लिखित में गिरफ्तारी कारण न बताना आर्टिकल 22(1) का उल्लंघन, लेकिन इससे अपने-आप ज़मानत का अधिकार नहीं मिल जाता: एमपी हाईकोर्ट

  • लिखित में गिरफ्तारी कारण न बताना आर्टिकल 22(1) का उल्लंघन, लेकिन इससे अपने-आप ज़मानत का अधिकार नहीं मिल जाता: एमपी हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी को गिरफ़्तारी के कारण लिखित में न बताना संविधान के आर्टिकल 22(1) का उल्लंघन है, लेकिन ऐसा न करने से आरोपी को ज़मानत का अधिकार अपने-आप नहीं मिल जाता। [2026 LiveLaw (MP) 386]

    जस्टिस अमित लाहोटी की बेंच ने कहा:

    "हालांकि, रिकॉर्ड से पता चलता है कि आवेदक को गिरफ़्तारी के कारण लिखित में नहीं बताए गए, जो भारत के संविधान के आर्टिकल 22(1) और माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा मिहिर राजेश शाह (ऊपर ज़िक्र किया गया) मामले में तय किए गए कानून का उल्लंघन है। फिर भी इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में, केवल इस कमी के आधार पर आवेदक को ज़मानत पर रिहा नहीं किया जा सकता।"

    अभियोजन पक्ष के अनुसार, आवेदक ने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर मृतक का उसके घर के सामने सामना किया और उसे अपशब्द कहे। जब मृतक ने विरोध किया तो आवेदक ने मृतक को पकड़ लिया और सह-आरोपी ने चाकू निकालकर मृतक को मारने के इरादे से उसकी दाहिनी बगल में घोंप दिया।

    आवेदक के सीनियर वकील ने तर्क दिया कि चाकू मारने का आरोप सह-आरोपी पर है। साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि गिरफ़्तारी के समय आवेदक को गिरफ़्तारी के कारण लिखित में नहीं बताए गए। इसलिए गिरफ़्तारी ही गैर-कानूनी है।

    राज्य के सरकारी वकील ने तर्क दिया कि अपराध करने में आवेदक की सक्रिय भूमिका थी और उसके खिलाफ़ लगभग 25 मामले दर्ज हैं।

    बेंच ने पाया कि आवेदक और उसके सह-आरोपी पर लगाए गए आरोपों की पुष्टि मेडिकल सबूतों से होती है। इसलिए कोर्ट ने माना कि आवेदक मेरिट के आधार पर ज़मानत का हकदार नहीं है।

    गिरफ़्तारी के कारण लिखित में न बताए जाने के तर्क पर बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि आवेदक को अपनी गिरफ़्तारी के कारणों की जानकारी थी और शुरू से ही उसे कानूनी प्रतिनिधित्व मिला हुआ था।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे यह पता चले कि गिरफ़्तारी के कारण न बताए जाने से आवेदक को कोई नुकसान हुआ हो।

    इसके अलावा, बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया,

    "यह कोर्ट उन अहम बातों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता, जैसे कि BNS की धारा 103 के तहत आरोप की गंभीरता, अपराध करने में आरोपी की सक्रिय भूमिका और उसका आपराधिक इतिहास।"

    हालांकि कोर्ट ने मिहिर राजेश शाह मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से सहमति जताई, जिसमें कहा गया कि गिरफ़्तार व्यक्ति को उसकी समझ में आने वाली भाषा में गिरफ़्तारी के कारण लिखित रूप में न बताने पर गिरफ़्तारी और उसके बाद की रिमांड गैर-कानूनी हो जाएगी।

    बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया,

    "हालांकि व्यक्तिगत आज़ादी एक अहम संवैधानिक मूल्य है, लेकिन यह पूरी तरह से असीमित नहीं है; जब आज़ादी समाज के सामूहिक हित के लिए खतरा पैदा करती है, तो उसे सीमित किया जा सकता है, खासकर तब जब मामले के तथ्यों को आरोपी पर लगे आरोपों और उसके आपराधिक इतिहास के संदर्भ में देखा जाए।"

    बेंच ने यह भी गौर किया कि आरोपी BNSS की धारा 47 का पालन न होने के बारे में कोई आपत्ति नहीं उठा पाया और न ही ज़मानत अर्ज़ी में कोई ऐसा आधार बता पाया, जिससे यह साबित हो कि इस नियम का पालन न होने से उसे कोई नुकसान हुआ है। इसलिए, कोर्ट ने ज़मानत की अर्ज़ी खारिज कर दी।

    नोट: जसकरण जीत देओल बनाम पंजाब राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि गिरफ़्तार व्यक्ति को उसकी समझ में आने वाली भाषा में गिरफ़्तारी के कारण लिखित रूप में न बताने पर गिरफ़्तारी और उसके बाद की रिमांड गैर-कानूनी हो जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के कारण रिहा किए गए व्यक्ति को दोबारा गिरफ़्तार करने के लिए पुलिस को संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष अर्ज़ी दाखिल करनी होगी और मजिस्ट्रेट की मंज़ूरी लेनी होगी।

    Case Title: Raju Sonker v State of Madhya Pradesh, MCRC-32331-2026

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