि वह प्रासंगिक परिपत्रों और उस समय भर्ती नियमों के अभाव पर विचार किए बिना दिया गया और वह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

    हाइकोर्ट ने उमादेवी मामले में संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि बिना किसी धोखाधड़ी या गलत प्रस्तुति के की गई नियुक्तियों को दशकों बाद दोबारा नहीं खोला जाना चाहिए।

    कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति सक्षम अधिकारियों द्वारा पूरी जानकारी के साथ की गई और 22 साल से अधिक सेवा के बाद उनकी बर्खास्तगी मनमानी और सेवा कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ है।

    इन सभी आधारों पर एमपी हाइकोर्ट ने 28 अक्टूबर, 2017 के सेवा समाप्ति आदेशों को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ताओं को उनके-अपने पदों पर पुनः बहाल करने का निर्देश दिया। हालांकि, कोर्ट ने पिछला वेतन देने से इनकार किया, लेकिन सेवा और पदोन्नति से जुड़े सभी परिणामी लाभ कानून के अनुसार देने के आदेश दिए।

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