भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 380, 381 और 382: न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले अपराधों पर अपील और न्यायिक प्रक्रिया
Himanshu Mishra
8 March 2025 1:49 PM

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 - BNSS) में न्यायालय (Court) की कार्यवाही को प्रभावित करने वाले अपराधों (Offences Affecting the Administration of Justice) से निपटने के लिए विस्तृत प्रावधान दिए गए हैं।
अध्याय 28 (Chapter XXVIII) में न्यायिक कार्यवाही (Judicial Proceedings) को प्रभावित करने वाले अपराधों पर कार्रवाई की प्रक्रिया तय की गई है। इसमें धारा 379 (Section 379), 380 (Section 380), 381 (Section 381) और 382 (Section 382) प्रमुख हैं।
पिछले लेख में हमने धारा 379 की चर्चा की थी, जिसमें यह बताया गया था कि यदि कोई व्यक्ति न्यायालय की प्रक्रिया को बाधित करता है, झूठे साक्ष्य (False Evidence) प्रस्तुत करता है, या न्यायालय की गरिमा (Dignity of the Court) को ठेस पहुँचाने का प्रयास करता है, तो उस पर न्यायालय द्वारा शिकायत (Complaint) दर्ज की जा सकती है। यह शिकायत प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट (Magistrate of First Class) के पास भेजी जाती है, और अपराध की गंभीरता के अनुसार कार्रवाई की जाती है।
अब धारा 380 यह निर्धारित करती है कि यदि किसी निचली अदालत (Lower Court) ने धारा 379 के तहत शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया है या किसी व्यक्ति के विरुद्ध शिकायत दर्ज कर दी गई है, तो उसे उच्चतर न्यायालय (Higher Court) में अपील (Appeal) करने का अधिकार होगा।
इसी तरह, धारा 381 न्यायालय को यह शक्ति देती है कि वह किसी शिकायत या अपील पर आने वाले खर्च (Costs) को तय कर सके, ताकि कोई भी व्यक्ति अनावश्यक रूप से न्यायालय का समय नष्ट न करे।
अंत में, धारा 382 यह बताती है कि जब कोई शिकायत धारा 379 या धारा 380 के तहत मजिस्ट्रेट (Magistrate) के पास पहुँचती है, तो उसे पुलिस रिपोर्ट (Police Report) के आधार पर दर्ज मामले (Case) की तरह चलाया जाएगा। यदि किसी मामले में उच्च न्यायालय में अपील लंबित है, तो मजिस्ट्रेट चाहे तो सुनवाई को तब तक स्थगित (Adjourn) कर सकता है जब तक अपील का फैसला नहीं आ जाता।
धारा 380: धारा 379 के तहत शिकायत पर अपील का अधिकार (Right to Appeal in Cases of Complaints under Section 379)
धारा 380 यह अधिकार देती है कि यदि किसी निचली अदालत ने किसी व्यक्ति के आवेदन (Application) पर धारा 379 के तहत शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया है, तो वह व्यक्ति उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है। इसी तरह, यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध शिकायत दर्ज कर दी गई है और वह इसे अनुचित (Unjustified) मानता है, तो उसे भी अपील का अधिकार होगा।
इस धारा को बेहतर तरीके से समझने के लिए दो उदाहरण देखते हैं:
1. जब निचली अदालत ने शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया
मान लीजिए कि राम एक गवाह (Witness) है और उसे लगता है कि अदालत में प्रस्तुत किए गए दस्तावेज़ (Documents) झूठे हैं। वह अदालत से अनुरोध करता है कि धारा 379 के तहत झूठे साक्ष्य देने वाले व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज की जाए। लेकिन अदालत इस अनुरोध को अस्वीकार (Reject) कर देती है। ऐसे में, राम को धारा 380 के तहत उच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार होगा।
2. जब किसी व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज हो जाती है
मान लीजिए कि मोहन पर न्यायालय की प्रक्रिया को बाधित (Obstructing Justice) करने का आरोप लगाया गया है, और अदालत ने धारा 379 के तहत उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कर दी है। यदि मोहन को लगता है कि आरोप गलत हैं, तो वह धारा 380 के तहत अपील कर सकता है।
