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निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट 1881 भाग 25: लिखत के पक्षकारों का दायित्व से उन्मोचन कब होता है (धारा 82)

Shadab Salim
26 Sep 2021 4:15 AM GMT
निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट 1881 भाग 25: लिखत के पक्षकारों का दायित्व से उन्मोचन कब होता है (धारा 82)
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परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) के अंतर्गत धारा 82 पक्षकारों के दायित्व से उन्मोचन के संबंध में उल्लेख करती है जैसे कि पूर्व के आलेखों में पक्षकारों के दायित्व से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख किया गया था।

इस आलेख के अंतर्गत धारा 82 में उल्लेखित की गई उन परिस्थितियों का वर्णन किया जा रहा है जिनके अनुसार पक्षकारों के दायित्व का उन्मोचन हो जाता है।

परक्राम्य लिखतों के सम्बन्ध में उन्मुक्ति निम्नलिखित दो तरह से प्रयुक्त की जाती है-

1:- लिखत की स्वयं में उन्मुक्ति।

2:- लिखत के कुछ पक्षकारों की उन्मुक्ति।

जब तब परक्राम्य लिखत अस्तित्व में एवं विधिमान्य होता है इससे कतिपय कार्यवाही के अधिकार होते हैं, परन्तु जब इन अधिकारों की समाप्ति हो जाती है तो लिखत उन्मुक्त हो जाता है।

परक्राम्य लिखतें अर्थात वचन पत्र, विनिमय पत्र एवं चेक उन्मुक्त हो जाते हैं, जब लिखत का मुख्य पक्षकार लिखत के पाने वाला/धारक/सम्यक् अनुक्रम धारक को, जैसी भी स्थिति हो सम्यक् अनुक्रम में संदाय कर देता है।

किसी लिखत के अधीन मुख्य आबद्ध पक्षकार होते हैं :-

1. वचन पत्र का रचयिता

2. विनिमय पत्र का प्रतिग्रहीता (ऊपरवाल), एवं

3. चेक का लेखीवाल,

धारा 82 तीन प्रकार से दायित्व के उन्मोचन का प्रावधान करती है, अर्थात् रद्दकरण, निर्मुक्ति एवं संदाय उन्मोचन का सबसे सहज एवं सामान्य तरीका रचयिता एवं प्रतिग्रहीता के क्रमशः वचन पत्र एवं विनिमय पत्र में संदाय द्वारा है। चेक की दशा में लेखीवाल के दायित्व निर्वापित (extinguished) हो जाता है जहाँ ऊपरवाल (बैंकर) चेक को सम्यक् रूप से उपस्थापन पर उसका संदाय कर देता है।

यहाँ पर यह ध्यान में रखना चाहिए बैंक का पाने वाला/धारक के प्रति कोई आबद्धता नहीं होती है। एक बैंकर धारा 31 के प्रभाव से चेक के लेखीवाल के प्रति आबद्धता रखता है।

लिखत में पक्षकारों की आबद्धता के उन्मोचन को निम्नलिखित दो तरह से विचार किया जाता है :-

1)- स्वयं लिखत का उन्मोचन- एक लिखत स्वयं में निम्नलिखित दर से उन्मोचित हो जाता है :

(1) रद्दकरण द्वारा [धारा 82 (क)]

(2) निर्मुक्ति द्वारा [धारा 82 (ख) ]

(3) संदाय द्वारा [धारा 82 (ग)]

(4) विनिमय पत्र के प्रतिग्रहीता का धारक करने पर [धारा 90]

(5) जहाँ चेक को सम्यक् रूप से उपस्थापन न करने से जिसे लेखीवाल को क्षति हुई हो [ धारा 84]

2)- कुछ पक्षकारों का उन्मोचन-निम्नलिखित मामलों में लिखत के कुछ पक्षकारों का दायित्व का उन्मोचन हो जाता है-

(1) धारक द्वारा प्रतिग्रहीता या पृष्ठांकक का नाम उसे उन्मोचित करने के आशय से रद्दकरण से [धारा 82 (क) ]

(2) धारक के द्वारा रचयिता, प्रतिग्रहीता या पृष्ठांकक के निर्मुक्ति से [धारा 82 (ख)]

(3) ऊपरवाल को प्रतिग्रहण के लिए 48 घण्टे से अधिक समय अनुज्ञात करने से [धारा 83]

(4) विशेषित स्वीकृति से [धारा 86]

