BNS की धारा 69 के तहत शादी के झूठे वादे के मामले में 'आपसी सहमति' वाला रिश्ता अग्रिम ज़मानत का पक्का आधार नहीं: एमपी हाईकोर्ट
Shahadat
1 Oct 2026 7:28 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी का यह दावा कि दोनों पक्षों के बीच रिश्ता आपसी सहमति से है, इसे अकेले ही BNS की धारा 69 (धोखे से या शादी का झूठा वादा करके यौन संबंध बनाना) के तहत अग्रिम ज़मानत पाने का पक्का आधार नहीं माना जा सकता। [2026 LiveLaw (MP) 399]
जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की बेंच ने कहा:
"हालांकि, इस चरण पर केवल यह दावा करना कि रिश्ता आपसी सहमति से है, इसे अकेले ही आवेदक के अग्रिम ज़मानत पाने के अधिकार का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता।"
अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला और आवेदक एक-दूसरे को छह साल से जानते थे और कथित तौर पर लिव-इन रिलेशनशिप में थे। आरोप है कि रिश्ते के दौरान, आवेदक ने महिला से शादी करने का वादा किया।
उसी वादे के आधार पर उसने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। हालांकि, बाद में आवेदक ने कथित तौर पर महिला से शादी करने से इनकार किया। बाद में उसने आवेदक के खिलाफ FIR दर्ज कराई।
आवेदक के वकील ने तर्क दिया कि आवेदक को मामले में झूठा फंसाया गया और आरोपों को साबित करने के लिए कोई स्वतंत्र या कानूनी रूप से मान्य सबूत नहीं है। यह कहा गया कि आवेदक के खिलाफ अपराध के तत्व नहीं बनते हैं।
वकील ने कहा कि आवेदक और महिला छह साल तक आपसी सहमति से और लगातार रिश्ते में थे और केवल यह तथ्य कि रिश्ता आखिरकार शादी में नहीं बदला, इसे अकेले ही BNS की धारा 69 के तहत अपराध मानने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
वकील ने तर्क दिया कि मौजूदा FIR जवाबी कार्रवाई और बाद में सोचा-समझा कदम था। आवेदक ने कथित तौर पर महिला को लगभग ₹1 लाख दिए और पैसे वापस मांगने पर महिला ने उस पर अनुचित दबाव डालने के लिए यह FIR दर्ज कराई।
राज्य के वकील ने तर्क दिया कि आवेदक के खिलाफ आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। यह तर्क दिया गया कि शिकायतकर्ता महिला ने खास तौर पर आरोप लगाया कि आरोपी ने उससे शादी करने का वादा किया और उसी वादे के आधार पर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
यह कहा गया कि इन आरोपों की ठीक से जांच होनी चाहिए और शिकायतकर्ता व अन्य गवाहों के बयानों समेत अन्य सबूत इकट्ठा करके उनकी जांच की जानी चाहिए।
कोर्ट ने केस डायरी से देखा कि शिकायतकर्ता गर्भवती हो गई और आरोपी ने कथित तौर पर उसकी गर्भावस्था खत्म करने की कोशिश की और उसे गर्भपात के लिए कथित तौर पर गोलियां दी थीं।
बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया,
"भले ही शिकायतकर्ता ने शारीरिक संबंध बनाने के लिए सहमति दी हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उस सहमति से आरोपी को किसी भी तरह से व्यवहार करने का कोई असीमित या बिना शर्त अधिकार मिल गया।"
FIR में लगाए गए आरोपों, आरोपों की प्रकृति और आरोपी द्वारा दी गई दलीलों पर विचार करने के बाद बेंच ने अग्रिम ज़मानत देने से इनकार कर दिया और अर्ज़ी खारिज की।
Case Title : AJ v State of Madhya Pradesh

