Motor Accident | मौत के बाद भी पारिवारिक बिज़नेस चलते रहने कारण ur आश्रितों के आर्थिक नुकसान का दावा खारिज नहीं किया जा सकता: एमपी हाईकोर्ट

  • Motor Accident | मौत के बाद भी पारिवारिक बिज़नेस चलते रहने कारण ur आश्रितों के आर्थिक नुकसान का दावा खारिज नहीं किया जा सकता: एमपी हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना में कमाने वाले सदस्य की मौत के कारण आश्रितों को हुए आर्थिक नुकसान के दावे को सिर्फ़ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि मृतक जिस पैथोलॉजी सेंटर से जुड़ा था, उसे परिवार के किसी दूसरे सदस्य ने चलाना जारी रखा। [2026 LiveLaw (MP) 401]

    जस्टिस रामकुमार चौबे की बेंच ने इस धारणा को भी खारिज किया कि कमाने वाले सदस्य की मौत के बाद भी आश्रितों को आय मिल रही थी, सिर्फ़ इसलिए कि वह संस्थान (बिज़नेस) चलता रहा।

    कोर्ट ने कहा,

    "कमाने वाले सदस्य की मौत से जुड़े दावे में अहम बात यह है कि उस सदस्य की मौत के कारण आश्रितों को कितना आर्थिक नुकसान हुआ। परिवार के किसी दूसरे सदस्य द्वारा संस्थान को आगे चलाने से मृतक की व्यक्तिगत कमाई की क्षमता का नुकसान अपने-आप खत्म नहीं हो जाता। सिर्फ़ इसलिए कि बिज़नेस या संस्थान चलता रहा, यह नहीं माना जा सकता कि मृतक पर निर्भर पत्नी और बच्चों को वह आय मिलती रही, जो मृतक खुद कमाता था।"

    एक इंश्योरेंस कंपनी ने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 173(1) के तहत एक विविध अपील दायर की। यह अपील मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (Motor Accident Claims Tribunal) के उस आदेश के खिलाफ थी, जिसमें दावेदारों को ₹12.90 लाख का मुआवज़ा दिया गया।

    दावेदार मृतक के बच्चे, पत्नी और माँ हैं, जिनकी मौत एक वाहन दुर्घटना में हुई। यह दुर्घटना 2 जनवरी 2009 को हुई, जब मृतक एक वैन में यात्रा कर रहा था और पीछे से एक डंपर से टकरा गया।

    न्यायाधिकरण ने सबूतों की जांच के बाद पाया कि वह अपने पेशे से आय अर्जित कर रहा था और उसकी मासिक आय ₹10,000 आंकी गई। न्यायाधिकरण ने पत्नी और बच्चों को आश्रित माना, लेकिन मृतक की माँ को आश्रित नहीं माना। इसके अनुसार, कुल मुआवज़ा ₹12.90 लाख तय किया गया। अपीलकर्ता के वकील ने इस आधार पर फैसले को चुनौती दी कि ट्रिब्यूनल के पास आय को ₹10,000 प्रति माह आंकने का कोई आधार नहीं। वकील ने तर्क दिया कि मृतक की मृत्यु के बाद भी 'गुरु पैथोलॉजी' का काम चलता रहा, इसलिए उस संस्थान से आय का कोई नुकसान नहीं हुआ।

    यह भी तर्क दिया गया कि मृतक ने खुद डंपर को पीछे से टक्कर मारी थी, इसलिए उसे 'कंट्रीब्यूटरी नेग्लिजेंस' (आपसी लापरवाही) का दोषी माना जाना चाहिए।

    अदालत ने गौर किया कि आय का आकलन 'गुरु पैथोलॉजी' से जुड़ी उसकी आय के सबूतों के आधार पर किया गया। इसके अलावा, बेंच ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि मृतक की मृत्यु के बाद भी पैथोलॉजी संस्थान चलता रहा, यह नहीं कहा जा सकता कि जीवित रहते हुए उसे उससे कोई व्यक्तिगत आय नहीं होती थी।

    बेंच ने यह भी कहा कि संस्थान का प्रबंधन उसके भाई द्वारा किया जा रहा था, यह मुख्य बात नहीं होगी, क्योंकि इसे अपने आप मृतक की विधवा और बच्चों को मिलने वाली आय नहीं माना जा सकता।

    इसके अलावा, अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता ऐसा कोई सबूत नहीं दिखा सका जिससे यह साबित हो कि ट्रिब्यूनल द्वारा आंकी गई आय गलत या कानूनी रूप से गलत थी।

    'कंट्रीब्यूटरी नेग्लिजेंस' (आपसी लापरवाही) के तर्क के संबंध में अदालत ने कहा:

    "सिर्फ यह तथ्य कि एक वाहन दूसरे वाहन के पीछे चलते हुए उससे पीछे से टकरा गया, हर मामले में और अकेले तौर पर पीछे से आने वाले वाहन के ड्राइवर की लापरवाही का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता। आसपास की परिस्थितियों और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों पर विचार करना होगा।"

    मुआवजे की गणना पर अपीलकर्ता की आपत्ति के संबंध में अदालत ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने उम्र, आय, आश्रितों की संख्या और लागू मल्टीप्लायर पर विचार करने के बाद आकलन किया।

    इसके अलावा, इस तथ्य का जिक्र करते हुए कि ट्रिब्यूनल ने मां को आश्रित नहीं माना, बेंच ने कहा कि इससे पता चलता है कि ट्रिब्यूनल ने हर दावेदार को आश्रित नहीं माना, बल्कि निर्भरता के सवाल की अलग से जांच की।

    इस प्रकार, बेंच ने माना कि ट्रिब्यूनल के आदेश में दखल देने का कोई आधार नहीं था और अपील खारिज की।

    Case Title : Reliance General v Ku Maitri Jain

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