जब उच्च न्यायालय को ऐसी अपील प्राप्त होती है, तो वह पहले संबंधित पक्षों (Parties) को नोटिस (Notice) भेजता है और फिर निम्नलिखित में से कोई भी निर्णय ले सकता है:
1. शिकायत को वापस ले सकता है (Withdraw the Complaint) - इसका अर्थ यह होगा कि निचली अदालत द्वारा दर्ज शिकायत अब मान्य नहीं होगी।
2. शिकायत दर्ज करने का निर्देश दे सकता है (Direct Filing of Complaint) - यदि उच्च न्यायालय को लगता है कि निचली अदालत को शिकायत दर्ज करनी चाहिए थी, तो वह आदेश देगा कि धारा 379 के तहत शिकायत दर्ज की जाए।
धारा 380 के तहत निर्णय अंतिम होगा (Finality of Decisions Under Section 380)
धारा 380 में यह भी प्रावधान है कि यदि उच्च न्यायालय कोई निर्णय लेता है, तो वह अंतिम (Final) होगा और उस पर पुनर्विचार (Revision) नहीं किया जा सकेगा। इसी तरह, धारा 379 के तहत किए गए किसी भी आदेश को केवल धारा 380 के तहत ही चुनौती दी जा सकती है, और इसके बाद उस आदेश को फिर से चुनौती नहीं दी जा सकेगी।
धारा 381: न्यायालय द्वारा खर्च (Costs) लगाने की शक्ति (Power of Courts to Award Costs in Complaints and Appeals)
धारा 381 के तहत न्यायालय को यह अधिकार है कि वह किसी व्यक्ति द्वारा दायर की गई शिकायत या अपील पर होने वाले खर्च (Costs) को उचित (Just) रूप से तय कर सके।
एक उदाहरण:
सुमन एक व्यापारी है और वह अपने व्यापार प्रतिद्वंदी पर झूठे दस्तावेज प्रस्तुत करने का आरोप लगाता है। वह अदालत में धारा 379 के तहत शिकायत दर्ज करवाता है, लेकिन अदालत को कोई ठोस सबूत (Evidence) नहीं मिलता और वह शिकायत खारिज कर देती है। यदि यह साबित होता है कि सुमन ने जानबूझकर अदालत का समय बर्बाद किया, तो धारा 381 के तहत अदालत उसे जुर्माना (Fine) भरने के लिए कह सकती है।
धारा 382: मजिस्ट्रेट द्वारा शिकायत पर सुनवाई की प्रक्रिया (Procedure for Magistrates Handling Complaints Under Section 379 and 380)
जब धारा 379 या 380 के तहत कोई मामला मजिस्ट्रेट (Magistrate) के पास जाता है, तो धारा 382(1) के अनुसार, वह इसे ऐसे मामले की तरह सुनेगा जैसे कि यह एक पुलिस रिपोर्ट (Police Report) के आधार पर दर्ज किया गया हो।
इसका मतलब यह है कि मामले में सभी कानूनी प्रक्रियाएँ लागू होंगी, जैसे:
• अभियुक्त (Accused) को समन (Summons) भेजा जाएगा।
• गवाहों (Witnesses) की गवाही ली जाएगी।
• सभी साक्ष्यों (Evidence) की जाँच होगी।
इसके अलावा, धारा 382(2) यह प्रावधान करती है कि यदि किसी मामले में उच्च न्यायालय में पहले से अपील लंबित (Pending Appeal) है, तो मजिस्ट्रेट चाहे तो मामले की सुनवाई तब तक स्थगित (Adjourn) कर सकता है जब तक उच्च न्यायालय अपना फैसला नहीं सुना देता।
उदाहरण:
श्रीकांत पर न्यायालय में झूठा शपथ पत्र (False Affidavit) जमा करने का आरोप है, और मजिस्ट्रेट इस पर कार्यवाही कर रहा है। लेकिन साथ ही, उच्च न्यायालय में इस मामले से जुड़ी एक अन्य अपील लंबित है। ऐसे में, मजिस्ट्रेट यह तय कर सकता है कि सुनवाई को उच्च न्यायालय के फैसले तक रोक दिया जाए।
धारा 380, 381 और 382 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले अपराधों से निपटने के लिए महत्वपूर्ण प्रावधान हैं। यह प्रावधान सुनिश्चित करते हैं कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ अनुचित शिकायत दर्ज की जाती है, तो उसे अपील का अधिकार मिले (धारा 380), न्यायालय अनावश्यक मुकदमों पर खर्च लगाए (धारा 381), और मजिस्ट्रेट सही प्रक्रिया अपनाए (धारा 382)।
इन प्रावधानों का उद्देश्य न्यायालय की गरिमा बनाए रखना और न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करने वाले अपराधों से प्रभावी ढंग से निपटना है।