स्क्रैपयार्ड में हुए धमाके के बाद हुई मौत के मामले में 'गैर-इरादतन हत्या' का आरोप लगाने के लिए सिर्फ़ स्क्रैपयार्ड के मालिक से जुड़ाव काफ़ी नहीं: एमपी हाईकोर्ट
Shahadat
14 Oct 2026 7:47 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ दर्ज FIR रद्द की। उस व्यक्ति पर स्क्रैपयार्ड में हुए धमाके के मामले में 'गैर-इरादतन हत्या' का आरोप है; इस धमाके में दो लोगों की मौत हो गई थी और दो अन्य घायल हो गए। [2026 LiveLaw (MP) 415]
ऐसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि आरोपी का स्क्रैपयार्ड के मालिक से सिर्फ़ जुड़ाव या संबंध होना, या उस जगह पर आरोपी की मौजूदगी (जहाँ उसने कथित तौर पर निर्देश दिए थे) 'गैर-इरादतन हत्या' का आरोप लगाने के लिए काफ़ी नहीं है, जब तक कि इस बात का कोई सबूत न हो कि वह धमाके के लिए ज़िम्मेदार है।
जस्टिस हिमांशु जोशी की बेंच ने यह देखते हुए कि वह व्यक्ति सिर्फ़ उस स्क्रैप-यार्ड के मालिक से जुड़ा हुआ है, कहा:
"राज्य ने उन कर्मचारियों के बयानों पर भरोसा किया, जिनका आरोप है कि याचिकाकर्ता स्क्रैप-यार्ड में आया था और निर्देश दिए थे। भले ही ऐसे बयानों को सच मान लिया जाए, लेकिन सिर्फ़ उस जगह पर मौजूद होना, मालिक के साथ पारिवारिक संबंध होना, या कर्मचारियों को आम निर्देश देना—बिना किसी ऐसे सबूत के जो कथित साज़िश में शामिल होने, विस्फोटक पदार्थ की जानकारी और कब्ज़े या नियंत्रण, या धमाके का कारण बनने वाले काम में भागीदारी को दिखाए—अपने आप में उन अपराधों के ज़रूरी तत्वों को साबित नहीं कर सकता जिनका आरोप लगाया गया। किसी व्यक्ति पर सिर्फ़ इसलिए आपराधिक ज़िम्मेदारी नहीं डाली जा सकती, क्योंकि उसका किसी दूसरे आरोपी के साथ संबंध है...
इस मामले में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जो यह दिखाए कि याचिकाकर्ता विस्फोटक पदार्थ को खरीदने, अपने पास रखने, स्टोर करने या संभालने में शामिल था, या वह उन हालात के लिए ज़िम्मेदार है जिनमें धमाका हुआ। ऐसा कोई सबूत भी नहीं है, जो उसकी तरफ़ से किसी ऐसे खास काम या चूक को दिखाए, जिसका उन मौतों से सीधा संबंध हो या जो ज़रूरी इरादे या जानकारी को साबित करे। उस जगह के मालिक के साथ सिर्फ़ जुड़ाव, या स्क्रैप-यार्ड में कथित मौजूदगी और आम निर्देश देना—बिना किसी ऐसे सबूत के जो उस काम में भागीदारी साबित करे जिसके कारण धमाका हुआ—IPC की धारा 304 की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकता।"
याचिकाकर्ता ने IPC की धारा 304 (गैर-इरादतन हत्या), धारा 120B (आपराधिक साज़िश), और धारा 212 (अपराधी को पनाह देना) के साथ-साथ विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 3 और 5 के तहत दर्ज FIR को रद्द करने के लिए याचिका दायर की।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 25 अप्रैल 2024 को 'रज़ा मेटल इंडस्ट्रीज़' नाम के स्क्रैप-यार्ड में एक धमाका हुआ, जिसमें दो लोग घायल हो गए और दो अन्य की मौत हो गई। इसके बाद अपराध दर्ज किया गया। याचिकाकर्ता सह-आरोपी एफके का पिता है, जिसे उस स्क्रैप-यार्ड का मालिक बताया जाता है। जांच के दौरान यह आरोप लगाया गया कि यार्ड में जमा किए गए स्क्रैप में लॉन्ग प्रूफ रेंज, खमरिया, जबलपुर से लाए गए बेकार हो चुके गोला-बारूद और विस्फोटक पदार्थ शामिल थे, और उन्हें असुरक्षित तरीके से संभालने के कारण ही धमाका हुआ।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि उन्हें झूठे मामले में फंसाया गया, क्योंकि स्क्रैप-यार्ड के कारोबार से उनका कोई लेना-देना नहीं था। वकील ने बताया कि दस्तावेजों के अनुसार, स्क्रैप-यार्ड पूरी तरह से याचिकाकर्ता के बेटे के नाम पर था, और याचिकाकर्ता न तो मालिक था, न ही पार्टनर और न ही डायरेक्टर।
