संयुक्त परिवार का होना संयुक्त परिवार फंड का सबूत नहीं: एमपी हाईकोर्ट

  • संयुक्त परिवार का होना संयुक्त परिवार फंड का सबूत नहीं: एमपी हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ संयुक्त परिवार का होना इस बात का सबूत नहीं है कि कोई संयुक्त परिवार फंड भी है जिससे प्रॉपर्टी खरीदी गई हो। [2026 LiveLaw (MP) 392]

    जस्टिस आशीष श्रोती की बेंच ने कहा,

    "संयुक्त परिवार का होना संयुक्त परिवार फंड के होने का सबूत नहीं है। प्रतिवादियों को इसे किसी भी अन्य तथ्य की तरह साबित करना होगा। यह दिखाने के अलावा कि पिता के पास 6-7 बीघा ज़मीन थी, प्रतिवादी परिवार फंड के होने का सबूत नहीं दे पाए, जिससे विवादित ज़मीन खरीदी गई।"

    यह विवाद 5 बीघा और 18 बिस्वा कृषि भूमि से जुड़ा है। यह ज़मीन 20 अगस्त, 1998 के रजिस्टर्ड सेल डीड (बिक्री विलेख) के ज़रिए खरीदी गई, जो वादी के नाम पर की गई।

    वादी और प्रतिवादी सगे भाई है और शिव नारायण शर्मा के बेटे हैं। वादी ने रजिस्टर्ड सेल डीड से मिले अपने मालिकाना हक के आधार पर ज़मीन का कब्ज़ा वापस पाने के लिए मुकदमा दायर किया।

    हालांकि, प्रतिवादियों ने उसके अकेले मालिकाना हक पर सवाल उठाया। प्रतिवादियों का तर्क था कि भले ही सेल डीड वादी के नाम पर की गई, लेकिन प्रॉपर्टी असल में संयुक्त परिवार के फंड से खरीदी गई, इसलिए यह संयुक्त परिवार की प्रॉपर्टी है।

    ट्रायल कोर्ट ने वादी के पक्ष में फैसला सुनाया। फर्स्ट अपीलेट कोर्ट ने 2 नवंबर, 2018 को 24 दिसंबर, 2011 का फैसला बरकरार रखा। इसके बाद प्रतिवादियों ने दूसरी अपील में हाईकोर्ट का रुख किया।

    हाईकोर्ट के सामने प्रतिवादियों के वकील ने कहा कि उनके पिता के पास लगभग 6-7 बीघा कृषि भूमि थी और विवादित प्रॉपर्टी उसी ज़मीन से हुई कमाई से खरीदी गई। यह तर्क दिया गया कि चूंकि वादी सबसे बड़ा बेटा है, इसलिए सेल डीड उसके नाम पर की गई, लेकिन इसे संयुक्त परिवार के फंड से खरीदा गया।

    वादी के वकील ने तर्क दिया कि प्रतिवादी परिवार फंड बनाने वाले मुख्य स्रोत (न्यूक्लियस) को साबित करने में नाकाम रहे। कोर्ट ने माना कि सेल डीड वादी के नाम पर खरीदी गई, इसलिए यह माना जाता है कि प्रॉपर्टी उसी की है। बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि केस जीतने के लिए जॉइंट फ़ैमिली और जॉइंट फ़ैमिली फ़ंड को साबित करने की ज़िम्मेदारी प्रतिवादियों की थी।

    बेंच ने इन बातों पर ज़ोर दिया:

    "सिर्फ़ इसलिए कि पिता के पास कुछ ज़मीन थी, यह साबित करने के लिए काफ़ी नहीं है कि उस ज़मीन से इतनी आमदनी होती थी, जिससे वादी के नाम पर विवादित प्रॉपर्टी खरीदी जा सके। दूसरी ओर, वादी ने यह कहा और साबित किया कि वह नौकरी करता है और नौकरी से हुई कमाई और कुछ रकम उधार लेकर उसने ज़मीन खरीदी। दोनों अदालतों ने फ़ैमिली फ़ंड न होने के बारे में एक जैसा फ़ैसला दिया।"

    इस तरह बेंच ने माना कि विवादित आदेश में किसी दखल की ज़रूरत नहीं है और अपील खारिज की।

    Case Title : Vinod v Kailashnarayan

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