(5) विनिमय पत्र को प्रतिग्रहण के लिए उपस्थापन न करने पर [धारा 61]

(6) जहाँ चेक को सम्यक् रूप से संदाय के लिए उपस्थित न करने से [धारा 84]

(7) लिखत में तात्विक परिवर्तन से [धारा 87]

लिखत का स्वयं उन्मोचन-

जब लिखत स्वयं में उन्मोचित हो जाता है तो तधीन सभी पक्षकार जिनका दायित्व लिखत में होता है, उन्मोचित हो जाते हैं। जब किसी परक्राम्य लिखत में सभी पक्षकारों के विरुद्ध अधिकारों की समाप्ति हो जाती है, लिखत उन्मोचित हो जाता है और जब लिखत उन्मोचित हो जाता है तो कोई भी व्यक्ति यहाँ तक सम्यक् अनुक्रम धारक भी लिखत के अधीन रकम का दावा उसके किसी भी पक्षकार से नहीं कर सकेगा। लिखत के अधीन प्रमुख रूप से दायी पक्षकार को उन्मोचन स्वयं लिखत को उन्मोचित बना देता है।

एक लिखत निम्नलिखित दशा में उन्मोचित हो जाता है-

(1) रद्दकरण द्वारा रद्दकरण हो सकता है

(2) रचयिता/प्रतिग्रहीता के दायित्व का,

(i) लिखत का रद्दकरण-

लिखत का धारक या उसका अभिकर्ता लिखत को रद्द कर सकता है। "जहाँ एक धारक या उसके अभिकर्ता द्वारा लिखत को साशय रद्द कर दिया जाता है और उस पर रद्दकरण स्पष्ट है, लिखत उन्मोचित हो जाता है" एवं एतद्वारा सभी पक्षकार जो लिखत के अधीन दायी है अपनी आबद्धता से उन्मोचित हो जाएंगे।

ऐसा रद्दकरण लिखत के मुख पर प्रकट होना चाहिए अन्यथा सम्यक् अनुक्रम धारक के हाथ में लिखत विधिमान्य बना रहेगा। इस सम्बन्ध में सूचक वाद इनघाम बनाम प्राइमोस है।

इस मामले में अ ने एक विनिमयपत्र प्रतिग्रहीत किया और इसे वह ब को बट्टा कटाने के प्रयोजन से दिया जिस रकम को अ को देना था ब इसे बट्टा कराने में असफल रहा और बिल अ को वापस कर दिया जिसने बिल को रद्द करने के आशय से इसे आधा फाड़ दिया और इसके दो टुकड़ों को सड़क पर फेंक दिया ने उन्हें उठा लिया एवं तत्पश्चात् दो टुकड़ों को एक साथ ऐसा चिपका दिया जिससे यह मालूम पड़ता था कि सुरक्षित अभिरक्षा के प्रयोजन से बिल को मोड़ा गया एवं रद्द नहीं किया है ब ने इसे प्रचलन में लाया और वादी एक समयक अनुक्रम धारक ने इसे प्राप्त किया।

अ की दायी ठहराया गया, क्योंकि बिल को टुकड़ों में फाड़ना अपने आप में बिल के चेहरे से स्पष्ट में नहीं था जिससे एक युक्तियुक्त व्यक्ति को यह संकेत दे सके कि इसे रद्द कर दिया गया है। लिखत को फाड़ना ऐसा होना चाहिए जिससे कोई भी सामान्य बुद्धि का व्यक्ति सतकर्ता से यह जान सके कि इसे रद्द कर दिया गया है परन्तु स्कोले बनाम रैम्स के मामले में न्यायालय का यह मानना था कि जहाँ बैंकर द्वारा ऐसे चेक का संदाय करने में जो फाड़ा हुआ दिखाई देता है और उसे जोड़ा गया है, संदाय से ग्राहक के खाते को डेबिट नहीं कर सकता है।

(II) रचयिता / प्रतिग्रहीता के दायित्व का रद्दकरण-धारा 82 (क) के अधीन वचन पत्र या विनिमय पत्र के रचयिता या प्रतिग्रहीता के दायित्व को रद्द करने से सम्बन्धित है। ऐसी दशा में ऐसा रद्दकरण स्वयं लिखत का रद्द करने का प्रभाव रखता है, क्योंकि अन्य सभी पक्षकार प्रतिग्रहीता के प्रतिभू के रूप में अपनी आबद्धता से उन्मोचित हो जाते हैं।