यह भी बताया गया कि रज़ा मेटल्स के लिए याचिकाकर्ता को जारी किए गए फोटो पहचान पत्र से उन्हें विस्फोटक खरीदने या संभालने की इजाज़त नहीं मिलती थी, जैसा कि MSTC लिमिटेड द्वारा 4 जुलाई, 2024 को जारी किए गए पत्र से साफ होता है।
राज्य के वकील ने दलील दी कि यह याचिका ज़रूरी तथ्यों को छिपाकर और याचिकाकर्ता के आचरण के बारे में गलत जानकारी देकर दायर की गई। यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता ने पहले दायर की गई याचिकाओं का ज़िक्र किए बिना बार-बार अदालत का दरवाज़ा खटखटाया। राज्य ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता ने पहले अग्रिम ज़मानत के लिए हाईकोर्ट में अर्ज़ी दी, जिसे पैरवी न होने के कारण खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने FIR रद्द करने के लिए अर्ज़ी दायर की, लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया।
राज्य ने तर्क दिया कि कर्मचारियों के बयानों से पता चलता है कि याचिकाकर्ता स्क्रैप-यार्ड के कामकाज में शामिल था और मज़दूरों को निर्देश देता था। यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता आदतन अपराधी और हिस्ट्री-शीटर है, जिस पर 1995 से अब तक हत्या (धारा 302), हत्या की कोशिश (धारा 307), खतरनाक हथियार से जान-बूझकर चोट पहुंचाना (धारा 324), चोरी (धारा 379), जबरन वसूली (धारा 384) और आर्म्स एक्ट व विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत 18 मामले दर्ज हैं।
याचिकाकर्ता की याचिका के स्वीकार्य होने पर उठाई गई आपत्ति पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा कि पिछली मिसलेनियस एप्लीकेशन (विविध अर्जियां) नई याचिका दायर करने की छूट के साथ वापस ले ली गईं।
मुस्कान एंटरप्राइजेज बनाम हरियाणा राज्य के मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि पिछली याचिका खारिज होने का मतलब यह नहीं है कि CrPC की धारा 482 के तहत बाद में कोई याचिका दायर नहीं की जा सकती, खासकर तब जब ऐसा कानून में बदलाव के कारण किया जा रहा हो।
राज्य के इस तर्क पर कि पिछली अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) खारिज कर दी गई, बेंच ने जोर दिया कि पिछली अग्रिम जमानत खारिज होने से कोर्ट को स्वतंत्र रूप से यह जांचने से नहीं रोका जा सकता कि क्या आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
स्क्रैपयार्ड में याचिकाकर्ता की भूमिका के संबंध में बेंच ने कहा कि भले ही कर्मचारियों के बयान उस जगह पर याचिकाकर्ता की मौजूदगी दिखाते हों, लेकिन यह अकेले कथित अपराधों के लिए जरूरी तत्वों को साबित नहीं कर सकता।
तथ्यों पर गंभीरता से विचार करते हुए बेंच ने कहा:
"यह ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है कि आरोपों की गंभीरता और इस तथ्य के बावजूद कि जांच काफी समय से लंबित है, अभियोजन पक्ष ने CrPC की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने ऐसे बयान दर्ज कराने का कोई प्रयास नहीं किया। CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज बयान जांच का हिस्सा होते हैं और ठोस सबूत नहीं होते हैं।"
इसलिए बेंच ने माना कि ऐसा कोई सबूत नहीं है, जो याचिकाकर्ता की ओर से किसी ऐसे विशिष्ट कार्य या चूक की ओर इशारा करता हो, जिसका सवाल में आई मौतों और चोटों से सीधा संबंध हो। तदनुसार, बेंच ने याचिका स्वीकार की और याचिकाकर्ता के खिलाफ FIR रद्द की।
Case Title : Mohd Shamim Khan v State of Madhya Pradesh

