हाईकोर्ट जज के तौर पर मिली ग्रेच्युटी, लोकायुक्त के तौर पर सेवा के लिए अलग ग्रेच्युटी पाने में रुकावट नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Shahadat
18 Jun 2026 8:13 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त अपनी सेवाओं के लिए ग्रेच्युटी पाने के हकदार हैं और यह हाईकोर्ट जज के तौर पर मिलने वाले फायदों से अलग है। [2026 LiveLaw (MP) 218]
तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस द्वारकाधीश बंसल की डिवीजन बेंच ने कहा,
"...याचिकाकर्ता क्रमशः लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त के तौर पर दी गई सेवा के लिए 'डेथ-कम-रिटायरमेंट ग्रेच्युटी' (मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति ग्रेच्युटी) का लाभ पाने के हकदार हैं, भले ही उन्हें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जज का पद संभालने के कारण पहले ही कोई रकम मिल चुकी हो।"
दो रिट याचिकाएं दायर की गईं। पहली, जस्टिस नरेश कुमार गुप्ता की ओर से, जो 2017 में हाईकोर्ट से रिटायर हुए और बाद में लोकायुक्त नियुक्त हुए। 2024 में वह इस पद से भी रिटायर हो गए। दूसरी याचिका जस्टिस उमेश चंद्र माहेश्वरी ने दायर की, जो 2016 में हाईकोर्ट से रिटायर हुए और उप-लोकायुक्त नियुक्त हुए और आखिरकार 2022 में रिटायर हुए।
रिटायरमेंट के बाद याचिकाकर्ताओं ने अपने पेंशन मामले मंज़ूरी के लिए सामान्य प्रशासन विभाग के प्रधान सचिव को भेजे। गवर्नर की मंज़ूरी के बाद, इन्हें पेंशन और ग्रेच्युटी का भुगतान करने के निर्देश के साथ प्रधान महालेखाकार (PAG) को भेजा गया।
प्रधान महालेखाकार (PAG) ने 13 जून, 2026 के अपने पत्र में इन मामलों को अस्वीकार किया। उन्होंने कहा कि लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1981 या मध्य प्रदेश लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त (सेवा की शर्तें) नियम, 1982 में ग्रेच्युटी के भुगतान का कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं को जज का पद छोड़ने के समय ग्रेच्युटी मिल चुकी थी और ग्रेच्युटी की रकम की अधिकतम सीमा ₹20 लाख थी।
याचिकाकर्ताओं ने इस पत्र को चुनौती दी और कहा कि लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त के तौर पर उनकी नियुक्तियों को हाईकोर्ट जज के तौर पर उनकी सेवा का ही विस्तार नहीं माना जा सकता। याचिकाकर्ताओं ने आगे तर्क दिया कि जब गवर्नर ने ग्रेच्युटी के भुगतान के निर्देश के साथ पेंशन मामलों को मंज़ूरी दी थी तो PAG भुगतान से इनकार नहीं कर सकते थे।
दूसरी ओर, PAG ने तर्क दिया कि गवर्नर के निर्देशों के बावजूद ग्रेच्युटी का भुगतान इसलिए नहीं किया गया, क्योंकि संबंधित नियमों में इसके लिए कोई खास प्रावधान नहीं था। यह तर्क दिया गया कि पहले 1982 के नियमों के नियम 8(A) के तहत ग्रेच्युटी के भुगतान की अनुमति थी, लेकिन 4 मार्च, 2005 के एक गैज़ेट नोटिफिकेशन के ज़रिए इस प्रावधान को हटा दिया गया।
PAG ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट जजेज़ एक्ट, 1954 के तहत हाईकोर्ट के जज को मिलने वाले ग्रेच्युटी लाभ की अधिकतम सीमा ₹20 लाख थी, जिसका भुगतान याचिकाकर्ताओं को पहले ही किया जा चुका था। इसलिए कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि 1954 के एक्ट में "पेंशन" शब्द में ग्रेच्युटी भी शामिल है। यह प्रावधान लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त पर भी लागू होता है।
कार्यवाही के दौरान, याचिकाकर्ताओं को ₹5-5 लाख का भुगतान किया गया, क्योंकि ग्रेच्युटी के भुगतान की अधिकतम सीमा बढ़ाकर ₹25 लाख कर दी गई।
विचार के लिए मुख्य मुद्दा यह था - "क्या मध्य प्रदेश लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त (सेवा की शर्तें) नियम, 1982 में किसी प्रावधान के अभाव में मध्य प्रदेश राज्य के लोकायुक्त या उप-लोकायुक्त को कोई डेथ-कम-रिटायरमेंट ग्रेच्युटी देय है?"
अदालत ने 1982 के नियमों के विधायी इतिहास की जांच करने के बाद 2004 में हुए संशोधन के बाद आए बदलाव पर गौर किया। अदालत ने पाया कि 2004 के संशोधन से पहले, गवर्नर को भत्ते और पेंशन तय करने का अधिकार था, और पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट जजेज़ (वेतन और सेवा की शर्तें) एक्ट, 1958 या हाईकोर्ट जजेज़ (वेतन और सेवा की शर्तें) एक्ट, 1954 और इन एक्ट्स के तहत बनाए गए नियमों द्वारा नियंत्रित होती थी।
बेंच ने स्पष्ट किया कि 2004 से पहले, भुगतान वही होना था जो तय किया गया हो। लेकिन 2004 के संशोधन के बाद भुगतान की जाने वाली राशि वही तय की जा सकती है, जो 'सुप्रीम कोर्ट जज (वेतन और सेवा की शर्तें) एक्ट, 1958' और 'हाई कोर्ट जज (वेतन और सेवा की शर्तें) एक्ट, 1954' और उनके तहत बने नियमों में बताई गई।
बेंच ने कहा,
"लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त को मिलने वाले भत्ते और पेंशन, और सेवा की अन्य शर्तें वैसी ही होंगी जैसी 'सुप्रीम कोर्ट जज (वेतन और सेवा की शर्तें) एक्ट, 1958' या 'हाई कोर्ट जज (वेतन और सेवा की शर्तें) एक्ट, 1954' के तहत तय की गई हैं, जैसा भी मामला हो।"
इसलिए बेंच ने माना कि याचिकाकर्ता वेतन पाने के हकदार होंगे, भले ही कोई खास प्रावधान न हो या 1982 के नियमों के नियम 8A को हटा दिया गया हो, जैसा कि 'हाईकोर्ट जज एक्ट, 1954' की धारा 17A(3) में बताया गया।
बेंच ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ताओं को 8 हफ़्ते के अंदर 7% ब्याज के साथ ग्रेच्युटी का भुगतान किया जाए।
Case Title: Justice Naresh Kumar Gupta v State of Madhya Pradesh, Justice Umesh Chandra Maheshwari v State of Madhya Pradesh, W.P. Nos. 18260/2024 & 38596/2024