धारा 37 में यह उपबन्धित है कि वचन पत्र या चेक के रचयिता एवं विनिमय पत्र के प्रतिग्रहण के पूर्व लेखीवाल एवं प्रतिग्रहण के बाद प्रतिग्रहीता लिखत के अधीन मूल ऋणी के रूप में दायी होते हैं और लिखत के अधीन अन्य पक्षकार रचयिता, लेखीवाल या प्रतिग्रहीता के प्रतिभू के रूप में होते हैं, जैसी भी स्थिति हो। इस प्रकार प्रतिग्रहीता के नाम को इस आशय से धारक द्वारा रद्द करना कि उसका दायित्व उन्मोचित हो जाय, लिखत को रद्द करने का प्रभाव होता है, क्योंकि प्रतिग्रहीता विनिमय पत्र में प्रतिग्रहण के पश्चात् मुख्य ऋणी होता है।

(ख) पृष्ठांकक के दायित्व को रद्द करना-जहाँ एक धारक पृष्ठांकक/पृष्ठाककों के नाम को रद्द करता है, तब उसके पश्चात्वर्ती सभी पक्षकार अपने दायित्व से उन्मोचित हो जाते हैं, परन्तु उसके पूर्विक पक्षकार आवद्ध बने रहते हैं। यह ऐसा है, क्योंकि रचयिता एवं प्रतिग्रहीता के पश्चात्वर्ती पक्षकार ऐसे पृष्ठांकक के बीच आपस में सह-प्रतिभू नहीं होते, परन्तु प्रत्येक पूर्विक पक्षकार मुख्य ऋणी और हर पश्चात्वर्ती एक प्रतिभू होता है। ऐसी दशा में कोई व्यक्ति ऐसे पृष्ठांकक के माध्यम से अपने अधिकार का दावा करने वाला अपने दायित्व से उन्मोचित हो जाता है। उदाहरण के लिए अ एक विनिमय पत्र का धारक है।

प्रथम पृष्ठांकन 'स'को, द्वितीय पृष्ठांकन 'द' को, तीसरा पृष्ठांकन 'य' को, चौथा पृष्ठांकन 'र'को पाँचव पृष्ठांकन 'अ'को (अब धारक है)

अ (धारक) 'द' एवं 'य' के नाम को बिना 'स' की सहमति से रद्द कर देता है। 'र' अपनी आबद्धता से उन्मोचित हो जाएगा। ऐसी दशा में लिखत उन्मोचित नहीं होगा, क्योंकि 'अ' लिखत में मुख्य ऋणी नहीं है।

(2) निर्मुक्ति द्वारा [ धारा 82 (ख) ] - एक धारक लिखत के अधीन रचयिता, प्रतिग्रहीता या पृष्ठांकक के नाम को रद्द करने के अन्यथा निर्मुक्ति प्रदान करता है, तो ऐसा निर्मुक्ति वही प्रभाव रखेगी जैसा कि पक्षकारों का नाम रद्द करने से होता है।

जहाँ धारक के द्वारा रचयिता या प्रतिग्रहीता के आवद्धता को निर्मुक्ति कर दी जाती है तो स्वयं लिखत उन्मोचित हो जाता है, क्योंकि वचन पत्र में रचयिता एवं विनिमय पत्र में प्रतिग्रहीता की स्थिति मुख्य ऋणी की होती है। परन्तु पृष्ठांकक के निर्मुक्ति से लिखत उन्मोचित नहीं होता, क्योंकि वह लिखत में मुख्य ऋणी नहीं होता है।

धारक किसी को भी दायित्व से निर्मुक्त करने के लिए पृथक् करार से या व्यवहार से जो किसी पक्षकार को दायित्व से निर्मुक्त करने का प्रभाव रखता है, उन्मोचित कर सकता है। यह भारतीय संविदा विधि की धारा 63 के प्रावधानों पर आधारित है।

जो इस सम्बन्ध में प्रावधान अन्तर्निहित करती है कि हर वचन गृहीता अपने को दिये गये किसी वचन के पालन से अभिमुक्ति या उसका परिहार पूर्णत: या भागतः दे या कर सकेगा, या ऐसे पालन के लिए समय बढ़ा सकेगा या उसके स्थान पर किसी तुष्टि को, जिन्हें वह ठीक समझे प्रतिग्रहीत कर सकेगा।

