'आर्टिकल 21 का पहलू': मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी के मामले में आरोपी रूसी नागरिक को दिव्यांग बेटे के इलाज के लिए विदेश जाने की इजाज़त दी
Shahadat
9 July 2026 10:38 AM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भारत में धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और आपराधिक साजिश के आरोपों का सामना कर रहे रूसी नागरिक को अपने दिव्यांग बेटे के इलाज के लिए विदेश जाने की इजाज़त दे दी है। [2026 LiveLaw (MP) 257]
ट्रायल कोर्ट ने उसकी अर्ज़ी सिर्फ़ इस आधार पर खारिज की थी कि उसका बेटा बचपन से ही बीमार है।
उक्त आदेश रद्द करते हुए जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की बेंच ने कहा;
"सिर्फ़ इस वजह से अर्ज़ी खारिज करना कि याचिकाकर्ता का बेटा बचपन से ही बीमार है, सही नहीं ठहराया जा सकता"।
बेंच ने देखा कि इस मामले में संविधान के आर्टिकल 21 के तहत 'जीवन के अधिकार' के दो पहलू शामिल हैं। पहला, याचिकाकर्ता का विदेश यात्रा करने का अधिकार और दूसरा, अपने बीमार बेटे की देखभाल करने का अधिकार।
कोर्ट ने कहा:
"याचिकाकर्ता ने दिखाया कि वह अपने बेटे के इलाज के लिए विदेश जाना चाहता है, इसलिए इस मामले में दो पहलू शामिल हैं: पहला, विदेश यात्रा का अधिकार और दूसरा, याचिकाकर्ता के बीमार बेटे की देखभाल करना। इन दोनों पहलुओं को हमारे संविधान के आर्टिकल 21 में गारंटीकृत 'आज़ादी के साथ जीने के अधिकार' का ही हिस्सा माना जा सकता है।"
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि ट्रायल कोर्ट ने पहले भी याचिकाकर्ता को "उसी बीमारी" के लिए विदेश यात्रा की इजाज़त दी थी।
याचिकाकर्ता रूसी नागरिक है। उसने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देते हुए याचिका दायर की, जिसमें विदेश यात्रा की इजाज़त मांगने वाली उसकी अर्ज़ी खारिज कर दी गई। याचिकाकर्ता पर BNS के तहत धोखाधड़ी (धारा 318), आपराधिक विश्वासघात (धारा 316) और आपराधिक साजिश (धारा 61) का आरोप है।
याचिकाकर्ता ने ज़मानत के लिए अर्ज़ी दी थी, जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। इससे नाराज़ होकर वह सुप्रीम कोर्ट गया, जिसने कुछ शर्तों के साथ अंतरिम ज़मानत दी - जैसे पासपोर्ट सरेंडर करना और जांच में सहयोग करना - और ट्रायल कोर्ट को ऐसी ज़मानत शर्तें लगाने की इजाज़त दी जो उसे सही लगें। आदेश में उसे यह छूट भी दी गई कि अगर उसे विदेश यात्रा करनी हो तो वह ट्रायल कोर्ट से ज़मानत की शर्तों में बदलाव की मांग कर सकता है।
इसके बाद 3 फरवरी 2026 को याचिकाकर्ता ने अपना पासपोर्ट सरेंडर कर दिया। हालांकि, यह दावा किया गया कि उनका बेटा मानसिक रूप से अक्षम (mental retardation) और मिनिमल सेरेब्रल डिसफंक्शन से पीड़ित है और स्थायी रूप से विकलांग है। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उनका बेटा और पत्नी रूस में रह रहे हैं और उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है।
चूंकि उनके बच्चे को इलाज की ज़रूरत थी, इसलिए उन्होंने यात्रा की अनुमति के लिए एक अर्ज़ी दायर की, जिसे मंज़ूरी मिल गई और लौटने के बाद उन्होंने 11 मई, 2026 को अपना पासपोर्ट जमा कर दिया। इसके बाद, बच्चे की हालत बिगड़ने के कारण उन्होंने एक और अर्ज़ी दायर की, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया।
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता की गुहार पर विचार नहीं किया और इस आधार पर अर्ज़ी खारिज कर दी कि बच्चा बचपन से ही इस बीमारी से पीड़ित है। इसके अलावा, अनुच्छेद 21 के तहत यात्रा के अधिकार का हवाला देते हुए, वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट 'याचिकाकर्ता द्वारा बताए गए कारणों को खारिज किए बिना' अर्ज़ी को अस्वीकार नहीं कर सकता।
राज्य के वकील ने तर्क दिया कि यदि याचिकाकर्ता अनुमति का दुरुपयोग करता है और वापस नहीं आता है, तो उसे मुकदमे के लिए वापस लाना बहुत मुश्किल होगा।
अदालत ने गौर किया कि सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत देते हुए स्पष्ट रूप से कहा था कि ट्रायल कोर्ट अपने विवेक से याचिकाकर्ता को विदेश यात्रा की अनुमति दे सकता है। इलाज के दस्तावेज़ों की जांच करते हुए अदालत ने उनके बेटे के 25 जुलाई, 2026 से 10 अगस्त, 2026 तक चलने वाले इलाज की अवधि और रूपरेखा पर ध्यान दिया। इसके अलावा, ट्रायल कोर्ट ने दस्तावेज़ों को झूठा या बीमारी के दावे को गलत नहीं माना।
बेंच ने गौर किया कि याचिकाकर्ता ने अनुमति का लाभ उठाया और उसका दुरुपयोग नहीं किया। अदालत ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ता के पिता भारत में रह रहे हैं और उन्होंने भारत में एक व्यवसाय भी शुरू किया। इसलिए अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता के भागने की कोई संभावना नहीं थी।
इस प्रकार, बेंच ने ट्रायल कोर्ट का 22 मई का आदेश रद्द किया और याचिकाकर्ता को विदेश यात्रा की अनुमति दी।
Case Title: Gaurav Ahlawat v State of Madhya Pradesh, MCRC-24830-2026


