मृत कर्मचारी के कथित असंतोषजनक रिकॉर्ड का इस्तेमाल बेटे के अनुकंपा नियुक्ति का दावा खारिज करने के लिए नहीं किया जा सकता: एमपी हाईकोर्ट

Shahadat

26 April 2026 4:26 PM IST

  • मृत कर्मचारी के कथित असंतोषजनक रिकॉर्ड का इस्तेमाल बेटे के अनुकंपा नियुक्ति का दावा खारिज करने के लिए नहीं किया जा सकता: एमपी हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया कि मृत सरकारी कर्मचारी का कथित असंतोषजनक सर्विस रिकॉर्ड, अनुकंपा नियुक्ति के दावे को खारिज करने का कोई वैध आधार नहीं हो सकता।

    जस्टिस जय कुमार पिल्लई की बेंच ने सक्षम अधिकारियों को आगे यह भी चेतावनी दी कि वे ऐसे आदेश जारी न करें, जिनमें उचित तर्क का अभाव हो या जो मनगढ़ंत आधारों पर आधारित हों।

    बेंच ने टिप्पणी की,

    "ऊपर बताए गए अस्वीकृति आदेश की बारीकी से जांच करने पर यह साफ़ पता चलता है कि इसमें लागू नीति का कोई ऐसा खास नियम शामिल नहीं है या उसका हवाला नहीं दिया गया, जो यह अनिवार्य करता हो कि 'असंतोषजनक सेवा रिकॉर्ड' अस्वीकृति का एक वैध आधार हो सकता है। प्रतिवादी यह दिखाने में पूरी तरह से नाकाम रहे हैं कि यह बाहरी मानदंड निर्णय लेने की प्रक्रिया में कैसे शामिल किया गया, जबकि मौजूदा अनुकंपा नियुक्ति योजना में ऐसा कोई भी बहिष्करण प्रावधान नहीं है।"

    याचिकाकर्ता ने 30 जनवरी, 2018 के आदेश को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की, जिसमें बैंक के सक्षम अधिकारी ने उसके पिता के निधन के बाद अनुकंपा नियुक्ति के उसके वैध अनुरोध को मनमाने ढंग से अस्वीकार किया।

    याचिकाकर्ता के पिता यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया के नियमित कर्मचारी थे और 'दफ्तरी' के पद पर कार्यरत थे। 22 साल और 4 महीने की लगातार और बिना किसी रुकावट के सेवा के बाद दिल का दौरा पड़ने से अचानक उनका निधन हो गया।

    याचिकाकर्ता अपने पिता का इकलौता बेटा और उन पर आश्रित था। उसने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। हालांकि, 30 जनवरी, 2018 के बिना किसी स्पष्टीकरण वाले आदेश के ज़रिए उसका आवेदन अस्वीकार किया गया। याचिकाकर्ता के वकील ने यह तर्क दिया कि नियुक्ति इस झूठे आधार पर अस्वीकार की गई कि उसके पिता का सेवा रिकॉर्ड असंतोषजनक है।

    याचिकाकर्ता के वकील ने यह तर्क दिया कि उसके पिता का 22 साल के पूरे कार्यकाल के दौरान रिकॉर्ड बेदाग था और उनके खिलाफ कभी भी कोई बड़ी दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई।

    अदालत ने यह पाया कि नोटिस दिए जाने के बावजूद प्रतिवादी न तो खुद पेश हुए और न ही उन्होंने कोई जवाब दाखिल किया। इसलिए अदालत को एकतरफ़ा (ex parte) कार्यवाही करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

    बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों पर भरोसा करते हुए इस बात को दोहराया कि अनुकंपा नियुक्ति एक अपवाद है, जिसका उद्देश्य परिवार को अचानक आए आर्थिक संकट से उबरने में मदद करना है। इसलिए ऐसी नियुक्ति परिवार की समग्र आर्थिक स्थिति, देनदारियों और आजीविका के किसी भी वैकल्पिक साधन के पूरी तरह से अभाव को ध्यान में रखते हुए तत्काल प्रदान की जानी चाहिए।

    अस्वीकृति आदेश की जांच करने के बाद अदालत ने यह पाया कि उसमें ऐसा कोई भी विशिष्ट नियम नहीं था जो यह अनिवार्य करता हो कि असंतोषजनक सेवा रिकॉर्ड अनुकंपा नियुक्ति को अस्वीकार करने का आधार हो सकता है।

    बेंच ने इस बात पर 'गहरा आश्चर्य' भी व्यक्त किया कि अधिकारियों ने पिता के असंतोषजनक सेवा रिकॉर्ड का इस्तेमाल बेटे की अनुकंपा नियुक्ति के दावे को अस्वीकार करने के लिए 'हथियार' के तौर पर कैसे किया। बेंच ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि अधिकारियों ने अपनी ही अनुकंपा नियुक्ति नीति के 'मूल सार और कड़े शब्दों' की पूरी तरह से अनदेखी की।

    बेंच टिप्पणी की,

    "इस तरह के यांत्रिक और उदासीन अस्वीकरण, जिनमें ऐसे कारण बताए जाते हैं, जो या तो मौजूद ही नहीं हैं, या जिन्हें कानूनी समर्थन प्राप्त नहीं है, इस न्यायालय द्वारा कड़ी आलोचना और तीव्र निंदा के पात्र हैं।"

    अतः, खंडपीठ ने यह निर्णय दिया कि विवादित आदेश अवैध था और उसे रद्द किया जाना उचित था। तदनुसार, याचिका स्वीकार की गई और प्रतिवादियों को निर्देश दिया गया कि वे 60 दिनों के भीतर अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर पुनर्विचार करें। खंडपीठ ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को हुई अत्यधिक कठिनाई के लिए उसे ₹50,000 की राशि बतौर हर्जाना (Cost) अदा करें।

    मामले को समाप्त करने से पूर्व कोर्ट ने अधिकारियों द्वारा अपनाए गए 'स्पष्ट रूप से उदासीन रवैये' पर कड़ी आपत्ति व्यक्त की। इस प्रकार, अधिकारियों को सख्त चेतावनी दी कि वे अपने आदेशों में उचित तर्क और स्पष्टीकरण (Reasoned and Speaking Orders) अवश्य दें।

    खंडपीठ ने निर्देश दिया:

    "अतः, अधिकारियों को सख्त चेतावनी दी जाती है कि भविष्य में जारी किए गए ऐसे किसी भी अस्वीकरण आदेश को, जिसमें उचित तर्कों का अभाव पाया जाएगा अथवा जो लागू नीति के दायरे से बाहर मनगढ़ंत आधारों पर आधारित होगा, न्यायालय द्वारा अत्यंत गंभीर न्यायिक असंतोष के साथ देखा जाएगा।"

    Case Title: Nikhil Kol v Union Bank of India, WP 794 of 2019

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