पक्षकारों को दायित्व से निर्मुक्त किया जा सकता है:-

(क) रचयिता एवं प्रतिग्रहीता-जहाँ धारक वचन पत्र के या विनिमय पत्र प्रतिग्रहीता को दायित्व से निर्मुक्त करता है, वहाँ लिखत स्वयं में उन्मोचित हो जाता है, क्योंकि लिखत में ये मुख्य ऋणी होते हैं।

(ख) पृष्ठांकक/पृष्ठांककों को-जहाँ धारक किसी पृष्ठांकक या पृष्ठांककों ने नाम को निर्मुक्त करता है वहाँ ऐसे धारक के अधीन हक व्युत्पन्न करने वाले सब पक्षकारों के प्रति हो जाता है। ऐसी दशा में स्वयं लिखत उन्मोचित नहीं होगा।

(3) संदाय द्वारा उन्मोचन का सबसे प्रचलित तरीका संदाय होता है। चूंकि एक परक्राम्य लिखत अन्तिम रूप से संदाय के लिए होता है, धारक को लिखत की रकम का संदाय लिखत के पक्षकारों को उन्मोचित करने का प्रभाव रखता है। वचन पत्र चेक या विनिमय पत्र को क्रमशः रचयिता लेखीवाल, प्रतिग्रहीता को संदाय लिखत को उन्मोचित करता है अर्थात् सभी पक्षकार भी जो लिखत के अधीन दायी होते हैं, उन्हें उन्मोचित बनाता है।

अधिनियम की धारा 82 (ग) उपबन्धित करती है कि वाहक को देय लिखत या तो मूलत: वाहक को देय बनाया गया है या निरंक पृष्ठांकन कर दिया गया है और इसमें देय रकम का उसके वाहक को सम्यक रूप में संदाय से लिखत को उन्मोचित करता है।

इसी प्रकार आदेशित देय लिखत का सम्यक् अनुक्रम में धारक को या सम्यक् अनुक्रम में धारक को किया गया संदाय लिखत को उन्मोचित करेगा। सम्यक् अनुक्रम में संदाय-विधिक शब्दों में एक विधिमान्य एवं प्रभावित संदाय सम्यक् अनुक्रम में संदाय होता है। अधिनियम की धारा 10 का विश्लेषण करने से यह स्पष्ट है कि एक सम्यक् अनुक्रम संदाय के लिए निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना होगा।

"सम्यक् अनुक्रम में संदाय" से लिखत पर कब्जा रखने वाले व्यक्ति को उस लिखत के प्रकट शब्दों के अनुसार सद्भावपूर्वक बिना उपेक्षा के लिए बिना ऐसी परिस्थितियों में किया गया संदाय अभिप्रेत है, जिससे यह विश्वास करने के लिये युक्तियुक्त आधार नहीं उत्पन्न होता कि वह उसमें वर्णित रकम का संदाय पाने का हकदार नहीं है।" सम्यक् अनुक्रम में संदाय की शर्ते- सम्यक अनुक्रम में संदाय विधिक शब्दों में विधिमान्य एवं प्रभावी संदाय होता है।

धारा 10 के उपबन्धों के विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि सम्यक् अनुक्रम संदाय के लिए निम्नलिखित शर्तों को पूरा किया जाना चाहिए:-

संदाय किया जाना चाहिए-

(i) प्रकट शब्दों के अनुसार,

(ii) सद्भावना पूर्वक,

(iii) बिना किसी उपेक्षा के,

(iv) कब्जा रखने वाले (धारक) को संदाय,

(v) ऐसे व्यक्ति को संदाय जो संदाय प्राप्त करने का हकदार हो।

(i) प्रकट शब्दों- एक प्रभावी संदाय के लिए प्रथम शर्त है कि इसे लिखत के प्रकट शब्दों के अनुसार किया जाना चाहिए। इसके अन्तर्गत अनेक तत्व सम्मिलित है।

लिखत की प्रकृति अर्थात् वाहक या आदेशित खुला या रेखांकित चेक, यदि रेखांकित है तो सामान्य या विशेष रेखांकन, एकाउन्ट पेयी रेखांकन इत्यादि सबसे महत्वपूर्ण कारक है कि संदाय परिपक्वता पर या उसके पश्चात् होनी चाहिए। इस प्रकार जहाँ रेखांकित चेक का संदाय बैंक के काउन्टर, आदेशित चेक का संदाय वाहक के समान या सारभूत परिवर्तन के साथ लिखत का संदाय, सम्यक् अनुक्रम में संदाय नहीं होगा।

