धोखाधड़ी और जालसाजी के मामले की जांच के लिए हर आरोपी को व्यक्तिगत आर्थिक लाभ मिलना जरूरी नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

  • धोखाधड़ी और जालसाजी के मामले की जांच के लिए हर आरोपी को व्यक्तिगत आर्थिक लाभ मिलना जरूरी नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि धोखाधड़ी (Cheating), जालसाजी (Forgery) और आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy) जैसे अपराधों की जांच के लिए यह जरूरी नहीं है कि हर आरोपी को व्यक्तिगत रूप से कोई आर्थिक लाभ मिला हो। कोर्ट ने कहा कि आरोपी की भूमिका, उसे लीज की वास्तविक स्थिति की जानकारी थी या नहीं और लेन-देन किन परिस्थितियों में हुआ, इन सभी पहलुओं का पता जांच के दौरान लगाया जाना चाहिए।

    जस्टिस हिमांशु जोशी की पीठ ने सरकारी जमीन से संबंधित कथित जालसाजी के मामले में एक आरोपी की ओर से दायर FIR रद्द करने की याचिका खारिज कर दी। हालांकि, कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को 60 दिनों के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया।

    क्या है मामला?

    यह मामला आर्थिक अपराध शाखा (EOW) में दर्ज FIR से जुड़ा है। इसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात), 420 (धोखाधड़ी), 467 (महत्वपूर्ण दस्तावेज की जालसाजी) और 120B (आपराधिक साजिश) सहित अन्य धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे।

    अभियोजन के अनुसार, सह-आरोपी पीसी सिंह के खिलाफ दर्ज एक अन्य मामले की जांच के दौरान ब्लॉक-4, सिविल स्टेशन स्थित जमीन से संबंधित एक लीज सामने आई। FIR के मुताबिक, यह जमीन यूनाइटेड चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया ट्रस्ट एसोसिएशन (UCNITA) के नाम दर्ज थी और याचिकाकर्ता इस संस्था का मैनेजिंग डायरेक्टर था।

    आरोप है कि याचिकाकर्ता ने सह-आरोपी पीसी सिंह के पक्ष में लीज डीड निष्पादित की थी।

    जांच के दौरान संबंधित राजस्व रिकॉर्ड के संबंध में अनुविभागीय अधिकारी (SDO) से रिपोर्ट प्राप्त की गई। रिपोर्ट के अनुसार, जमीन की पुरानी लीज 31 मार्च 1999 को समाप्त हो चुकी थी। हालांकि, लेन-देन के पंजीकरण के समय नजूल खसरा रिकॉर्ड में लीज की समाप्ति की तारीख 31 मार्च 2029 दर्ज थी।

    अभियोजन का आरोप है कि नजूल रिकॉर्ड में दर्ज यह प्रविष्टि प्रथम दृष्टया जाली थी, जिसके कारण राज्य को गलत तरीके से आर्थिक नुकसान पहुंचा।

    याचिकाकर्ता ने क्या दलील दी?

    याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि FIR में उनके मुवक्किल के खिलाफ कोई विशिष्ट आपराधिक कृत्य नहीं बताया गया है। उनका कहना था कि याचिकाकर्ता ने UCNITA के मैनेजिंग डायरेक्टर के रूप में केवल लीज डीड पर हस्ताक्षर किए थे।

    यह भी दलील दी गई कि संबंधित खसरा प्रविष्टि न तो याचिकाकर्ता ने तैयार की थी और न ही उसे प्रस्तुत किया था। याचिकाकर्ता को इस लेन-देन से कोई व्यक्तिगत आर्थिक लाभ भी नहीं मिला।

    बचाव पक्ष ने कहा कि याचिकाकर्ता संस्था का केवल एक कर्मचारी था और उसने प्रबंधन समिति के प्रस्तावों के आधार पर काम किया था। इसलिए, उसके खिलाफ IPC की संबंधित धाराओं के तहत अपराध नहीं बनता और FIR रद्द की जानी चाहिए।

    हाईकोर्ट ने क्या कहा?

    राज्य की ओर से दलील दी गई कि FIR में राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर से जुड़े गंभीर आरोप हैं। याचिकाकर्ता की भूमिका, जानकारी और मंशा का पता जांच के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर लगाया जाना चाहिए।

    हाईकोर्ट ने पाया कि FIR में याचिकाकर्ता के खिलाफ विशिष्ट आरोप है कि उसने UCNITA के मैनेजिंग डायरेक्टर के रूप में सह-आरोपी पीसी सिंह के पक्ष में लीज डीड निष्पादित की थी।

    कोर्ट ने कहा कि केवल यह दलील देना कि याचिकाकर्ता ने प्रबंधन समिति के प्रस्तावों के अनुसार काम किया या उसे व्यक्तिगत आर्थिक लाभ नहीं मिला, इस स्तर पर उसे संभावित आपराधिक जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त नहीं करता।

    पीठ ने कहा कि यह जांचना जरूरी है कि प्रबंधन समिति के प्रस्तावों में संबंधित लेन-देन की अनुमति दी गई थी या नहीं, याचिकाकर्ता ने सद्भावना से काम किया था या नहीं और क्या उसे रिकॉर्ड में किसी अनियमितता या हेरफेर की जानकारी थी।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन सवालों का जवाब संबंधित दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों की जांच के बाद ही दिया जा सकता है।

    पीठ ने कहा:

    “यह भी जरूरी नहीं है कि धोखाधड़ी, जालसाजी या आपराधिक साजिश के अपराध की जांच के लिए प्रत्येक आरोपी को व्यक्तिगत रूप से आर्थिक लाभ मिला हो। याचिकाकर्ता की सटीक भूमिका, लीज की स्थिति के संबंध में उसकी जानकारी और जिस परिस्थिति में यह लेन-देन हुआ, इन सभी पहलुओं का पता जांच के दौरान लगाया जाना है और जरूरत पड़ने पर मुकदमे के दौरान साबित किया जाना है।”

    FIR रद्द करने से इनकार, 60 दिनों में जांच पूरी करने का निर्देश

    हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में ऐसा कोई असाधारण आधार नहीं है, जिसके चलते अपनी अंतर्निहित अधिकारिता का इस्तेमाल कर FIR रद्द की जाए।

    इसलिए, कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और अधिकारियों को 60 दिनों के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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