मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ग्वालियर की पहाड़ियों को अतिक्रमण और भू-माफिया द्वारा अवैध खुदाई से बचाने के लिए समिति बनाई
Shahadat
9 May 2026 9:49 AM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ग्वालियर की पहाड़ियों को पर्यावरण के नुकसान और भू-माफिया द्वारा अवैध अतिक्रमण से बचाने के लिए ग्वालियर के ज़िला कलेक्टर की अध्यक्षता में एक विशेष समिति बनाने का निर्देश दिया।
जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की डिवीज़न बेंच द्वारा दिया गया यह निर्देश, मध्य प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1956 की धारा 5(54-a) और 130B के तहत बताए गए 'सोशल ऑडिट' (सामाजिक लेखा-परीक्षा) के सिद्धांत पर आधारित था।
यह याचिका जंडेल सिंह यादव ने दायर की थी, जिसमें ग्वालियर में पहाड़ियों की बड़े पैमाने पर अवैध खुदाई और अतिक्रमण तथा ऐसी गतिविधियों से होने वाले पर्यावरणीय खतरों को उजागर किया गया था। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के मामले 'एम.सी. मेहता बनाम कमल नाथ' में प्रतिपादित 'पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत' (सार्वजनिक विश्वास सिद्धांत) का हवाला दिया, जिसमें प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षक के रूप में राज्य की ज़िम्मेदारी पर ज़ोर दिया गया था।
मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह मुद्दा केवल कानूनी या प्रशासनिक नहीं, बल्कि अस्तित्व से जुड़ा है, जो सीधे तौर पर शहर के पर्यावरण, जलवायु और निवासियों के जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
कोर्ट ने कहा,
"अब यह सवाल कानूनी/प्रशासनिक/सामाजिक या न्यायशास्त्रीय आदि होने के अलावा 'अस्तित्व से जुड़ा' भी है। इसलिए एक कड़ा संदेश देना ज़रूरी है। यदि पहाड़ियों/टीलों (जो ग्वालियर शहर के आसपास या भीतर स्थित हैं) को ऐसे ही छोड़ दिया गया तो ज़मीन पर कब्ज़ा करने वाले लोग उन पर अतिक्रमण कर लेंगे। यदि अतिक्रमण नहीं भी हुआ, तब भी उनकी खुदाई की जाएगी। हरियाली (ग्रीन कवर) न होने के कारण ग्वालियर क्षेत्र में पत्थर अत्यधिक गर्मी छोड़ते हैं, जिससे लोगों का जीवन दयनीय हो जाता है।"
अतः, कोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों, विषय विशेषज्ञों और ग्वालियर के प्रमुख निवासियों को मिलाकर एक समिति बनाने का आदेश दिया। कोर्ट ने कृषि वैज्ञानिकों, आयुर्वेद विशेषज्ञों और पशु चिकित्सा विशेषज्ञों को भी इस समिति में शामिल करने का निर्देश दिया, यह देखते हुए कि ये विषय विशेषज्ञ जैव विविधता और सतत विकास को बढ़ावा देने में मदद करेंगे।
इस समिति को पहाड़ियों का सर्वेक्षण करने और उसके बाद आगे किसी भी अवैध अतिक्रमण और खुदाई को रोकने के लिए उस क्षेत्र की घेराबंदी करने और उसकी निगरानी करने का काम सौंपा गया। साथ ही विभिन्न प्रकार के पेड़ों के साथ बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान शुरू करने और मनोरंजक गतिविधियों के लिए 'शहरी वन' विकसित करने का भी निर्देश दिया गया।
बेंच ने समिति को वृक्षारोपण के इष्टतम विकास को सुनिश्चित करने के लिए 'जल संचयन' (Water Harvesting) के अवसरों का पता लगाने का काम भी सौंपा। अदालत ने सार्वजनिक प्रतिनिधियों, पेशेवर संगठनों और नागरिक समूहों के साथ मिलकर काम करने का भी निर्देश दिया ताकि समुदाय की भागीदारी और लचीलेपन को बढ़ाने के लिए प्रयास किए जा सकें। पीठ ने समिति को यह भी निर्देश दिया कि वह पारदर्शी निगरानी और संभावित कार्बन क्रेडिट दस्तावेज़ीकरण के लिए डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म बनाने या उन्हें एकीकृत करने पर विचार करे। यह उसी तरह का होगा जैसा इस हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार के MAP-IT के समन्वय से 'NISARG App' के रूप में तैयार किया था।
पीठ ने आगे कहा,
"यह अदालत ग्वालियर के आम नागरिकों से भी कुछ उम्मीद रखती है। अदालत को उम्मीद है कि निवासी अधिक सक्रिय भूमिका निभाएंगे और इस परियोजना को सफलतापूर्वक लागू करने में मदद करेंगे।"
अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि 'सामाजिक ऑडिट' की अवधारणा शहर के निवासियों को नगर निगम के निर्णय लेने, नीतियों की व्याख्या करने और पर्यावरण संरक्षण की पहलों में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए सशक्त बनाएगी।
अदालत ने आगे निर्देश दिया,
"समिति के सदस्य परियोजना की रूपरेखा तैयार करने, कार्यप्रणाली तय करने, प्रदर्शन का मूल्यांकन करने और भविष्य की कार्ययोजना बनाने के लिए हर पखवाड़े (दो हफ़्ते में एक बार) कम से कम एक बैठक करेंगे। यह बैठक अधिमानतः ग्वालियर के ज़िला कलेक्टर के कार्यालय में या ग्वालियर स्थित हाईकोर्ट परिसर में एडिशनल एडवोकेट जनरल के कार्यालय में आयोजित की जाएगी।"
23 अप्रैल, 2026 को हुई अगली सुनवाई के दौरान, अदालत को सूचित किया गया कि समिति ने एक बैठक की थी और कुछ निर्देश पारित किए। हालांकि, अदालत ने यह टिप्पणी की कि यह याचिका तब तक प्रासंगिक बनी रहेगी, जब तक शहर के चारों ओर की पहाड़ियों पर पर्याप्त संख्या में पेड़ और औषधीय पौधे नहीं लगा दिए जाते और अवैध खुदाई तथा अतिक्रमण को रोकने के लिए एक प्रभावी तंत्र स्थापित नहीं हो जाता।
Case Title: Jandel Singh Yadav v State of Madhya Pradesh, WP NO.6511 of 2026

