"जल्दबाज़ी में न्याय, न्याय को दबाना:" मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने POCSO आरोपी को एक्सपर्ट गवाह को बुलाने की इजाज़त दी

Shahadat

18 Feb 2026 10:31 AM IST

  • जल्दबाज़ी में न्याय, न्याय को दबाना: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने POCSO आरोपी को एक्सपर्ट गवाह को बुलाने की इजाज़त दी

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी को सिर्फ़ टेक्निकल वजहों जैसे कि एप्लीकेशन फाइल करने में देरी या पुराने केस पेंडिंग होने पर फॉरेंसिक एक्सपर्ट को बुलाने और उनसे पूछताछ करने के मौके से मना नहीं किया जा सकता। साथ ही यह भी कहा कि केस का जल्दी निपटारा फेयर ट्रायल की कीमत पर नहीं हो सकता।

    जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह ने आरोपी द्वारा दायर क्रिमिनल रिवीजन को मंज़ूरी दी, जिसमें स्पेशल जज (POCSO), रीवा के ऑर्डर को चुनौती दी गई। इस ऑर्डर में फॉरेंसिक एक्सपर्ट समेत बचाव पक्ष के गवाहों को बुलाने की मांग करने वाली CrPC की धारा 91 और 233 (और BNSS के तहत मिलते-जुलते प्रोविज़न) के तहत उसका आवेदन खारिज किया गया। इसके बजाय केस को फाइनल आर्गुमेंट के लिए तय किया।

    ट्रायल कोर्ट ने इस आधार पर रिक्वेस्ट मना कर दी कि यह केस “सबसे पुराने 100 केस” की कैटेगरी में आता है, जिसमें जल्दी निपटारे की ज़रूरत होती है। साथ ही CrPC की धारा 293 के तहत सरकारी फोरेंसिक एक्सपर्ट की रिपोर्ट बिना किसी फॉर्मल सबूत के भी मानी जा सकती है।

    इससे सहमत न होते हुए हाईकोर्ट ने साफ़ किया कि हालांकि धारा 293 एक्सपर्ट रिपोर्ट को सबूत के तौर पर इस्तेमाल करने की इजाज़त देता है, लेकिन कोर्ट के पास एक्सपर्ट को बुलाने और उनसे पूछताछ करने का अधिकार है, खासकर तब जब बचाव पक्ष रिपोर्ट पर सवाल उठाता है। उसने कहा कि एक बार जब आरोपी DNA या फोरेंसिक सबूत पर आपत्ति जताता है और एक्सपर्ट से जिरह करना चाहता है तो ऐसी रिक्वेस्ट को बहुत ज़्यादा टेक्निकल वजहों से मना नहीं किया जा सकता।

    इन रेफरेंस बनाम अनोखीलाल में डिवीजन बेंच के फैसले और राहुल बनाम मध्य प्रदेश राज्य में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सिर्फ़ साइंटिफिक रिपोर्ट दिखाने से उसका कंटेंट साबित नहीं होता और ऐसे सबूतों को टेस्ट करने का सही मौका दिया जाना चाहिए।

    ज़रूरी बात यह है कि कोर्ट ने कहा:

    “जब आरोपी DNA रिपोर्ट पर एतराज़ करता है और एक्सपर्ट गवाह से पूछताछ करना चाहता है तो टेक्निकल ग्राउंड पर एप्लीकेशन रिजेक्ट नहीं की जा सकती। जल्दी निपटारे का मतलब जल्दबाजी में ट्रायल करना नहीं है। देर से मिला न्याय, न्याय से इनकार है, लेकिन जल्दबाजी में मिला न्याय, न्याय को दबाना है।”

    यह मानते हुए कि मौका न देने से बचाव पक्ष को नुकसान होगा और ट्रायल की फेयरनेस पर असर पड़ेगा, कोर्ट ने विवादित आदेश रद्द किया और ट्रायल कोर्ट को आगे बढ़ने से पहले एक्सपर्ट और दूसरे गवाहों को बुलाने और उनके बयान रिकॉर्ड करने का निर्देश दिया।

    Case Title: Avinash Pandey v. State of Madhya Pradesh & Ors.

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