पिता द्वारा जिम्मेदारी लेने को तैयार होने के बावजूद बच्चे को ऑब्जर्वेशन होम में रखना, JJ Act के सुधारवादी उद्देश्य के खिलाफ: एमपी हाईकोर्ट
Shahadat
28 Oct 2026 10:22 AM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के दायरे में आए किसी बच्चे को लंबे समय तक ऑब्जर्वेशन होम में रखना - जबकि उसका प्राकृतिक अभिभावक (माता-पिता) पूरी जिम्मेदारी लेने को तैयार हो - 'जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015' (JJ Act) के पुनर्वास और सुधार के उद्देश्यों के विपरीत है। [2026 LiveLaw (MP) 434]
बच्चे की कस्टडी उसके पिता को सौंपते हुए जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने टिप्पणी की:
"12वीं कक्षा के छात्र को लंबे समय तक ऑब्जर्वेशन होम में रखना, खासकर तब जब उसका प्राकृतिक अभिभावक पूरी जिम्मेदारी लेने को तैयार हो, इस अधिनियम के पुनर्वास और सुधार के उद्देश्यों के खिलाफ है।"
बच्चे की ओर से उसके पिता ने एक क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर की थी। इसमें जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट द्वारा जमानत अर्जी खारिज किए जाने को चुनौती दी गई, जिसे बाद में अपीलीय अदालत ने भी बरकरार रखा।
यह मामला हत्या (धारा 103), हत्या का प्रयास (धारा 109), जानबूझकर चोट पहुंचाना (धारा 115), सार्वजनिक स्थानों पर अश्लीलता (धारा 296), आपराधिक धमकी (धारा 351) और SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3 के तहत दर्ज किया गया था। बच्चा 1 मई, 2026 से ऑब्जर्वेशन होम में रखा गया।
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि यह आदेश गैर-कानूनी है, क्योंकि अपीलीय अदालत और JJ बोर्ड ने JJ Act की धारा 12 के अनिवार्य प्रावधानों को लागू किए बिना ही जमानत अर्जी खारिज की। यह भी बताया गया कि बच्चे का पहले कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है और उसके पिता उसे अपनी कस्टडी और देखरेख में लेने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
राज्य की ओर से पेश सरकारी वकील ने तर्क दिया कि बच्चे की 'सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट' (सामाजिक जांच रिपोर्ट) से पता चलता है कि वह जिस इलाके में रहता है, वहां कम पढ़े-लिखे मजदूर वर्ग के लोग रहते हैं। ऐसे में, बच्चे के गलत संगत में पड़ने और अन्य जोखिमों का सामना करने की संभावना है।
अदालत ने JJ Act की धारा 12 की समीक्षा की और दोहराया कि इसमें यह अनिवार्य है कि बच्चे को या तो किसी प्रोबेशन ऑफिसर की देखरेख में, या किसी उपयुक्त व्यक्ति की कस्टडी में जमानत पर रिहा किया जाए। इसके केवल तीन अपवाद हैं: a) अगर इस बात के ठोस आधार हों कि रिहा होने पर बच्चा किसी ज्ञात अपराधी के संपर्क में आ सकता है, b) उसे नैतिक, शारीरिक या मानसिक खतरे का सामना करना पड़ सकता है, या c) उसकी रिहाई से न्याय के उद्देश्यों को नुकसान पहुँच सकता है।
सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट (सामाजिक जांच रिपोर्ट) को देखते हुए अदालत ने गौर किया कि बच्चा 12वीं कक्षा में पढ़ रहा है और उसके पिता डेयरी का व्यवसाय करते हैं। अदालत ने पाया कि रिपोर्ट में आस-पड़ोस के माहौल के बारे में तो कुछ नहीं कहा गया, लेकिन इसमें बच्चे को सुरक्षित कस्टडी में रखने की सिफारिश जरूर की गई।
बेंच ने यह भी ध्यान दिया कि बच्चा साढ़े 3 महीने से अधिक समय से ऑब्जर्वेशन होम (निरीक्षण गृह) में रह रहा है। इसके अलावा, ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह लगे कि रिहा होने पर वह किसी ज्ञात अपराधी के संपर्क में आ जाएगा।
यह टिप्पणी करते हुए कि यह कानून "सामान्य टिप्पणियों" के आधार पर जमानत देने से इनकार करने की अनुमति नहीं देता, बेंच ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (किशोर न्याय बोर्ड) और अपीलीय अदालत JJ Act की धारा 12 के मापदंडों को सही ढंग से लागू करने में विफल रहे। इसलिए अदालत ने पिछला आदेश रद्द किया और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे बच्चे की कस्टडी उसके पिता को सौंप दें।
Case Title : Child in Conflict with Law v State of MP

