एमपी हाईकोर्ट ने कांग्रेस से जुड़े WhatsApp ग्रुप में AI-वीडियो फैलाने के मामले में 'हेबियस कॉर्पस' याचिकाओं को बंद किया

Shahadat

17 July 2026 7:17 PM IST

  • एमपी हाईकोर्ट ने कांग्रेस से जुड़े WhatsApp ग्रुप में AI-वीडियो फैलाने के मामले में हेबियस कॉर्पस याचिकाओं को बंद किया

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 'हेबियस कॉर्पस' याचिकाओं के एक समूह को बंद किया। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि तीन लोगों को पुलिस ने गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लिया और बाद में राजस्थान पुलिस को सौंप दिया। उन पर कांग्रेस से जुड़े WhatsApp ग्रुप में एक न्यूज़ चैनल की पहचान का गलत इस्तेमाल करके AI से बदला हुआ (मैनिपुलेटेड) वीडियो फैलाने का आरोप है। [2026 LiveLaw (MP) 282]

    बता दें, राजस्थान पुलिस ने दावा किया कि एक न्यूज़ चैनल के क्राइम रिपोर्टर ने चैनल की पहचान का गलत इस्तेमाल करके AI से बदले गए वीडियो के बारे में शिकायत दर्ज कराई।

    जांच के दौरान, बीकानेर में कई मोबाइल नंबरों और लोगों के बीच WhatsApp फॉरवर्ड की एक कड़ी का पता चला। इससे भोपाल के रहने वाले बिलाल खान और इनाम अहमद की भूमिका सामने आई। साथ ही निखिल प्रजापति की भी पहचान हुई, जिसने सबसे पहले कांग्रेस से जुड़े WhatsApp ग्रुप में वीडियो फैलाया।

    जयपुर पुलिस की एक टीम 21.04.2026 को भोपाल पहुंची। भोपाल क्राइम ब्रांच की मदद से तीनों संदिग्धों का पता लगाया गया, उनके परिवार वालों की सहमति से लिखित नोटिस के ज़रिए जांच के लिए उन्हें बुलाया गया और 22.04.2026 को जयपुर के ज्योति नगर पुलिस स्टेशन लाया गया।

    पूछताछ पूरी होने और सामने आए सबूतों व बयानों के आधार पर उसी दिन तीनों को औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी की जानकारी उनके परिवार वालों को टेलीफोन पर और उसके बाद संबंधित स्थानीय पुलिस स्टेशनों और कंट्रोल रूम को ईमेल के ज़रिए दी गई, और उन्हें अधिकार-क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। बाद में याचिकाकर्ताओं को ज़मानत मिल गई।

    इस बीच उन तीन लोगों के परिवारों ने हाईकोर्ट में 'हेबियस कॉर्पस' याचिकाएं दायर की थीं। उन्होंने मांग की कि उन्हें कोर्ट में पेश किया जाए, क्योंकि उनका तर्क था कि उन्हें 19 अप्रैल को भोपाल में साइबर क्राइम सेल ने गैर-कानूनी हिरासत में लिया।

    याचिकाओं में तर्क दिया गया कि हिरासत में लेने का कारण नहीं बताया गया और बिना किसी अरेस्ट मेमो के लोगों को गिरफ्तार किया गया। याचिकाओं में यह भी दावा किया गया कि उन्हें औपचारिक गिरफ्तारी, ट्रांजिट रिमांड या कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन किए बिना राजस्थान पुलिस को सौंप दिया गया, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 (जीवन और स्वतंत्रता का संरक्षण तथा गिरफ्तारी और हिरासत के खिलाफ संरक्षण) का उल्लंघन हुआ।

    एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की बेंच ने यह मानते हुए कि 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) रिट ने हिरासत की वैधता की जांच करने का अपना सीमित उद्देश्य पूरा कर लिया, कहा कि इस मामले में दो अलग-अलग पहलू है।

    एक पहलू 19.04.2026 की रात और 21.04.2026 की दोपहर के बीच भोपाल पुलिस के आचरण से संबंधित है।

