BCI के नियम वकील-आरोपी को सह-आरोपी का प्रतिनिधित्व करने से नहीं रोकते: एमपी हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी का मामला रद्द किया
Shahadat
23 May 2026 9:42 AM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक वकील के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द की। इस वकील ने एक आपराधिक मामले में अपने बेटे की ओर से पेश होकर उसका प्रतिनिधित्व किया, जबकि उस मामले में वे दोनों ही आरोपी थे। कोर्ट ने यह फैसला देते हुए कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम किसी सह-आरोपी वकील को किसी अन्य आरोपी का प्रतिनिधित्व करने से नहीं रोकते हैं।
चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने यह टिप्पणी की:
"ऊपर जिस बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम 13 का ज़िक्र किया गया, वह 'मुवक्किल के प्रति कर्तव्य' (Duty to Client) नामक अनुभाग के तहत आता है, न कि अनुभाग-I 'न्यायालय के प्रति कर्तव्य' (Duty to Court) के तहत। उक्त नियम किसी भी सह-आरोपी को किसी मामले में वकील के तौर पर पेश होने से नहीं रोकता है। हम यह मानने को तैयार नहीं हैं कि सह-आरोपी की ओर से वकील के तौर पर पेश होकर याचिकाकर्ता ने न्यायालय के साथ कोई धोखाधड़ी की है।"
यह मामला शैलेश कुमार की शिकायत पर रूपेश (याचिकाकर्ता का बेटा) के खिलाफ IPC की धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 34 (सामान्य आशय) के तहत दर्ज FIR से जुड़ा है। याचिकाकर्ता पेशे से वकील है। उसको बाद में इस मामले में सह-आरोपी के तौर पर शामिल कर लिया गया था।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने FIR रद्द करवाने के लिए MCRC याचिका दायर की। सिंगल बेंच ने इस याचिका को इस आधार पर खारिज किया कि प्रथम दृष्टया एक संज्ञेय अपराध बनता है और मामले की जांच अभी भी अधूरी है।
इस याचिका के लंबित रहने के दौरान, याचिकाकर्ता के बेटे रूपेश ने भी FIR रद्द करवाने के लिए एक याचिका दायर की, जिस पर 27 अप्रैल, 2022 को सुनवाई हुई। इस सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अपने बेटे के वकील के तौर पर पेश हुआ और उसने मामले पर बहस की। बाद में सिंगल बेंच ने इस मामले में कार्यवाही शुरू करते हुए याचिकाकर्ता को "न्यायालय के साथ धोखाधड़ी करने" के आरोप में कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। सिंगल जज ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता ने इस बात का खुलासा नहीं किया कि उसकी अपनी याचिका पहले ही खारिज हो चुकी है।
जब समन जारी हो गए तो याचिकाकर्ता ने मामले से बरी (Discharge) किए जाने की मांग की, जिसे सितंबर 2025 में मजिस्ट्रेट ने खारिज किया। मजिस्ट्रेट के इस आदेश को खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी गई। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि जब जनवरी 2019 में उनके बेटे की ओर से याचिका दायर की गई, तब तक उनकी अपनी याचिका खारिज नहीं हुई। वह याचिका बाद में मार्च 2020 में खारिज हुई। इसलिए किसी भी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाया नहीं गया।
वकील ने आगे कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों का नियम 13 किसी वकील को केवल ऐसे मामले में पेश होने से रोकता है, जहां उसके लिए तथ्यों के महत्वपूर्ण सवालों पर गवाह बनने की संभावना हो। याचिकाकर्ता के अनुसार, ये नियम किसी ऐसे वकील को, जो खुद सह-आरोपी है, किसी अन्य आरोपी का प्रतिनिधित्व करने से नहीं रोकते।
इन दलीलों को स्वीकार करते हुए खंडपीठ ने टिप्पणी की कि तथ्यों को छिपाने के आरोप 'गलत' थे। साथ ही यह बात नोट की कि बेटे की याचिका, याचिकाकर्ता की अपनी याचिका (जिसे रद्द करने की मांग की गई) के खारिज होने से पहले ही दायर की गई।
अदालत ने आगे यह भी नोट किया कि BCI नियमों का नियम 13 'मुवक्किलों के प्रति कर्तव्य' की श्रेणी में आता है। यह केवल किसी वकील को ऐसा मामला (Brief) स्वीकार करने से रोकता है, जहां उसके पास यह मानने का कारण हो कि वह गवाह बन सकता है। यह नियम किसी सह-आरोपी को किसी अन्य आरोपी के वकील के तौर पर पेश होने से नहीं रोकता।
अदालत ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि राज्य बार काउंसिल ने फरवरी 2023 में ही उस वकील के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही समाप्त की थी, क्योंकि काउंसिल इस निष्कर्ष पर पहुंची कि एडवोकेट एक्ट की धारा 35 के तहत 'पेशेवर कदाचार' का कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता है।
अतः, खंडपीठ ने यह निर्देश दिया:
"उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए हमारी सुविचारित राय है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ 'धोखाधड़ी' का कोई अपराध नहीं बनता। याचिकाकर्ता प्रैक्टिस करने वाला वकील है। साथ ही वह एक अन्य सह-आरोपी (उसका अपना बेटा) की ओर से एक याचिका (जिसे रद्द करने की मांग की गई) में वकील के तौर पर पेश हुआ था। वह उपरोक्त अपराध से बरी किए जाने का हकदार है। परिणामस्वरूप, RCT संख्या 9808/2022 में माननीय मजिस्ट्रेट द्वारा 23.09.2025 को पारित वह आदेश रद्द किया जाता है, जिसके तहत CrPC की धारा 227 के तहत दायर आवेदन को खारिज किया गया था। वर्तमान याचिकाकर्ता के खिलाफ RCT संख्या 9808/2022 में लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द की जाती है।"
इस प्रकार, अदालत ने पुनरीक्षण याचिका (revision petition) स्वीकार की गई।
Case Title: Suresh Prasad Khare v State of Madhya Pradesh, CRR No. 5561 of 2025

