महाकुंभ से चर्चा में आईं महिला को राहत: एमपी हाई कोर्ट ने जन्म प्रमाण पत्र में सुधार का आदेश रद्द किया

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    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 2025 के महाकुंभ के दौरान चर्चा में आईं एक युवती को राहत दी। कोर्ट ने वह आदेश रद्द किया, जिसके तहत अधिकारियों ने उसका पुराना जन्म प्रमाण पत्र रद्द किया और उसकी जन्म तिथि 1 जनवरी 2008 से बदलकर 30 दिसंबर 2009 कर दी थी। [2026 LiveLaw (MP) 398]

    याचिकाकर्ता को अपनी बात रखने का उचित मौका देने के बाद उसके पिता की जन्म रिकॉर्ड में सुधार की अर्जी पर फिर से विचार करने का निर्देश देते हुए जस्टिस गजेंद्र सिंह की बेंच ने कहा:

    "याचिकाकर्ता नंबर 1 को जन्म तिथि में सुधार के लिए प्रतिवादी नंबर 3 (पिता) की अर्जी के बारे में कोई सूचना नहीं दी गई और उसे अपनी बात रखने का कोई मौका नहीं दिया गया, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन हुआ... इसलिए मुख्य नगर पालिका अधिकारी, महेश्वर, जिला खरगोन द्वारा पारित आदेश संख्या 405/Na.Pa./2026 (दिनांक 31.03.2026) को रद्द किया जाता है। इस आदेश के तहत जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 की धारा 15 और मध्य प्रदेश जन्म और मृत्यु पंजीकरण नियम, 2024 के नियम 11 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 05.06.2025 की एंट्री को रद्द करके याचिकाकर्ता नंबर 1 की जन्म तिथि में सुधार किया गया। प्रतिवादी नंबर 5 को निर्देश दिया जाता है कि वह कानून के अनुसार याचिकाकर्ता नंबर 1 को अपनी बात रखने का उचित मौका देने के बाद प्रतिवादी नंबर 3 (याचिकाकर्ता नंबर 1 के पिता) की अर्जी पर फैसला करे।"

    चर्चा में आने के बाद याचिकाकर्ता बॉलीवुड एक्ट्रेस बनने की इच्छा रखती थी; इसलिए उसके माता-पिता ने सक्षम अधिकारी के पास जन्म प्रमाण पत्र जारी करने के लिए अर्जी दी थी। माता-पिता ने उसकी जन्म तिथि 1 जनवरी 2008 बताई और दावा किया कि उसका जन्म घर पर हुआ। तय प्रक्रिया का पालन करते हुए सक्षम अधिकारी ने 5 जून, 2025 को जन्म के रजिस्ट्रेशन का निर्देश दिया और एक बर्थ सर्टिफिकेट जारी किया गया जिसमें उनकी जन्म तिथि 1 जनवरी, 2008 बताई गई। रिकॉर्ड से पता चला कि 2015 में उन्हें उसी जन्म तिथि के साथ आधार कार्ड भी जारी किया गया। बाद में 2026 में पैन कार्ड जारी किया गया। इसके अलावा, 18 साल की उम्र पूरी करने के बाद उन्हें वोटर फोटो पहचान पत्र जारी किया गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने 11 मार्च, 2026 को अपने पति (याचिकाकर्ता नंबर 2) से शादी की।

    शादी के बाद उनके पिता कम्युनिटी हेल्थ सेंटर के ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर के पास गए और कहा कि उन्हें बाद में घर के बुजुर्ग रिश्तेदारों से पता चला कि उनकी बेटी का जन्म असल में सरकारी अस्पताल में हुआ। अस्पताल के रिकॉर्ड के आधार पर, 19 मार्च, 2026 को एक सर्टिफिकेट जारी किया गया और सक्षम अधिकारी को भेजा गया।

    इसके बाद अधिकारियों ने जन्म की पिछली एंट्री रद्द की और 'जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1969' की धारा 15 और 'एमपी जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रेशन एक्ट' का इस्तेमाल करते हुए जन्म तिथि को बदलकर 30 दिसंबर, 2009 कर दिया।

