'गंभीर चिंता का विषय': मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ओवरलोडेड गाड़ियों में अवैध रेत परिवहन में बढ़ोतरी पर चिंता जताई, जिससे सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा

Shahadat

31 March 2026 5:35 PM IST

  • गंभीर चिंता का विषय: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ओवरलोडेड गाड़ियों में अवैध रेत परिवहन में बढ़ोतरी पर चिंता जताई, जिससे सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की, जिसमें अवैध रूप से रेत ले जा रही एक गाड़ी की अंतरिम कस्टडी (अस्थायी हिरासत) देने से इनकार करने के फैसले को चुनौती दी गई। कोर्ट ने टिप्पणी की कि रेत अक्सर ओवरलोडेड और खराब हालत वाली गाड़ियों में ले जाई जाती है, जिन्हें अधिकारी से बचने के लिए अक्सर तेज़ी से चलाया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप सड़क दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं और जान-माल का नुकसान हो रहा है।

    ऐसा करते हुए कोर्ट ने हाल के दिनों में 'रेत माफिया' के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताई और इसे सार्वजनिक चिंता का एक गंभीर विषय बताया।

    जस्टिस हिमांशु जोशी की बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया:

    "हाल के दिनों में अवैध रेत खनन की समस्या ने खतरनाक रूप ले लिया और तथाकथित 'रेत माफिया' का उदय सार्वजनिक चिंता का एक गंभीर विषय बन गया। कानून या मानवीय जीवन की ज़रा भी परवाह किए बिना काम करने वाले ऐसे तत्व अक्सर ओवरलोडेड और खराब हालत वाली गाड़ियों के ज़रिए खनिजों का अनाधिकृत परिवहन करते हैं। इन गाड़ियों को अक्सर कानून लागू करने वाली एजेंसियों से बचने के लिए तेज़ी से चलाया जाता है। यह लापरवाही भरा रवैया न केवल बड़े पैमाने पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा के लिए भी एक गंभीर खतरा पैदा करता है, क्योंकि ये गाड़ियां अक्सर सड़क दुर्घटनाओं में शामिल पाई जाती हैं, जिससे जान-माल का नुकसान होता है। अवैध खनन और खतरनाक परिवहन के बीच बढ़ता गठजोड़ अब एक संस्थागत खतरे में बदल गया, जो पारिस्थितिक संतुलन और कानून के शासन, दोनों को कमज़ोर करता है; इसलिए ऐसी गैर-कानूनी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए एक मज़बूत और बिना किसी समझौते वाला न्यायिक दृष्टिकोण अपनाना ज़रूरी है।"

    एक याचिका दायर की गई, जिसमें ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द करने की मांग की गई, जिसमें आवेदक की भारी ट्रक (Heavy Truck) की अंतरिम कस्टडी के लिए दी गई अर्ज़ी खारिज की गई।

    तथ्यों के अनुसार, 21 जनवरी, 2026 को शाम लगभग 4:30 बजे पुलिस ने उस गाड़ी को रोका, जो कथित तौर पर बिना किसी वैध परमिट के अवैध रूप से रेत ले जा रही थी। नतीजतन, चोरी के आरोप में एक मामला दर्ज किया गया (BNS की धारा 303(2) और खान और खनिज विकास और विनियमन अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत)।

    आवेदक के वकील ने दलील दी कि 20 जनवरी, 2026 को रात 8:30 बजे से 21 जनवरी, 2026 को सुबह 2:00 बजे तक के लिए एक वैध रेत परमिट जारी किया गया। इसके अलावा, यह दलील दी गई कि परिवहन के दौरान, आधी रात को वाहन का टायर फट गया और टायर बदलने या मैकेनिक के उपलब्ध न होने के कारण वाहन को खड़ा करना पड़ा।

    इसके बाद टायर की मरम्मत हो जाने पर वाहन ने अपनी यात्रा फिर से शुरू की, जिस दौरान उसे रोक लिया गया। वकील ने अपने दावे के समर्थन में GPS ट्रैकिंग डेटा भी पेश किया।

    वकील ने आगे यह भी दलील दी कि वाहन बैंक लोन पर था और उसे लगातार हिरासत में रखे जाने से आवेदक को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।

    पीठ ने गौर किया कि आवेदक जिस परमिट पर भरोसा कर रहा था, वह सुबह 2:00 बजे तक ही वैध था, जबकि वाहन को उसी दिन शाम 4:30 बजे रोक लिया गया, जिससे समय में एक बड़ा अंतर दिखाई देता है। इसके अलावा, पीठ ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि आवेदक ने परिवहन के दौरान वाहन खराब होने या देरी के बारे में सक्षम प्राधिकारी को सूचित किया था।

    इसके अतिरिक्त, पीठ ने अवैध रेत खनन के खतरे पर ज़ोर देते हुए कहा कि 'रेत माफिया' का बढ़ता प्रभाव अब एक गंभीर सार्वजनिक चिंता का विषय बन गया। पीठ ने टिप्पणी की कि यह माफिया, क्षमता से अधिक लदे ट्रकों और खराब हालत वाले वाहनों के ज़रिए खनिजों का अवैध परिवहन करने में लिप्त है। पीठ ने कहा कि ये वाहन अक्सर अधिकारियों से बचने के लिए तेज़ी से चलाए जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर पर्यावरण का क्षरण होता है और सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा पैदा होता है।

    पीठ ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि ये वाहन सड़क दुर्घटनाओं में तेज़ी से शामिल हो रहे हैं, जिससे जान-माल का नुकसान हो रहा है।

    इसलिए अदालत ने यह माना कि आवेदक के खिलाफ प्रथम दृष्टया (Prima Facie) मामला बनता है। चूंकि उसके पास राहत पाने का कोई वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है, इसलिए इस मामले में अदालत के हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

    अतः, आवेदन खारिज कर दिया गया।

    Case Title: Budhman Singh v State of Madhya Pradesh [MCRC-5771-2026]

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