परिपक्वता के पूर्व संदाय परिपक्वता के पूर्व संदाय एक सम्यक् अनुक्रम संदाय नहीं होता है जब तक कि लिखत को रद्द न कर दिया या संदाय के तथ्य को लिखत के मुख्य पृष्ठ पर स्पष्ट अभिलिखित न हो।

अतः एक विनिमय पत्र का लेखीवाल (प्रतिग्रहीता) इसके संदाय परिपक्वता के पूर्व करता है और लिखत को रद्द नहीं करता है और विनिमय पत्र का धारक इसे किसी व्यक्ति को प्रतिफल या बिना प्रतिफल के अन्तरण (पृष्ठांकित) कर देता है, पृष्ठांकन विधिमान्य होगा एवं पृष्ठांकिती प्रतिग्रहीत से पुन: संदाय पाने से का हकदार होगा यद्यपि कि उसके द्वारा पूर्व में लिखत का संदाय किया जा चुका है।

बिल का पुनः जारी किया जाना किसी लिखत का उसके परिपक्वता के पूर्व संदाय सम्यक् अनुक्रम में संदाय नहीं होता है जिससे लिखत ऐसे संदाय से उन्मोचित नहीं होता है। वचन पत्र के रचयिता या विनिमय पत्र का प्रतिग्रहीता अपने दायित्व से ऐसे संदाय से उन्मोचित नहीं होता है।

एक चेक लिखे जाने के हो तिथि से संदाय के लिए परिपक्व होता है अतः ऐसे स्थिति चेक की दशा में उत्पन्न नहीं होता है। एक वचन पत्र का रचयिता या विनिमय पत्र का प्रतिग्रहीता यदि वचनपत्र या विनिमय पत्र को परिपक्वता के पूर्व प्राप्त करता है तो उसे लिखत का क्रेता समझा जाता है और उसे पुनः जारी कर सकता है।

पुनः जारी करने से आशय लिखत का अन्तरण करने से है। यदि वह ऐसे लिखत का परक्रामण करता है तो यह माना जाता है कि उसने नया वचन पत्र या विनिमय पत्र लिखता है जिसे लिखत का पुनः लिखा जाना कहा जाता है एवं ऐसा लिखत परिपक्वता तक प्रचलन के लिए एक नया जीवन प्राप्त कर लेता है।

यह ध्यान में रखना चाहिए कि जहाँ रचयिता या प्रतिग्रहीता लिखत के परिपक्वता के पश्चात् उसका धारक बन जाता है तो लिखत उन्मोचित हो जाता है। यदि एक धारक परिपक्वता के पूर्व संदाय प्राप्त करता है तो वह उस लिखत को पुनः परक्रामित कर उसे पुनः जारी कर सकता है। यदि लिखत को ऐसे संदायोपरान्त रद्द नहीं किया गया है।

श्रीनिवास बनाम गाउन्डर के मामले में एक माँग पर देय वचन पत्र का रचयिता ने परिपक्वता के पूर्व संदाय कर दिया और वह वचन पत्र को वापस नहीं ले सका और न तो रद्द किया मूल पाने वाले ने उसे पुनः एक सम्यक् अनुक्रम धारक को अन्तरित कर दिया। यह धारित किया गया कि रचयिता पुनः संदाय करने के लिए आबद्ध था।

मलें बनाम कलवरवेल के मामले में यदि प्रतिग्रहीता ने विनिमय पत्र के परिपक्वता के पूर्व संदाय कर दिया है, वहाँ धारक विनिमय पत्र को किसी व्यक्ति को पृष्ठांकित कर सकेगा और तब सभी पक्षकार संदाय के लिए आवद्ध रहेंगे।

(II) सद्भावना पूर्वक संदाय सम्यक् अनुक्रम में संदाय को दूसरी अपेक्षा सद्भाव पूर्वक संदाय होता है। वस्तुत: इसके अन्तर्गत विधिमान्य संदाय की सभी अपेक्षाएं सम्मिलित होतो हैं अर्थात् इमानदारी से, प्रतिफल सहित सावधानी और सतर्कता के साथ लिखत को प्राप्त करना।

