प्रैक्टिसिंग वकील न होने की स्वीकारोक्ति के बाद रेप FIR रद्द, एमपी हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

  • प्रैक्टिसिंग वकील न होने की स्वीकारोक्ति के बाद रेप FIR रद्द, एमपी हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महिला द्वारा दर्ज कराई गई दुष्कर्म की एफआईआर को रद्द करते हुए कहा कि जब शिकायतकर्ता ने अदालत के समक्ष स्वयं स्वीकार कर लिया कि वह प्रैक्टिसिंग वकील नहीं है, तब आरोपी से उसकी मुलाकात का आधार ही संदेहास्पद हो गया। अदालत ने माना कि इस महत्वपूर्ण विरोधाभास ने अभियोजन के पूरे मामले की बुनियाद को कमजोर कर दिया है।

    जस्टिस हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने कहा कि महिला ने अपनी लिखित शिकायत और धारा 164 सीआरपीसी के बयान में खुद को कोटा में प्रैक्टिस करने वाली अधिवक्ता बताया था और दावा किया था कि वह आरोपी के बाल अभिरक्षा (चाइल्ड कस्टडी) मामले में पेशेवर सहायता देने के लिए जबलपुर आई थी। लेकिन हाईकोर्ट में उसने स्वीकार कर लिया कि वह प्रैक्टिसिंग एडवोकेट नहीं है। अदालत ने कहा कि यह कोई मामूली विरोधाभास नहीं, बल्कि दोनों के बीच संबंध की शुरुआत से जुड़ा मूल तथ्य है।

    मामले में आरोपी, जो एक सरकारी कर्मचारी है, ने एफआईआर रद्द करने की मांग करते हुए कहा कि महिला से उसका परिचय पारिवारिक विवाद के दौरान हुआ था और बाद में दोनों के बीच व्यक्तिगत संबंध बन गए। आरोपी का आरोप था कि विवाह से इनकार करने पर महिला ने उसके खिलाफ झूठा मामला दर्ज कराया।

    अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि मेडिकल जांच में जबरन यौन संबंध के कोई बाहरी या आंतरिक चोट के निशान नहीं मिले। मेडिकल विशेषज्ञ ने भी यौन संबंध के संबंध में कोई स्पष्ट राय नहीं दी। इसके अलावा, महिला के उस आरोप के समर्थन में भी कोई इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य नहीं मिला कि आरोपी ने उसके अश्लील वीडियो बनाकर ब्लैकमेल किया था।

    हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि कथित घटना नवंबर 2022 की थी, जबकि एफआईआर लगभग 15 महीने बाद फरवरी 2024 में दर्ज कराई गई। अदालत ने कहा कि यौन अपराधों में एफआईआर में देरी अपने आप में घातक नहीं होती, लेकिन जब देरी के साथ मामले की बुनियाद से जुड़े गंभीर विरोधाभास, मेडिकल, वैज्ञानिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का अभाव भी हो, तो ऐसे मामले में अभियोजन जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए याचिका स्वीकार कर ली।

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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