    दूसरा पहलू राजस्थान पुलिस की कार्रवाई से संबंधित है, जिसने अदालत के सामने रखे गए दस्तावेजों से यह स्पष्ट किया कि तीनों व्यक्तियों को औपचारिक रूप से 22.04.2026 को जयपुर में गिरफ्तार किया गया, उसके बाद उन्हें अधिकार-क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, नियमानुसार हिरासत में भेजा गया, और तब से उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया।

    यह पाते हुए कि 'हेबियस कॉर्पस' का उद्देश्य पूरा हो गया, अदालत ने कहा:

    "यह अदालत पाती है कि संबंधित व्यक्ति (कॉर्पस), यानी बिलाल खान, निखिल प्रजापति उर्फ ​​अतुल प्रजापति और इनाम अहमद, इन कार्यवाही के दौरान अदालत के सामने पेश किए गए; बाद में पता चला कि उन्हें केस नंबर 100/2026 दर्ज होने के बाद जयपुर में औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया, अधिकार-क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और कानून के अनुसार हिरासत में भेजा गया, और तब से उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया। इसलिए 'हेबियस कॉर्पस' रिट का उद्देश्य - यानी संबंधित व्यक्तियों को अवैध हिरासत से पेश करना और रिहा करना - काफी हद तक पूरा हो गया। इस आधार पर इन याचिकाओं को और अधिक समय तक लंबित रखने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा।"

    अदालत ने पहले राजस्थान राज्य को मामले में पक्षकार बनाया और संबंधित व्यक्तियों को पेश करने, भोपाल के पुलिस कमिश्नर से रिपोर्ट और पुलिस ट्रांसपोर्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट का सीसीटीवी फुटेज पेश करने का निर्देश दिया।

    26 अप्रैल, 2026 को अदालत को सूचित किया गया कि संबंधित व्यक्तियों को पहले ही जयपुर में न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया और उन्हें पेश नहीं किया जा सका। इसलिए अदालत ने राजस्थान पुलिस को निर्देश दिया कि वे अगली तारीख पर संबंधित व्यक्तियों को पेश करें। साथ ही तथ्यों की जानकारी रखने वाले एक अधिकारी और सभी संबंधित दस्तावेजों को भी लाएं; और साथ ही मध्य प्रदेश राज्य को निर्देश दिया कि वे सीसीटीवी फुटेज के टाइम स्टैम्प में विसंगति को ठीक करने के बाद उसे पेश करें।

    हिरासत में लिए गए लोगों और राजस्थान पुलिस के बयानों में अंतर देखने के बाद कोर्ट ने 12 मई को मजिस्ट्रेट कोर्ट को उन तीनों लोगों के बयान दर्ज करने का निर्देश दिया।

    सीलबंद लिफ़ाफ़े में सौंपे गए बयानों की जांच करने के बाद बेंच ने पाया कि यह मामला पहली नज़र में गैर-कानूनी हिरासत का है, इसलिए भोपाल पुलिस कमिश्नर को शिकायत दर्ज करने और उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

    कोर्ट ने पहले गौर किया कि कमिश्नर की रिपोर्ट से पता चलता है कि उन लोगों को उनके परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में राजस्थान पुलिस को सौंपा गया और परिवार के सदस्यों के शहर से बाहर होने के कारण उन्हें नोटिस नहीं भेजा जा सका। रिपोर्ट में कहा गया कि इकट्ठा की गई जानकारी के आधार पर गैर-कानूनी हिरासत का मामला साबित नहीं हो सका।

    कोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिकाओं का निपटारा किया।

    घटनाक्रम के बारे में चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किए गए उन लोगों के बयानों के संबंध में कोर्ट ने निर्देश दिया कि इसे BNSS के तहत शिकायत माना जाए और उचित कार्रवाई की जाए।

    हाईकोर्ट ने कहा कि हिरासत में लिए गए लोग कथित गैर-कानूनी हिरासत के आधार पर कानून के तहत मिलने वाले मुआवज़े या अन्य राहत के लिए उचित फोरम या सक्षम कोर्ट में जाने के लिए स्वतंत्र हैं।

    Case Title: Khizar Khan v State of Madhya Pradesh and connected petitions

    Next Story