(iii) बिना किसी उपेक्षा लिखत का संदाय सद्भाव पूर्वक एवं बिना उपेक्षा के किया जाना चाहिए। लिखत को देखने या व्यक्ति जिसने संदाय के लिए प्रस्तुत किया है कि अन्तरण से उसके लिखत के स्वत्व सम्बन्धी कोई सन्देह एक सामान्य आदमी के लिए न हो।

जहाँ चेक आदाता के खाते में जारी किया गया, परन्तु बैंक ने इसे वाहक को संदाय कर दिया और चेक को देखने से यह प्रकट होता था कि इरेजर द्वारा चेक में छेड़-छाड़ करके वाहक को देय बनाया गया था। यह धारित किया गया है कि बैंक वाहक को संदाय कर उपेक्षा किया है और बैंक ग्राहक को क्षतिपूर्ति करने के लिए आवद्ध है।

(iv) तथा (v) कब्जाधारी और हकदार व्यक्ति को संदाय इस सम्बन्ध में अधिकारिक धारक को संदाय करने पर जोर दिया गया है धारा के उपबन्धों के अनुसार किसी भी व्यक्ति जो लिखत का कब्जाधारी अर्थात् धारक को संदाय किया जाना चाहिए। पुनः जो व्यक्ति लिखत के अधीन संदाय पाने के हकदार हो, उसे संदाय किया जाना चाहिए। संदाय की परिस्थितियों से ऐसा कोई सन्देह नहीं होना चाहिए कि संदाय प्राप्त करने वाला व्यक्ति संदाय पाने का हकदार नहीं है।

पी० एम० दास बनाम सेण्ट्रल बैंक ऑफ इण्डिया के मामले में, यह धारित किया गया है कि जहाँ बैंक के लिखत के प्रकट शब्दों के अनुसार सद्भाव पूर्वक बिना उपेक्षा के सद्भाव पूर्वक संदाय करता है और परिस्थितियों से स्पष्ट है कि संदाय प्राप्त करने वाला व्यक्ति ऐसा संजय पाने का हकदार नहीं है, में कोई सन्देह नहीं है, संदाय सम्यक् अनुक्रम में माना जाएगा।

संदाय किसको किया जाना चाहिए अधिनियम की धारा 78 भी यह उपबन्धित करती है कि वचन पत्र विनिमय पत्र या चेक के रचयिता, प्रतिग्रहीता या ऊपरवाल को उन्मोचित करने के लिए संदाय लिखत के धारक को किया जाना चाहिए।

धारा 82 (ग) कहती है कि यदि लिखत वाहक या निरंक पृष्ठांकित है वहाँ संदाय इसका सही उन्मोचन होगा यदि इसे सम्यक् अनुक्रम में किया गया है।

पाने वाला या चोर को संदाय वाहक को देय लिखत अधिनियम की धाराएँ 10, 78 एवं 82 (ग) का दबाव है कि लिखत के अधीन देय धनराशि का संदाय केवल विधिमान्य धारक को ही किया जाए। चूँकि पता करना कठिन है कि कब्जेदार व्यक्ति ने लिखत को परिदान द्वारा अथवा अन्यथा रूप में अर्थात् चोरी या पाने से प्राप्त किया है। धारा 10 के अधीन यह उपबन्धित है कि यदि यह दिखाने के लिए कोई व्यक्ति संदाय पाने का हकदार नहीं है तो संदाय लिखत के कब्जेदार व्यक्ति को किया जाना चाहिए।

इस प्रकार यहाँ तक चोर या पाने वाले व्यक्ति को भी संदाय किया जा सकता है यदि विवेकी व्यक्ति को सन्देह उत्तेजित करने के लिए कुछ न हो। परन्तु यहाँ पर यह महत्वपूर्ण है कि किसी चोर या पाने वाले को किसी सन्देह की परिस्थितियों में किया गया संदाय सद्भावपूर्ण या सम्यक् अनुक्रम में संदाय को नकारने का प्रभाव रखता है।

तल्ला मल्ला बनाम केशव दास में यह धारित किया गया है कि किसी चोर द्वारा चुराई गई लिखत को उमस्थापित करने में यदि प्रतिग्रहीता द्वारा सद्भाव पूर्वक एवं यह विश्वास रखते हुए कि वह एक सद्भावी धारक है, किया गया संदाय विधिमान्य होगा। यह वाहक चेक पर भी प्रयोज्य होगा।

