क्या पुलिस वाले के जान जोखिम में डालकर किए गए बचाव अभियान को सिर्फ़ रोज़मर्रा की पुलिस ड्यूटी माना जा सकता है? एमपी हाईकोर्ट ने बताया
Shahadat
15 Jun 2026 7:38 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने साफ़ किया कि किसी पुलिस अफ़सर द्वारा जान जोखिम में डालकर किए गए बचाव कार्य को, आउट-ऑफ़-टर्न प्रमोशन (समय से पहले प्रमोशन) से इनकार करने के लिए सिर्फ़ रोज़मर्रा की ड्यूटी का हिस्सा नहीं माना जा सकता। [2026 LiveLaw (MP) 210]
जस्टिस विवेक कुमार सिंह की बेंच ने बताया कि उक्त पुलिस अफ़सर ने अपनी ड्यूटी से आगे बढ़कर काम किया। उन्होंने अंधेरे में सिर्फ़ एक रस्सी के सहारे लटककर, 200 फ़ीट गहरी खाई में फँसे एक ओवरलोडेड ट्रक में मौजूद दो लोगों की जान बचाई। कोर्ट ने इसे "असाधारण बहादुरी" का काम बताया।
बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया:
"अगर याचिकाकर्ता ने इतनी सूझबूझ और हिम्मत न दिखाई होती तो ट्रक निश्चित रूप से सड़क के निचले हिस्से में गिर जाता, जिससे बड़ी तबाही होती और लोगों की जान जा सकती थी। ऐसा निस्वार्थ और बहुत ज़्यादा जोखिम वाला काम 'रेगुलेशन 70-A' के तहत 'खास बहादुरी' और 'असाधारण योग्यता' की शर्तों को पूरी तरह से पूरा करता है।"
बेंच ने कहा कि मध्य प्रदेश पुलिस रेगुलेशन का रेगुलेशन 70A, जो आउट-ऑफ़-टर्न प्रमोशन से जुड़ा है, एक खास अपवाद है। इसका मकसद ऐसे कामों को "पहचानना, इनाम देना और हमेशा के लिए बढ़ावा देना है, जिनमें असाधारण बहादुरी, बहुत ज़्यादा सूझबूझ और बेहतरीन पेशेवर काम" शामिल हो।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता 2004 में इंदौर ज़िले के सिमरोल में सब-इंस्पेक्टर और स्टेशन हाउस ऑफ़िसर के तौर पर काम कर रहे थे। 22 अप्रैल 2004 को, इंदौर से लगभग 25 किलोमीटर दूर ईंटों से भरा एक ट्रक बेकाबू होकर गहरी खाई में गिर गया। गाड़ी एक पेड़ में फँसने के कारण 200 फ़ीट गहरी खाई के ऊपर लटक गई। ट्रक ड्राइवर और हेल्पर अंदर फँसे हुए थे और मदद के लिए चिल्ला रहे थे।
सूचना मिलने पर याचिकाकर्ता तुरंत मौके पर पहुंचे और बचाव अभियान को व्यवस्थित करने की कोशिश की। हालांकि, पेशेवर क्रेन ऑपरेटरों ने बहुत ज़्यादा जोखिम होने के कारण खाई में उतरने से मना कर दिया। इसलिए याचिकाकर्ता ने खुद को रस्सी से बाँधा और अपनी जान जोखिम में डालकर खाई में उतरे, और दोनों लोगों को बचाया।
इसके बाद स्थानीय सरपंच ने याचिकाकर्ता को सम्मानित किया, कलेक्टर ने उनकी तारीफ़ की और पुलिस अधीक्षक (SP) ने उन्हें आउट-ऑफ़-टर्न प्रमोशन देने की सिफ़ारिश की। सीनियर अधिकारियों की सिफारिशों के बावजूद, स्क्रीनिंग कमेटी ने 31 मार्च, 2025 को प्रस्ताव को खारिज कर दिया और इसके बजाय ₹5,000 का इनाम मंज़ूर किया।
याचिकाकर्ता ने 2011 में हाईकोर्ट में इस फ़ैसले को चुनौती दी। कोर्ट ने इस आधार पर अस्वीकृति रद्द की कि यह आदेश अस्पष्ट और बिना ठोस कारण बताए दिया गया, और दावे पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया। स्क्रीनिंग कमेटी ने 28 दिसंबर, 2012 को फिर से दावे को खारिज कर दिया, जिसके बाद यह याचिका दायर की गई।
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि राज्य ने खुद नकद इनाम देकर उनके साहस को माना था। फिर भी उन्हें आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन देने से इनकार कर दिया और साथ ही इसे सामान्य ड्यूटी बताया।
राज्य ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन कोई अधिकार नहीं है और यह रेगुलेशन 70A के तहत सक्षम अधिकारी की अपनी समझ और संतुष्टि पर निर्भर करता है।
तथ्यों की जांच करने के बाद बेंच ने पाया कि स्क्रीनिंग कमेटी रेगुलेशन 70A के तहत निर्धारित कानूनी मानकों को लागू करने में पूरी तरह विफल रही।
बेंच ने कहा,
"रेगुलेशन निष्पक्ष मूल्यांकन की मांग करता है। इसके लिए स्क्रीनिंग कमेटी को बारीकी से यह जांचना होता है कि क्या अधिकारी का आचरण केवल उनकी रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारियों का सामान्य निर्वहन था या क्या यह असाधारण बहादुरी का काम था या केवल एक सामान्य पुलिस ड्यूटी थी"।
कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसी परिस्थितियों में सामान्य पुलिस कार्रवाई में आमतौर पर इलाके को सुरक्षित करना, ट्रैफ़िक को नियंत्रित करना और विशेष बचाव कर्मियों को बुलाना शामिल होता है। बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एक पेशेवर क्रेन ऑपरेटर का खाई में उतरने से इनकार करना ही इसमें शामिल असाधारण खतरे को दर्शाता है।
बेंच ने यह भी कहा कि फ़ैसला लेने की प्रक्रिया में आपस में ही विरोधाभास है। बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एक तरफ़ तो अधिकारियों ने याचिकाकर्ता के काम को इतना बहादुरी भरा माना कि उसे नकद इनाम दिया जाए, लेकिन दूसरी तरफ़ प्रमोशन न देने के लिए उसी काम को सिर्फ़ 'रूटीन ड्यूटी' (सामान्य कामकाज) बता दिया।
ऐसी दलील को गलत मानते हुए कोर्ट ने कहा:
"प्रतिवादी एक ही समय में दो अलग-अलग बातें नहीं कह सकते। एक तरफ़ कमेटी ने याचिकाकर्ता के काम को इतना बहादुरी भरा माना कि उसे 5,000 रुपये का विशेष नकद इनाम दिया जाए। दूसरी तरफ़ रेगुलेशन 70-A पर विचार करते हुए, उन्होंने उसी काम को सिर्फ़ 'रूटीन ड्यूटी' बता दिया। राज्य को यह इजाज़त नहीं दी जा सकती कि वह नकद इनाम के लिए तो बहादुरी को माने, लेकिन आउट-ऑफ़-टर्न प्रमोशन न देने के लिए उसी बहादुरी को नकार दे। इसी वजह से, कमेटी के निष्कर्ष गलत हैं।"
इस तरह बेंच ने याचिका का निपटारा करते हुए राज्य को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को इंस्पेक्टर के पद पर आउट-ऑफ़-टर्न प्रमोशन का लाभ पिछली तारीख से दिया जाए।
Case Title: Indramani Patel v State of Madhya Pradesh, WP-9716-2017

