संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों को लाभ से वंचित करना तर्कहीन: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Praveen Mishra
21 April 2026 4:39 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि राज्य सरकार द्वारा लंबे समय से कार्यरत संविदा, आउटसोर्स और अंशकालिक कर्मचारियों को नियमितीकरण नीति के लाभ से बाहर रखना तर्कहीन है। अदालत ने राज्य को निर्देश दिया कि ऐसे कर्मचारियों का उचित वर्गीकरण कर उन्हें वेतन और सेवा संबंधी सभी लाभ प्रदान किए जाएं।
जस्टिस विशाल धगत की पीठ ने कहा कि यदि राज्य सरकार किसी कर्मचारी की सेवाएं लगातार ले रही है, तो उसे कम वेतन देकर उसके जीवनयापन के अधिकार और आर्थिक न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।
मामले का विवरण
याचिकाकर्ताओं ने रिट याचिका दायर कर यह मांग की थी कि उन्हें स्थायी दर्जा प्रदान किया जाए। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उन्हें वर्ष 2009 में संविदा आधार पर नियुक्त किया गया था और तब से लगातार उनकी सेवाएं ली जा रही हैं, लेकिन उन्हें स्थायी कर्मचारियों के समान लाभ नहीं दिए गए।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि राज्य सरकार द्वारा उन्हें वर्गीकृत न करना और कम वेतन देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 2016 में एक नीति बनाई गई थी, जिसके तहत दैनिक वेतनभोगियों को 'कुशल', 'अर्ध-कुशल' और 'अकुशल' श्रेणियों में वर्गीकृत कर लाभ दिए जाते हैं। हालांकि, यह लाभ संविदा, आउटसोर्स या अस्थायी कर्मचारियों पर लागू नहीं होता।
कोर्ट की टिप्पणियां
अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता लगभग 16 वर्षों से लगातार कार्यरत हैं और उनकी सेवाएं समय-समय पर बढ़ाई जाती रही हैं। इसके बावजूद उन्हें न तो वर्गीकृत किया गया और न ही स्थायी दर्जे के लाभ दिए गए।
कोर्ट ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी 10 वर्षों से अधिक समय तक लगातार कार्य कर रहा है, तो उसे 07 अक्टूबर 2016 के परिपत्र का लाभ मिलना चाहिए, चाहे वह संविदा या आउटसोर्स आधार पर ही क्यों न हो।
संवैधानिक पहलू
अदालत ने यह भी कहा कि राज्य की यह नीति उन कर्मचारियों को सम्मानजनक जीवन और उचित वेतन सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है, जिन्हें नियमित नहीं किया जा सकता। यह नीति संविधान के अनुच्छेद 38, 39 और 43 में निहित सामाजिक और आर्थिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप है।
अदालत का आदेश
अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं का 07.10.2016 के परिपत्र के अनुसार वर्गीकरण किया जाए और उन्हें संबंधित वेतनमान सहित सभी लाभ प्रदान किए जाएं।