भटोरिया ट्रेडिंग कं० बनाम इलाहाबाद बैंक में जहाँ चेक किसी कम्पनी को था जिसे कम्पनी का तात्पर्यिंत प्रबन्धक संदाय के लिए उपस्थापित किया, और वहाँ सन्देह उत्पन्न करने के लिए कुछ नहीं था, बैंक ने संदाय कर दिया, संदाय को सम्यक् अनुक्रम में मान्य किया गया एवं भुगतानी बैंक को दायित्व से उन्मोचित मान्य किया गया।

जोश पॉल बनाम जोरा पॉल के बाद में यह धारित किया गया कि संदाय लिखत के धारक को न कि किसी हिताधिकारी को किया जाना चाहिए।

आदेशित लिखत-

उक्त से यह स्पष्ट है कि वाहक लिखत का संदाय एक चोर या पाने वाले को भी किया जा सकता है, बशर्ते कि संदाय सद्भावपूर्वक किया जाना चाहिए। परन्तु आदेशित लिखत का संदाय आदाता (पाने वाला) या पृष्ठांकिती को किया जाना चाहिए जो उसका धारक/ सम्यक् अनुक्रम धारक है। अतः एक पृष्ठांकिती को यह विश्वास करते हुए कि वह सही पृष्ठांकिती है, को सद्भावनपूर्वक एवं बिना किसी उपेक्षा के किया गया संदाय, विधिमान्य संदाय होगा।

कूटरचित पृष्ठांकन-

जहाँ संदाय किसी ऐसे व्यक्ति को किया गया है जिसका स्वत्व कूटरचित पृष्ठांकन के द्वारा बनाया गया है. यह उन्मोचित नहीं करेगा, संदाय करने वाला और वह लिखत के सही स्वामी के प्रति आबद्ध बने रहेंगे।

यहाँ तक कि जहाँ पृष्ठांकन में कूटरचना नहीं है और लिखत किसी अनाधिकृत व्यक्ति द्वारा कब्जा प्राप्त किया गया है और वह व्यक्ति परिवर्तन द्वारा संदाय प्राप्त कर लेता है। संदाय करने वाला व्यक्ति उन्मोचित नहीं होगा।

(4) प्रतिग्रहीता को विनिमय पत्र का धारक बनने पर [ धारा 90] - धारा 90 के अनुसार यदि एक विनिमय पत्र जो परक्रामित किया गया है, परिपक्वता के समय या पश्चात् यदि वह प्रतिग्रहीता द्वारा स्वयं अपने अधिकार से धारित है तो उस पर कार्यवाही करने के सब अधिकार निर्वासित हो जाते हैं।

इस प्रकार एक विनिमय पत्र जब प्रतिग्रहीता के हाथों में परिपक्वता पर या उसके पश्चात् आ जाता है। अर्थात् आदेशित बिल की दशा में पृष्ठांकिती या वाहक को देय की दशा में कब्जाधारी होने पर विनिमय पत्र उन्मोचित हो जाता है। इसे "निगोसिएशन बैंक" कहते हैं। ऐसी दशा में ये सभी पक्षकार को लिखत के अधीन आबद्ध हैं, अपनी आबद्धता से उन्मुक्त हो जाते हैं।

यहाँ पर "निगोसिएशन बैंक", एवं "बिल या लिखत को पुनः जारी करना" दो महत्वपूर्ण सिद्धान्त धारा 90 के प्रभाव से उद्भूत होते हैं। (इन्हें धारा 90 में स्पष्ट किया गया है)।

(5) जबकि चेक सम्यक् रूप में उपस्थापित नहीं किया गया और लेखीवाल को तदद्वारा नुकसान हुआ [ धारा 84]

चेक उपस्थापन में विलम-चेक के धारक का यह कर्तव्य है कि वह इसे जारी किए जाने की तिथि से युक्तियुक्त समय के अन्तर्गत उपस्थापित करे। यदि वह ऐसा करने में व्यतिक्रम करता है और जब वह वास्तव में उपस्थापित करता है चेक किसी घटना के घटने पर उदाहरण के लिए, बैंक ही फेल हो जाता है जो बैंक को संदाय करने से रोकता है, तब चेक का लेखीवाल धारक के विरुद्ध दायित्व से उन्मोचित हो जाता है, परन्तु यह कि जिस समय चेक उपस्थापित किया जाता उस समय उसके खाते में चेक के संदाय के लिए पर्याप्त अधिशेष था।

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