बिजली के बिना जीवन संभव नहीं, बिजली पाने का अधिकार भी अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Praveen Mishra
15 Oct 2026 6:04 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि आधुनिक समय में बिजली के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए बिजली पाने का अधिकार भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है।
जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के की पीठ ने बिजली विभाग को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के वर्तमान आवास पर सात दिनों के भीतर बिजली कनेक्शन जारी करे। यह निर्देश लागू कानूनी शर्तों और अन्य आवश्यक मानकों के अनुपालन के अधीन दिया गया है।
अदालत ने कहा कि बिजली वितरण प्राधिकरण केवल संपत्ति के स्वामित्व, बंटवारे या पक्षकारों के बीच नागरिक विवाद के आधार पर बिजली कनेक्शन देने से इनकार नहीं कर सकते, जब तक संबंधित व्यक्ति परिसर पर कब्जे में रहते हुए कानून के तहत कनेक्शन पाने का हकदार है।
क्या है मामला?
यह मामला ग्वालियर स्थित एक संपत्ति में अस्थायी बिजली कनेक्शन काटे जाने से संबंधित है। याचिकाकर्ता ने अपनी मां की शिकायत के आधार पर बिजली विभाग द्वारा कनेक्शन काटे जाने की कार्रवाई को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि सिविल कार्यवाही के दौरान हुए समझौते के अनुसार विवादित संपत्ति में उसका सातवां हिस्सा है और वह अपने परिवार के साथ संपत्ति के उस हिस्से में रह रही है।
हालांकि, बाद में याचिकाकर्ता और उसकी मां के बीच विवाद उत्पन्न हो गया। याचिकाकर्ता का आरोप था कि उसकी मां ने उसके शांतिपूर्ण कब्जे में हस्तक्षेप किया और पानी तथा बिजली की आपूर्ति में बाधा डाली।
याचिकाकर्ता को 20 अगस्त 2025 को अस्थायी घरेलू बिजली कनेक्शन दिया गया था। उसके अनुसार, वह नियमित रूप से बिजली बिल का भुगतान कर रही थी। लेकिन उसकी मां की शिकायत के बाद 27 अगस्त 2025 को कनेक्शन काट दिया गया।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने नए बिजली कनेक्शन के लिए आवेदन किया।
उसकी ओर से यह भी बताया गया कि बिजली नहीं होने के कारण परिवार को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। विशेष रूप से कक्षा 9 और 10 में पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
बिजली विभाग ने क्या दलील दी?
बिजली विभाग की ओर से तर्क दिया गया कि जब तक याचिकाकर्ता संबंधित परिसर पर अपना अधिकार स्थापित नहीं कर देती, तब तक उसके पक्ष में बिजली कनेक्शन जारी नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर, याचिकाकर्ता ने विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 43 का हवाला देते हुए कहा कि निर्धारित शर्तों के अधीन परिसर के मालिक या कब्जाधारी को बिजली कनेक्शन उपलब्ध कराना बिजली वितरण प्राधिकरण का वैधानिक दायित्व है।
उसने यह भी दलील दी कि सिविल कार्यवाही में हुए समझौते से संबंधित दस्तावेज और पहले जारी किए गए बिजली बिल उसके कब्जे तथा बिजली कनेक्शन के दावे का समर्थन करते हैं।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता और उसकी मां के बीच विवाद मुख्य रूप से संपत्ति में हिस्सेदारी, अधिकार और कब्जे से संबंधित है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि बिजली कनेक्शन के आवेदन पर विचार करते समय बिजली वितरण प्राधिकरणों से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे संपत्ति के स्वामित्व, बंटवारे या पक्षकारों के बीच जटिल नागरिक अधिकारों का निर्णय करें।
पीठ ने विद्युत अधिनियम, 1910 और विद्युत अधिनियम, 2003 के प्रावधानों की तुलना करते हुए कहा कि संसद ने 2003 के कानून में पुराने कानून से अलग शब्दावली अपनाई है।
अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता संबंधित परिसर की कब्जाधारी होने के नाते विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 43 के तहत बिजली कनेक्शन पाने का दावा कर सकती है।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके आदेश में की गई टिप्पणियां केवल याचिकाकर्ता के बिजली कनेक्शन पाने के अधिकार तक सीमित हैं, जब तक वह संबंधित संपत्ति पर कब्जे में रहती है। इससे संपत्ति के स्वामित्व या पक्षकारों के बीच अन्य नागरिक विवादों का अंतिम निर्णय नहीं होता।
सात दिनों के भीतर कनेक्शन देने का निर्देश
हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए बिजली विभाग को निर्देश दिया कि आदेश की प्रति प्राप्त होने के सात दिनों के भीतर याचिकाकर्ता के वर्तमान आवास पर बिजली कनेक्शन जारी किया जाए।
यह निर्देश विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 43 के तहत दिया गया, बशर्ते याचिकाकर्ता अन्य लागू नियमों और आवश्यक शर्तों का पालन करे।
इस फैसले का महत्व: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिजली जैसी बुनियादी सुविधा तक पहुंच जीवन के अधिकार से जुड़ी है। संपत्ति को लेकर निजी विवाद होने मात्र से बिजली कनेक्शन के आवेदन को स्वतः खारिज नहीं किया जा सकता, यदि आवेदक कानून के तहत कनेक्शन पाने की पात्रता रखता है।

