क्रॉस-वोटिंग के आधार पर चुनाव रद्द करना गलत, ट्रिब्यूनल ने की “मोरल पुलिसिंग”: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Praveen Mishra

21 April 2026 1:44 PM IST

  • क्रॉस-वोटिंग के आधार पर चुनाव रद्द करना गलत, ट्रिब्यूनल ने की “मोरल पुलिसिंग”: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मलताई नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष पद के चुनाव को रद्द करने के चुनाव ट्रिब्यूनल के फैसले को निरस्त करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि ट्रिब्यूनल ने “मोरल पुलिसिंग” करते हुए अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्णय दिया।

    जस्टिस विवेक जैन की एकल पीठ ने कहा कि जब चुनाव पार्टी लाइन पर नहीं लड़ा गया था, तब “क्रॉस-वोटिंग” का सवाल ही नहीं उठता और इसे भ्रष्ट आचरण का आधार नहीं बनाया जा सकता।

    मामले की पृष्ठभूमि

    मामला वर्ष 2022 में हुए नगर पालिका परिषद, मलताई के अध्यक्ष चुनाव से जुड़ा है। पहले पार्षदों का चुनाव आम जनता द्वारा किया गया था, जिसके बाद पार्षदों ने आपस में अध्यक्ष का चयन किया। अध्यक्ष का चुनाव पार्टी चिन्ह पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आधार पर हुआ था।

    चुनाव में कुल 15 पार्षदों ने मतदान किया, जिसमें याचिकाकर्ता को 9 और प्रतिवादी को 6 वोट मिले। इसके बाद प्रतिवादी ने चुनाव याचिका दायर कर आरोप लगाया कि कुछ बैलेट पेपर पर पहचान के निशान थे और विजेता उम्मीदवार ने Indian National Congress के पार्षदों का समर्थन लेकर जीत हासिल की, जबकि वह Bharatiya Janata Party से जुड़ी थीं।

    चुनाव ट्रिब्यूनल ने इन आरोपों को स्वीकार करते हुए चुनाव को शून्य घोषित कर दिया था और पुनः चुनाव कराने के निर्देश दिए थे।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के निष्कर्षों को खारिज करते हुए कहा कि बैलेट पेपर पर पाए गए “इंक के धब्बे” या “पेन ट्रेल” किसी प्रकार के पहचान चिन्ह नहीं हैं, क्योंकि ऐसे निशान दोनों पक्षों के मतपत्रों में पाए गए थे और उनका कोई निश्चित पैटर्न नहीं था।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि अध्यक्ष पद का चुनाव पार्टी आधार पर नहीं था, इसलिए किसी अन्य पार्टी के पार्षदों द्वारा मतदान करना अवैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी पार्टी का उम्मीदवार चुनाव में नहीं है, तो उसके निर्वाचित प्रतिनिधियों का मतदान करना स्वाभाविक है।

    “मोरल पुलिसिंग” पर टिप्पणी

    अदालत ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने यह मानकर कि विजेता उम्मीदवार को विपक्षी दल के पार्षदों का समर्थन नहीं लेना चाहिए था, “मोरल पुलिसिंग” की है। यह राजनीतिक दलों का आंतरिक विषय हो सकता है, न कि चुनाव को रद्द करने का कानूनी आधार।

    भ्रष्ट आचरण पर रुख

    कोर्ट ने दोहराया कि भ्रष्ट आचरण (corrupt practice) के आरोपों को साबित करने के लिए ठोस और स्पष्ट साक्ष्य आवश्यक होते हैं। केवल अनुमान या परिस्थितिजन्य व्याख्या के आधार पर ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

    आदेश

    हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द करते हुए विजेता उम्मीदवार के चुनाव को बहाल कर दिया और उन्हें पुनः पद संभालने की अनुमति दी।

    निष्कर्ष

    यह निर्णय स्पष्ट करता है कि चुनावी प्रक्रिया में “क्रॉस-वोटिंग” को स्वतः अवैध या भ्रष्ट आचरण नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब चुनाव पार्टी लाइन पर न हो। साथ ही, अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि न्यायिक संस्थाएं नैतिकता के आधार पर नहीं, बल्कि कानून के दायरे में रहकर निर्णय लेंगी।

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