    यह बदलाव महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे याचिकाकर्ता के बालिग होने में लगभग दो साल की देरी हो जाती। नई जन्म तिथि के आधार पर, उनके पिता ने एक शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर अपहरण (BNS की धारा 137(2)) का मामला दर्ज किया गया। बाद में BNS, 2023 की धारा 81, 83 और 87, 'बाल विवाह निषेध एक्ट, 2006' की धारा 9, और 'अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) एक्ट, 1989' की धारा 3(2)(v) और 3(2)(v-a) के तहत मामला दर्ज किया गया।

    इस प्रकार, याचिकाकर्ता ने राहत पाने के लिए एमपी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि शुरू में उसके पिता उसके और उसके पति के साथ थे, लेकिन बाद में उन्होंने उनके रिश्ते का विरोध किया और आरोप है कि ज़बरदस्ती शादी कराने की धमकी दी। इसलिए उसने याचिकाकर्ता नंबर 2 के साथ मिलकर थम्पानूर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उसने अपने पिता द्वारा धमकी और ज़बरदस्ती करने का आरोप लगाया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने केरल में शादी की।

    शादी के बाद याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उसके पिता ने अपने साथियों के साथ मिलकर उसके जन्म के रिकॉर्ड में हेरफेर किया ताकि उसे नाबालिग दिखाया जा सके। याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि बाद में उसके पिता ने यह दावा करते हुए FIR दर्ज कराई कि याचिकाकर्ता नंबर 1, 27 फरवरी, 2026 से लापता है। उसने दावा किया कि उसके पिता 2 मार्च को उसके साथ केरल गए।

    याचिकाकर्ता ने आगे आरोप लगाया कि विवादित दस्तावेजों को मीडिया और सोशल मीडिया पर फैलाया गया ताकि याचिकाकर्ता नंबर 1 को नाबालिग और उसके पति को आतंकवादी दिखाया जा सके और उनकी शादी को 'लव जिहाद' का नाम दिया जा सके।

    गिरफ्तारी की आशंका में याचिकाकर्ताओं ने केरल हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसने उन्हें 23 मार्च, 2026 को गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान की।

    बेंच ने गौर किया कि जन्म तिथि बदलने से याचिकाकर्ता पर कई सिविल परिणाम (कानूनी अधिकार से जुड़े असर) हुए। बेंच ने कहा कि इस तरह के बदलाव से उसके वोट देने के अधिकार, बैंक खाते चलाने की स्वतंत्रता, अनुबंध करने की क्षमता पर असर पड़ सकता है और इस बदलाव से उसके साथी पर आपराधिक मुकदमा भी चल सकता है।

    कोर्ट ने कहा कि ये परिणाम बहुत महत्वपूर्ण थे और दो साल के लिए अधिकारों से वंचित करना भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत याचिकाकर्ता के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को प्रभावित करता है।

    प्रतिवादी की इस दलील को खारिज करते हुए कि पिता को बदलाव के बारे में सूचित किया गया, बेंच ने कहा कि जिस व्यक्ति पर सुधार का सीधा असर पड़ रहा है, उसे सूचित नहीं किया गया और न ही उसे अपनी बात रखने का मौका दिया गया। कोर्ट ने कहा कि जब याचिकाकर्ता खुद प्रभावित थी, तो केवल उसके पिता को सूचना देना 'ऑडी ऑल्टरम पार्टम' (दूसरे पक्ष को भी सुनें) की आवश्यकता को पूरा नहीं करता।

    कोर्ट ने कहा,

    "'ऑडी ऑल्टरम पार्टम' नियम, जो असल में संविधान के अनुच्छेद 14 के समानता के सिद्धांत को लागू करता है, न केवल अर्ध-न्यायिक आदेशों पर बल्कि संबंधित पक्ष पर बुरा असर डालने वाले प्रशासनिक आदेशों पर भी लागू होता है, जब तक कि किसी अधिनियम, विनियमन या नियम द्वारा इस नियम को स्पष्ट रूप से बाहर न किया गया हो।"

    वैकल्पिक उपाय मौजूद होने की दलील खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि बदलाव से महत्वपूर्ण सिविल परिणाम होने के बावजूद याचिकाकर्ता को सुनवाई का मौका नहीं दिया गया।

    Case Title : MB v State of Madhya Pradesh

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